सूरज का डोला

-प्रभुदयाल श्रीवास्तव- bird-2
चिड़ियों ने जब चूं-चूं बोला,
पूरब ने अपना मुंह खोला|
उदयाचल अपने कंधे पर,
ले आया सूरज का डोला|

पीपल पर कोयल चिल्लाई,
तब कौओं को भी सुध आई|
कांव-कांव कहकर चिल्लाये,
उठो सबेरा जागो भाई|

फूलों पर भौंरे मंडराये,
लगी भूख है रस मिल जाये|
जीने का आधार चाहिये,
थोड़ा सा ही बस मिल जाये|

गाय रंभाने लगी सार में,
खड़ा बिजूक हंसा हार में|
नौकर सारे लगा दिये हैं,
मालिक ने फिर से बिगार में|

चौराहों पर खड़ी हो गई,
वरदी में बच्चों की टोली|
आओ बच्चो जल्दी बैठो,
जाना है शाला बस बोली|

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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