• प्रमोद दीक्षित मलय
आततायी, जुल्मी एवं दमनकारी अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने वाले मां भारती के पुत्र-पुत्रियों की एक लम्बी श्रंखला है। अनेकानेक क्रांतिकारी युवक-युवतियों ने पराधीनता की बेड़ियों से भारत माता को मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूमा, सीने पर गोलियां खाई, जेलों में अंग्रेजों का अमानवीय व्यवहार एवं यातना की पीड़ा झेली, अनगिनत जुल्म-अत्याचार सहे, किंतु पल भर को भी अपने लक्ष्य से किंचित डिगे नहीं। सोते-जागते एकमेव लक्ष्य भारत की स्वतंत्रता हेतु बद्धपरिकर हो अहर्निश क्रांति साधना में जुटे रहे। क्रांतिकारियों के त्याग, तपस्या, संघर्ष, बलिदान एवं समर्पण से देश स्वतंत्र हो गणतंत्र बना। लाल किले से तिरंगा ध्वज ने नील गगन में फहरते हुए मानो अपनी स्वतंत्रता, सम्प्रभुता एवं गणतांत्रिक राज्य की उच्च स्वर में घोषणा कर क्रांतिकारियों के बलिदान एवं समर्पण की सराहना की। 15 अगस्त को देश को आजादी मिली और स्वतंत्रता आंदोलन में राजनीतिक संघर्ष करने वाले मुट्ठी भर नेता नायक बन चमक उठे, अपनी हर सांस एवं लहू का एक-एक कतरा आजादी की नींव में विसर्जित करने वाले असंख्य नायक नींव के अंधेरे में ही खो गये। आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी भुला दिए गये। अपवाद स्वरूप अंगुलियों में गिने जा सकने वाले क्रांतिकारियों के योगदान को छोड़ शेष समय की धूल में कहीं दब अचर्चित-अनचीन्हे ही रह गये। इन अचर्चित-अनचीन्हे क्रांतिकारियों की श्रंखला में चटगांव शस्त्रागार पर हमला करने वाले क्रांतिकारी दल का समन्वय करने वाली सुहासिनी गांगुली का क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व लोक सम्मुख नहीं आ सका, जिन्हें आत्मीयता से लोग ‘सुहासिनी दीदी’ सम्बोधित कर अपनी श्रद्धा निवेदित करते थे।आज 3 फरवरी सुहासिनी गांगुली की जन्म जयंती है।
आजीवन अविवाहित रह कर देश सेवा का व्रत धारण करने वाली क्रांतिकारी सुहासिनी गांगुली का जन्म 3 फरवरी, 1909 को बंगभूमि ढाका के निकट खुलना नामक स्थान पर हुआ था, जो अब बांग्लादेश अंतर्गत आता है। पिता अबिनाशचंद्र गांगुली एवं माता श्रीमती सरला सुंदरी देवी आधुनिक विचारों से प्रभावित बालिका शिक्षा के समर्थक थे। इस कारण बालिका सुहासिनी गांगुली की शिक्षा का उचित प्रबंध किया गया। वर्ष 1924 में ईडन हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर सुहासिनी 1927 में एक मूक-बधिर विद्यालय में शिक्षक बन कर कलकत्ता आ गईं। साथ ही उच्च शिक्षा हेतु अध्ययन का क्रम भी जारी रखा। यहीं कालेज में अध्ययन के दौरान सुहासिनी की भेंट ईडन हाईस्कूल की पूर्व छात्रा प्रीतिलता वाड्डेदार से हुई जो क्रांतिकारी संस्था युगांतर (जुगांतर) से जुड़ी थीं। फलत: सुहासिनी भी युगांतर की सक्रिय सदस्य बन गयी। तब कालेज में ही छात्री संघ की दो सदस्य सहेलियों- कमला दासगुप्ता एवं बीना दास से घनिष्ठता बढ़ी, जो युगांतर संस्था से जुड़े क्रांतिकारियों को बाहर से मदद पहुंचाने का काम करती थीं। उनके माध्यम से सुहासिनी की भेंट रसिक दास तथा हेमंत तरफदार से हुई जो क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व करते हुए गुप्तरूप से युवक-युवतियों को तलवारबाजी एवं बम-पिस्तौल चलाने का प्रशिक्षण देते थे और आत्मरक्षा के तौर-तरीके सिखाते थे। सुहासिनी गांगुली ने रुचि लेकर जल्दी ही इनमें निपुणता प्राप्त कर ली। हालांकि क्रांतिकारी बहुत सावधानी रखते थे किंतु अंग्रेजी पुलिस और गुप्तचर भी भेद पाने के लिए पीछे पड़े रहते थे और किसी युवक-युवती के व्यवहार पर शंका होने पर चोरी-छिपे पीछा करते और आवश्यक जानकारी जुटा कर गिरफ्तार करते थे। सुहासिनी गांगुली के देशभक्ति पूर्ण व्यवहार एवं कालेज में की जा रही गतिविधियों से गुप्तचर लगातार पीछा करने लगे थे। तब साथियों की सलाह पर सुहासिनी गांगुली फ्रांसीसी नियंत्रण वाले क्षेत्र चंद्रनगर चली गईं, जहां पर ब्रिटिश पुलिस और गुप्तचर का भय न था। चंद्रनगर में सुहासिनी ने दिखाने एवं अंग्रेज गुप्तचरों को भ्रमित करने के लिए एक विद्यालय में शिक्षिका बन काम शुरू किया। एक क्रांतिकारी शशिधर आचार्य की छद्म पत्नी बनकर एक बड़ा दुमंजिला मकान किराये पर ले रहने लगे। अब यह भवन क्रांतिकारियों के ठहरने, योजना बनाने एवं क्रियान्वयन बाद मिलने की सुरक्षित जगह बन गया। क्रांतिकारियों का आना-जाना लगा रहता।
18 अप्रैल, 1930 को अंग्रेजों के हथियार, असलहा, बम-बारूद आदि रखने की सुरक्षित जगह चटगांव शस्त्रागार पर मास्टर सूर्यसेन के नेतृत्व में जोरदार हमला कर हथियार लूट लिए गये। कुछ क्रांतिकारी छिपने हेतु सुहासिनी गांगुली के पास चंद्रनगर पहुंच गये। इसी बीच फ्रांस और इंग्लैंड के बीच संधि होने से ब्रिटिश पुलिस एवं गुप्तचर भी चंद्रनगर में फ़ैल गये।
वह सितम्बर महीने का एक सामान्य दिन था, किंतु आसमान काले बादलों से घिरा हुआ था, मानो किसी अनहोनी का संकेत दे रहे हों। सुहासिनी के मकान में बैठे कुछ क्रांतिकारी योजना बनाने हेतु गुप्त बैठक कर रहे थे कि तभी अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स टेगार्ट ने अपने गुप्तचर और भारी पुलिस बल के साथ मकान को चारों ओर से घेर कर गोलीबारी शुरू कर दी। अचानक हमले से क्रांतिकारी संभल नहीं पाये।जीवन घोषाल गोली लगने से मौके पर ही स्वर्ग सिधार गये, कुछ घायल हुए। क्रांतिकारी साथी शशिधर आचार्य, सुहासिनी गांगुली, लोकनाथ, गणेश घोष और हेमंत तरफदार गिरफ्तार कर लिए गये। मुकदमा चलाकर जेल की सजा हुई।
इस तरह सुहासिनी गांगुली वर्ष 1932 से 1938 तक खड़गपुर के पास हिजली जेल में बंद रहीं। जेल से छूटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी में काम करना प्रारंभ किया। 1942 में गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लेने वाले हेमंत तरफदार की भरपूर मदद करने पर अंग्रेजों ने फिर गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। वह 1945 में जेल से मुक्त हुईं। वह धनबाद में आश्रम बनाकर रहने वाले संन्यासी हो गये क्रांतिकारी हेमन्त तरफदार से मिलीं और संन्यासिनी की भांति रहते हुए लोक सेवा के काम में जुट गईं। देश आजाद हो चुका था। वह कलकत्ता प्रवास करतीं और लोक जागरण करतीं। आश्चर्य! पुलिस ने शांति भंग के आरोप में 1950 में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। जेल से छूटने के बाद सार्वजनिक जीवन से मोह भंग हो गया। 23 मार्च, 1965 को एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
सुहासिनी गांगुली के अतुल्य योगदान से देश लगभग अपरिचित रहा। न कोई चर्चा, न सम्मान और ही कोई डाक टिकट जारी हुआ कि भारत की भावी पीढ़ी उस महनीय क्रांतिधर्मी व्यक्तित्व से परिचित हो पाती। हालांकि कलकत्ता के एक उपनगर की एक गली का नाम ‘सुहासिनी गांगुली सरणी’ रखा गया है, पर उस गली से गुजरने वाले क्या सुहासिनी गांगुली के योगदान को जानते होंगे? यह एक प्रश्न उस गली के मुहाने पर उत्तर की प्रतीक्षा में बेचैन खड़ा होगा। सुहासिनी गांगुली की जन्म जयंती के अवसर पर हमारे श्रद्धा सुमन समर्पित हैं।