विश्ववार्ता

वैश्विक समस्याओं का समाधान सहयोग से संभव है, टकराव से तो कतई नहीं!

कमलेश पांडेय

दुनिया का थानेदार अमेरिका और उसका विकल्प बनने की चाहत रखने वाले चीन समेत अन्य विघ्नसंतोषी देशों को शांतिप्रिय व गुटनिरपेक्ष देश भारत ने एक नहीं बल्कि कई बार स्पष्ट कूटनीतिक संदेश दिए हैं कि वैश्विक समस्याओं का समाधान पारस्परिक सहयोग से ही संभव है, टकराव से कतई नहीं लेकिन उनकी शहंशाही प्रवृत्ति है कि मानती नहीं बल्कि तरह तरह से भारत को घेरने या चिढ़ाने की कोशिश करती रहती है। यही वजह है कि पीएम मोदी के नेतृत्व वाले नए भारत ने ऐसे देशों की अनदेखी, अनसुनी करते हुए अपनी सकारात्मक पहलों से अक्सर चौंकाने वाले परिणाम देने शुरू कर दिए हैं, जिससे भारत की प्रतिष्ठा और साख दोनों में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है।

खासकर, वैश्विक समस्याओं जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी और गरीबी का समाधान सहयोग से ही संभव है क्योंकि ये सीमाओं से परे हैं। पारस्परिक युद्धों की तरह इन मुद्दों पर टकराव ऐसी समस्याओं को बढ़ाता ही है, जबकि अंतरराष्ट्रीय साझेदारी संसाधनों और प्रयासों को एकजुट करती है। यदि पारस्परिक सहयोग के कतिपय प्रमुख उदाहरणों की बात की जाए तो साल 2019 की अंतरराष्ट्रीय महामारी कोविड-19 के वैक्सीन के विकास में वैश्विक सहयोग ने रिकॉर्ड समय में टीके तैयार किए, जैसे COVAX पहल और वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय साझेदारी ने। कहना न होगा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), Gavi, CEPI और UNICEF के सह-नेतृत्व में COVAX ने COVID-19 टीके 146 देशों को 2 अरब खुराकें वितरित कीं, जिससे निम्न-आय वाले देशों में 2.7 मिलियन मौतें टलीं। इसप्रकार यह पहल वैश्विक महामारी प्रबंधन का एक उत्कृष्ट मॉडल बनी। 

इससे पहले पेरिस समझौता ने 2015 से ही देशों को एकजुट कर जलवायु लक्ष्य निर्धारित करने में सफलता पाई जिससे नवीकरणीय ऊर्जा निवेश बढ़ा। देखा जाए तो जलवायु पर पेरिस समझौता (2015) ने 196 देशों को वैश्विक तापमान वृद्धि 2°C से नीचे रखने के लक्ष्य पर एकजुट किया जिससे नवीकरणीय ऊर्जा निवेश बढ़ा। यह UNFCCC के तहत बहुपक्षीय सहमति का प्रतीक है।

वहीं संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर्यावरण और शांति के लिए विशेष समूह गठित कर साझेदारी को बढ़ावा देते हैं। जहां तक पारस्परिक टकराव के नकारात्मक प्रभाव की बात है तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक अनाज आपूर्ति बाधित कर 27.6 करोड़ लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचाया। जबकि सूडान, गाजा और माली जैसे संघर्षों ने 2024 में 14 करोड़ लोगों को भयानक भुखमरी का शिकार बनाया। 

विशेषकर, शांति स्थापना में UN मिशन अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र के 63 शांति अभियान 37 देशों में सक्रिय हैं, जैसे पूर्वी स्लावोनिया (UNTAES) और कोसोवो (UNMIK) में सफल संक्रमणकालीन प्रशासन। इस दिशा में भारत ने 2.9 लाख शांति रक्षक तैनात कर सबसे बड़ा योगदान दिया। जहां तक अन्य क्षेत्रीय सफलताएँ की बात है तो BRICS ने यूक्रेन में मध्यस्थता और गाजा में युद्धविराम के लिए कूटनीति चलाई। जबकि QUAD और ASEAN जैसे मंच सुरक्षा व जलवायु पर सहयोग बढ़ाते हैं। इस प्रकार देखा जाए तो किसी भी प्रकार के टकराव असमानता बढ़ाते हैं और बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करते हैं।

लिहाजा यदि आगे की सही राह निकालनी है तो देर सबेर 

बहुपक्षवाद को मजबूत कर वित्त, तकनीक और क्षमता निर्माण में सहयोग बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए देश-दुनिया के नेताओं को राष्ट्रीय हित से ऊपर उठकर वैश्विक साझेदारी अपनानी चाहिए। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि

विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग को मजबूत करने के लिए न केवल समुचित मंच प्रदान करती हैं, बल्कि ये शांति, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में देशों को परस्पर एकजुट भी करती हैं। 

मसलन, ऐसी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ और उनकी भूमिकाएँ देश-दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। ख़ासकर जहां संयुक्त राष्ट्र (UN) शांति, सुरक्षा और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लिए कूटनीतिक संवाद और संकट प्रबंधन करता है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) महामारी नियंत्रण और स्वास्थ्य नीतियों में वैश्विक समन्वय स्थापित करता है। जबकि विश्व व्यापार संगठन (WTO) व्यापार नियमों से आर्थिक सहयोग बढ़ाता है। इसी प्रकार से आर्थिक और पर्यावरणीय संस्थाएँ भी महत्वपूर्ण हैं। जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक वित्तीय स्थिरता, गरीबी उन्मूलन और जलवायु अनुकूलन के लिए सहायता देते हैं। वहीं, आईपीसीसी (IPCC) जलवायु सहयोग पर वैज्ञानिक रिपोर्ट साझा करता है। कुलमिलाकर ये वैश्विक संस्थाएँ संकटों में संसाधन जुटाकर और नीतियाँ बनाकर सहयोग को प्रभावी बनाती हैं। 

कहना न होगा देश-दुनिया के नीतिगत कदम जैसे पारदर्शिता, निरंतर संवाद और संयुक्त गतिविधियाँ देशों के बीच भरोसा बढ़ाते हैं। ये कदम टकराव कम कर सहयोग को मजबूत बनाते हैं। संवाद और कूटनीति यानी निरंतर बातचीत, जैसे ‘पड़ोस पहले’ नीति के तहत विवाद सुलझाना और हॉटलाइन स्थापित करना भरोसे का आधार बनाता है। जबकि ईमानदारी, गोपनीयता और पारस्परिक सम्मान वाली कूटनीति संबंधों को मजबूत करती है। 

जहां तक पारदर्शिता सम्बन्धी उपाय की बात है तो सैन्य विश्वास निर्माण उपाय (CBMs) जैसे हथियार नियंत्रण रिपोर्ट साझा करना, विदेशी सेना की जानकारी देना टकराव रोकता है। जबकि संयुक्त तथ्य-खोज मिशन और डेटा विनिमय जानकारी सममिति बढ़ाकर भरोसा जगाते हैं। वहीं सहयोगी पहलें के दृष्टिगत संयुक्त सैन्य अभ्यास, शांति रक्षा इकाइयाँ और आपदा राहत सहयोग एकजुटता दिखाते हैं। जबकि आर्थिक साझेदारी, सीमा समितियाँ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान गैर-पश्चिमी समाधानों को बढ़ावा देते हैं।

अनुभव बताता है कि वैश्विक मुद्दों पर बहुपक्षीय सहयोग कई बार सफल रहा है, जहाँ देशों ने साझा लक्ष्यों के लिए एकजुट होकर ठोस परिणाम दिए। खासकर शांति, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों से, जिनका अपना महत्व हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के मुताबिक, विश्व आर्थिक मंच, डावोस में वरिष्ठ अमरीकी अधिकारी हॉवर्ड लुटनिक और डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों का केंद्रीय संदेश साफ़ था कि यूरोप को चीन के “ख़तरे” से सावधान किया जाए। लेकिन यह चेतावनी जितनी ज़ोरदार थी, उतनी ही विवादित भी। क्योंकि चीन न तो अमरीका की तरह किसी देश पर हमला कर रहा है और न ही युद्ध की खुली धमकी दे रहा है। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन चीन के आर्थिक और तकनीकी विकास से गहरी बेचैनी में दिखता है।

दरअसल, यह बेचैनी सुरक्षा से ज़्यादा वैश्विक सत्ता संतुलन से जुड़ी है। कारण कि जिस वैश्वीकरण को अमरीका ने खुद गढ़ा और दशकों तक पूरी दुनिया पर थोपा, वही आज उसके लिए असहज हो गया है। उदाहरणतया, खुले बाज़ार, मुक्त व्यापार और वैश्विक सप्लाई-चेन का सबसे बड़ा लाभार्थी लंबे समय तक अमरीका ही रहा। लेकिन अब जब उसी ढांचे के भीतर रहकर चीन ने उत्पादन, तकनीक और व्यापार में तेज़ी से बढ़त बना ली है तो अमरीका बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। इसलिए तो कहा जाता है कि चीन को इंजीनियर चलाते हैं, जबकि अमेरिका को थोथी दलील देने वाले वकील।

आमतौर पर चीन की “गलती” यह नहीं कि उसने नियम तोड़े, बल्कि यह है कि उसने अमरीका द्वारा बनाए गए नियमों के भीतर रहते हुए ही सफलता हासिल कर ली। ट्रंप प्रशासन की प्रतिक्रिया—टैरिफ़, ट्रेड वॉर, डिकपलिंग और “फ्रेंड-शोरिंग”—असल में उसी वैश्वीकरण को कमजोर करने की कोशिश है, जिसे कभी अमरीकी नेतृत्व ने दुनिया की प्रगति का रास्ता बताया था। इस बार फर्क सिर्फ यह है कि ट्रंप की इस आक्रामक सोच पर खुली वैश्विक असहमति भी सामने आई है। 

खासकर कनाडा के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चीन को केवल दुश्मन के रूप में देखना अव्यावहारिक है और वैश्विक समस्याओं का समाधान सहयोग से ही संभव है, टकराव से नहीं। यूरोप के कई प्रमुख नेताओं ने भी ट्रंप के दृष्टिकोण से दूरी बनाई। फ्रांस, जर्मनी और यूरोपीय संघ के शीर्ष प्रतिनिधियों ने यह संकेत दिया कि यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है और वह अमरीका के दबाव में आकर चीन से अपने आर्थिक रिश्ते तोड़ने को तैयार नहीं है।

वहीं, यूरोप के लिए चीन केवल “ख़तरा” नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। इसलिए अमरीका की यह अपेक्षा कि यूरोप बिना सवाल किए उसकी लाइन पर चले, अब पहले जैसी स्वीकार्य नहीं रही। असल में चीन का उभार किसी युद्ध की आहट नहीं, बल्कि एक बहुध्रुवीय दुनिया की सच्चाई है। जबकि डावोस में ट्रंप का संदेश इस सच्चाई को स्वीकार करने के बजाय उससे घबराने की अभिव्यक्ति है। और विडंबना यह है कि इस डर में अमरीका अपने ही बनाए सिद्धांतों—खुले बाज़ार और वैश्वीकरण—को खुद ही तोड़ता नज़र आ रहा है।

कमलेश पांडेय