ज्ञान चंद पाटनी
सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक की करीब छह माह लंबी जेल यात्रा का अंत हो गया है। वांगचुक की हिरासत से लेकर रिहाई तक के घटनाक्रम से कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत बन्दी बनाए गए था। अब सरकार ने वांगचुक पर एनएसए हटा दिया और कहा कि यह निर्णय ‘रचनात्मक और सार्थक संवाद’ को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से लिया गया है। अचानक जोधपुर जेल से सोनम वांगचुक की रिहाई के बावजूद यह साफ है कि देश में शांतिपूर्ण आंदोलनों को दबाने के लिए भी सबसे कठोर कानूनों का सहारा लिया जाता है।
उच्चतम न्यायालय में वांगचुक की पत्नी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करके हिरासत को चुनौती थी। इसकी सुनवाई के दौरान केंद्र ने आरोप लगाया था कि सोनम वांगचुक ” सरकार को उखाड़ फेंकने” के लिए ‘अरब स्प्रिंग’ जैसा विद्रोह चाहते थे। यह भी आरोप लगाया गया कि वांगचुक ने युवाओं को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में हिंसक जेन-जेड विरोध प्रदर्शनों के लिए उकसाया। यहां तक कहा गया कि गांधीवादी अहिंसा का जिक्र केवल एक दिखावा था। इसके अलावा, वांगचुक पर कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग करने जैसे आरोप भी लगाए गए। लद्दाखी लोगों को युद्ध के समय भारतीय सेना की मदद न करने के लिए उकसाने के आरोप भी लगाए गए। इन सभी आरोपों को सोनम वांगचुक ने गलत बताया था। अब सरकार ने वांगचुक की हिरासत रद्द करके एक तरह से अपने ही आरोपों को गलत साबित कर दिया है।
दरअसल, सोनम वांगचुक के अनशन के दौरान 24 सितंबर 2025 को लेह हिंसा हुई थी। दो दिन बाद 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत वांगचुक को हिरासत में लिया था। इसके बाद उन्हें फौरन जोधपुर जेल में शिफ्ट कर दिया गया था। वे करीब छह माह से जोधपुर जेल में ही थे। अब उनकी रिहाई हो गई है। एनएसए सरकार को ऐसे लोगों को हिरासत में लेने का अधिकार देता है, जिनसे देश की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो। इसके तहत किसी व्यक्ति को 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। 24 सितंबर को हुई मौतों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया। लेकिन छह माह बाद सरकार का निष्कर्ष बदला और कहा गया— ‘लद्दाख की समस्याओं का हल संवाद और बातचीत से ही संभव है’।
सोनम वांगचुक पर्यावरण संरक्षण के लिए बरसों से काम कर रहे हैं। हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए उन्होंने एक तरह से अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने और छठी अनुसूची की मांग तेज हुई है। उनका मानना है कि बिना संवैधानिक सुरक्षा के लद्दाखी संस्कृति, भूमि और पर्यावरण खतरे में है। चीनी घुसपैठ, खनन माफियाओं और पर्यावरणीय क्षति के खिलाफ उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था। अपनी मांगों के समर्थन में अनशन, पदयात्रा, जन जागरण जैसे कदम उठाए, लेकिन 24 सितंबर को लेह में प्रदर्शन के दौरान हुई मौतों ने माहौल गरमा दिया। इसके बाद वांगचुक को गिरफ्तार कर एनएसए लगा दिया गया, वे बिना मुकदमे के छह माह तक जेल में रहे।
एनएसए का मनमाना प्रयोग नया नहीं है। 1980 में आपातकाल के बाद लाया गया यह कानून ‘राज्य सुरक्षा’ के नाम पर बिना मुकदमे किसी को भी जेल में डालने की शक्ति देता है। वांगचुक का मामला इसका ताजा उदाहरण है। शांतिपूर्ण अनशन को ‘राज्य के खिलाफ षड्यंत्र’ बताया गया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर सरकार का विरोध हुआ। लद्दाख बंद रहा, छात्र सड़कों पर आए, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज किया। सरकार को आभास हो गया कि दमन उल्टा पड़ेगा। इसलिए’ बातचीत’ का ऐलान हुआ और एनएसए हटाया गया। वांगचुक की रिहाई स्वागतयोग्य है, पर हिरासत से जुड़े सवाल तो बरकरार हैं।
शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की आत्मा है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में दमन के बजाय संवाद पर ही भरोसा किया जाता है। वांगचुक का मामला दर्शाता है कि दमन उल्टा परिणाम देता है। एनएसए का विवेकपूर्ण प्रयोग ही इसकी साख बचा सकता है। असहमति को दबाने के लिए इसका इस्तेमाल इस कानून पर ही सवाल लगाता है। इस पूरे प्रकरण के कई सबक हैं। कठोर कानून असहमति दबाने का हथियार न बनें, शांतिपूर्ण विरोध को संरक्षण मिले और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान किया जाए। लद्दाख जैसा संवेदनशील क्षेत्र संवाद मांगता है, न कि दमन। वांगचुक जैसे पर्यावरण कार्यकर्ता राष्ट्रीय संपदा हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ एनएसए के इस्तेमाल से जनता के बीच गलत संकेत जाता है। समय की मांग है कि एनएसए में तत्काल सुधार पर ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) भारत के कानूनी ढांचे का एक विवादास्पद हिस्सा है। यह कानून राज्य को बिना मुकदमे के किसी व्यक्ति को एक वर्ष तक जेल में रखने की शक्ति देता है। इसका मनमाना दुरुपयोग लोकतंत्र की भावना से मेल नहीं खाता। इसलिए इसमें सुधार अनिवार्य है, ताकि यह कानून राजनीतिक दमन का हथियार नहीं बने। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों के दौरान इस कानून की कमियों की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित कर चुका है।
सबसे पहले हिरासत की समयसीमा को सख्ती से सीमित करना होगा। वर्तमान में, एनएसए के तहत व्यक्ति को एक साल तक बिना किसी औपचारिक आरोप के जेल में रखा जा सकता है। यह अवधि बहुत लंबी है और इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है। साथ ही, हिरासत के 24 घंटे के अंदर कारण सार्वजनिक रूप से बताए जाएं, ताकि अदालत तुरंत हस्तक्षेप कर सके। सोनम वांगचुक की रिहाई साबित करती है कि शांतिपूर्ण आंदोलन अंततः जीतते हैं। कठोर कानूनों का इस्तेमाल विवेकपूर्ण किया जाना चाहिए और संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ( युवराज फीचर्स )
ज्ञान चंद पाटनी