गजेंद्र सिंह
हाल के समय में सोनिया गांधी द्वारा लिखे गए लेख और वक्तव्य सार्वजनिक बहस का विषय बने हुए हैं। एक ओर मार्च 2026 में प्रकाशित उनके लेख में उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता और शिया धर्मगुरु अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी को लेकर प्रश्न उठाए। वहीं जून 2025 में लिखे गए अपने एक अन्य लेख में उन्होंने गाज़ा में चल रहे संघर्ष के संदर्भ में भारत की प्रतिक्रिया को लेकर आलोचना की थी। इन दोनों लेखों में उनका तर्क यह रहा कि भारत की विदेश नीति को नैतिकता, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय मूल्यों के आधार पर स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए परंतु इन वक्तव्यों के साथ एक व्यापक प्रश्न भी सामने आता है— क्या यह वास्तव में सिद्धांत आधारित कूटनीति का आग्रह है या फिर ऐसी चयनात्मक नैतिकता जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं और भारत के राष्ट्रीय हितों को पर्याप्त महत्व नहीं देती?
सबसे पहले उस विचार की चर्चा आवश्यक है जिसे अक्सर “नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था ” कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अध्ययन करने वाले अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी व्यवस्था वर्षों से कमजोर पड़ चुकी है। विश्व राजनीति आज आदर्शों से अधिक शक्ति संतुलन, रणनीतिक हितों और गठबंधनों पर आधारित है। पश्चिम एशिया के संघर्षों से लेकर पूर्वी यूरोप और इंडो-पैसिफिक तक, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में नैतिकता की भाषा अक्सर वास्तविक शक्ति राजनीति से पीछे रह जाती है। ऐसी स्थिति में यदि कोई नेता वैश्विक घटनाओं को केवल नैतिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है तो उसका दृष्टिकोण अधूरा प्रतीत हो सकता है।
इस आलोचना का दूसरा पहलू चयनात्मक नैतिक आक्रोश है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिक भाषा तो प्रबल रूप से सामने आती है लेकिन भारत के अपने ऐतिहासिक अनुभवों पर वही तीव्रता दिखाई नहीं देती। उदाहरण के लिए, 1990 के दशक में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन और उनके विरुद्ध हिंसा आधुनिक भारत के सबसे पीड़ादायक अध्यायों में से एक है। हजारों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े और वे दशकों से विस्थापन का जीवन जी रहे हैं। इसी प्रकार पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव की घटनाएँ समय-समय पर चर्चा में आती रही हैं। आलोचकों के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की बात की जाती है तो इन विषयों पर भी समान संवेदनशीलता अपेक्षित है।
विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष ईरान की राजनीतिक संरचना से जुड़ा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को अक्सर “राष्ट्र प्रमुख” के रूप में संबोधित किया जाता है लेकिन उनकी नियुक्ति प्रक्रिया सामान्य लोकतांत्रिक चुनाव से भिन्न है। ईरान में सर्वोच्च नेता का चयन विशेषज्ञों की सभा नामक इस्लामिक निकाय द्वारा किया जाता है जो मुख्यतः धर्मगुरुओं का समूह है। आलोचकों के अनुसार यह व्यवस्था लोकतांत्रिक जनादेश की बजाय एक इस्लामिक -राजनीतिक ढाँचे पर आधारित है। ईरान की सरकार पर सबसे गंभीर आरोप महिलाओं के अधिकारों और राजनीतिक असहमति के दमन से जुड़े हैं। 2022 में महसा अमीनी की मृत्यु के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान इस विषय की ओर खींचा। इन आंदोलनों के दौरान सुरक्षा बलों, विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर पर प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के आरोप लगाए गए। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इसे राजनीतिक असहमति के दमन का उदाहरण बताया।
पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू उसके क्षेत्रीय प्रभाव से जुड़ा हुआ है। यह प्रभाव उन संगठनों के माध्यम से भी देखा जाता है जिन्हें विभिन्न स्तरों पर तेहरान का समर्थन मिलने की बात अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में कही जाती रही है। इनमें प्रमुख रूप से हमास, हिज़्बुल्लाह और हूती जैसे समूह शामिल हैं। पश्चिम एशिया के अलग-अलग संघर्षों और राजनीतिक समीकरणों में इन संगठनों की सक्रिय भूमिका रही है और ईरान के साथ उनके संबंध लंबे समय से वैश्विक कूटनीतिक बहस, क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण का विषय बने हुए हैं।
अंततः यह बहस एक बड़े प्रश्न की ओर ले जाती है— भारत की विदेश नीति का आधार क्या होना चाहिए? अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अक्सर नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। अधिकांश देश अपने कूटनीतिक निर्णयों में मानवाधिकार, रणनीतिक हित, सुरक्षा और आर्थिक संबंधों जैसे कई कारकों को साथ लेकर चलते हैं। आलोचकों का तर्क है कि यदि नैतिकता की भाषा का उपयोग किया जाए तो उसे सुसंगत और संतुलित होना चाहिए—ऐसा न लगे कि वह केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार सामने आती है। विदेश नीति के प्रश्न केवल आदर्श और नैतिकता के आधार पर नहीं सुलझते; वे इतिहास, रणनीति, शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हितों से भी प्रभावित होते हैं। इसलिए जब किसी नेता द्वारा वैश्विक नैतिकता की बात की जाती है, तो उससे अपेक्षा होती है कि वह दृष्टिकोण सार्वभौमिक और संतुलित हो— ऐसा दृष्टिकोण जो दूरस्थ संघर्षों के साथ-साथ उन मुद्दों को भी समान गंभीरता से देखे जिन्होंने भारत के अपने समाज और इतिहास को गहराई से प्रभावित किया है।( युवराज फीचर्स )
गजेंद्र सिंह