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लाल गलियारे का सूर्यास्त: नक्सलवाद मुक्ति के मुहाने पर भारत


आंतरिक सुरक्षा के इतिहास को बदल देगी 31 मार्च की तारीख?


ओ.पी. पाल


भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में 31 मार्च 2026 की तारीख महज एक कैलेंडर तिथि नहीं, बल्कि एक युग के अंत का उद्घोष बनने जा रही है। आधी सदी से अधिक समय तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना रहा नेपाल के पशुपति से लेकर आंध्र प्रदेश के तिरुपति तक फैला ‘लाल गलियारा’ (रेड कॉरिडोर) अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसे गिन रहा है, यानी ‘नक्सलबाड़ी’ से शुरू हुआ यह हिंसक अध्याय अब अपने अंतिम पृष्ठ पर है। गृह मंत्रालय की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और ‘सुरक्षा-विकास-विश्वास’ के त्रिकोणीय प्रहार ने नक्सली नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

2018 में जहां 126 जिले इस समस्या से जूझ रहे थे, वहीं अब यह संख्या घटकर मात्र 08 रह गई है और अब केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में 3 जिले ऐसे बचे हैं जिन्हें ‘अत्यधिक प्रभावित’ की श्रेणी में रखा गया है, जहां सुरक्षा बल का प्रहार अंतिम चरणों में है। 31 मार्च 2026 की समय-सीमा केवल एक प्रशासनिक लक्ष्य नहीं है बल्कि उन लाखों आदिवासियों की आकांक्षा है, जिन्होंने दशकों तक हिंसा का दंश झेला है। हालांकि उग्रवाद अपने अंतिम दौर में है लेकिन चुनौती अब इन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और मजबूत करने और विकास की गति को निरंतर बनाए रखने की है।  

केंद्र सरकार की वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से निपटने के लिए वर्ष 2015 में शुरु की गई राष्ट्रीय नीति एवं कार्य योजना’ ने आज आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से इस लड़ाई की दिशा बदल दी? सरकार ने इसे केवल ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या न मानकर एक बहु-आयामी चुनौती माना और इस रण्नीतिक बदलाव के लिए सरकार ने सुरक्षा का अभेद्य चक्रव्यूह तैयार करने, राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण और केंद्रीय बलों के समन्वय पर जोर दिया। कंद्रीय गृह मंत्रालय के ताजा आंकड़ो पर गौर करें, तो इस योजना के तहत दुर्गम इलाकों में 656 फोर्टीफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए जो सुरक्षा बलों के लिए ‘लॉजिस्टिक हब’ साबित हुए। वहीं सुरक्षा संबंधी व्यय के तहत इस दौरान राज्यों को अब तक 3681.73 करोड़ रुपये जारी किए गए। सरकार की इस रणनीतिक पहल ने नक्सलियों के वित्तीय स्रोतों को भी पूरी तरह सुखा दिया । वहीं केंद्रीय एजेंसियों को 1224.59 करोड़ रुपये की मदद से हेलीकॉप्टर, ड्रोन और आधुनिक कैंप अवसंरचना प्रदान की गई। नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सलियों की ‘इलाकों का कटना’ और ‘अशिक्षा’ जैसी सबसे बड़ी ताकत को सड़कें और स्कूल जैसे बुनियादी विकास की योजनाओं ने आज खत्म कर दिया है। दो प्रमुख योजनाओं (आरआरपी और आरसीपीएलडब्ल्यूईए) के तहत 15,016 किलोमीटर सड़कों का जाल बिछाया गया। यही नहीं, ‘लाल गलियारा’ के दायरे में जंगलों के बीच 9,233 मोबाइल टावर चालू किए गए, जिससे नक्सलियों का सूचना तंत्र कमजोर हुआ। नक्सल प्रभावित राज्यों में 179 एकलव्य स्कूल और 46 आईटीआई के माध्यम से आदिवासी युवाओं के हाथों में बंदूक की जगह औजार और किताबें थमाई जा रही हैं। वित्तीय समावेशन के दृष्टिकोण से  6,025 अधिक डाकघरों,1,804 बैंक शाखाओं और खोले गए 1,321 एटीएम ने बिचौलियों और नक्सलियों के समानांतर आर्थिक तंत्र को ध्वस्त कर दिया है।

 
मुख्यधारा में लौटने को मजबूर नक्सली
सरकार ने केवल बंदूकों के दम पर नहीं बल्कि ‘विश्वास’ के जरिए नक्सलवाद के खिलाफ इस जंग को जीता है। सरकार ने पुनर्वास पैकेज के माध्यम से बंदूक छोड़कर समाज में लौटने वाले नक्सलियों के लिए ‘सुनहरा गलियारा’ बनाया है। आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में साल 2025 में 364 नक्सलियों का खात्मा, 1022 की गिरफ्तारी और सर्वाधक 2337 नक्सलियों का आत्मसमर्पण यह साबित करता है कि नक्सलियों में अब माओवादी विचारधारा का आकर्षण पूरी तरह खत्म हो चुका है। पुनर्वास पैकेज के तहत उच्च रैंक कैडरों को 5 लाख रुपये और अन्य को 2.5 लाख रुपये दिये जा रहे हैं, वहीं 3 साल तक 10 हजार रुपये प्रति माह और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यही नहीं, समर्पित हथियारों और गोला-बारूद के लिए अलग से प्रोत्साहन राशि की दी जा रही है। इसका मतलब सरकार ने केवल सैन्य बल का प्रयोग नहीं किया बल्कि नक्सलियों के वैचारिक और आर्थिक आधार पर प्रहार किया है। आज जब हम 31 मार्च 2026 की डेडलाइन की बात करते हैं, तो उसकी सफलता का असली श्रेय सुरक्षा बलों के अलावा उन शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों को भी जाता है जो सुरक्षा बलों के साथ-साथ उन इलाकों में पहुँचे जहाँ जाना मौत को दावत देना था। ‘विकास’ की इस सुगबुगाहट ने नक्सलियों के उस नैरेटिव को खत्म कर दिया है कि सरकार आदिवासियों की दुश्मन है। आज नक्सलवाद केवल एक ढ़हता हुआ ढांचा है जिसमें भारत ‘सुरक्षा-विकास-विश्वास’ के मंत्र के साथ एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रहा है जहाँ विकास की रोशनी देश के सबसे दूरस्थ अंचलों तक बिना किसी डर के पहुंचेगी।


डेढ़ दशक वाला ‘ब्लडी संडे’ वाला दौर खत्म
सरकार की इस निर्णायक पहल ने आज शांति की नई इबारत रखते हुए साल 2010 के ‘ब्लडी संडे’ वाले दौर और आज के शांत होते बस्तर व अभुझमाड़ की तुलना इन आंकड़ों से की जा सकती है। साल 2025 में सुरक्षा बलों ने 364 नक्सलियों को मार गिराया, 1022 को गिरफ्तार किया और 2337 से आत्मसमर्पण कराकर नक्सलवाद की कमर तोड़ कर जनता में विश्वास कायम किया है। साल 2026 के ढ़ाई माह में दो दर्जन से ज्यादा उग्रवादी मारे जा चुके हैं और करीब 350 ने आधुनिक हथियारों के साथ आत्मसमर्पण करके समाज की मुख्यधारा में अपना नया जीवन शुरु करने का फैसला कर चुके हैं। पिछले एक दशक से ज्यादा समय में अब तक सुरक्षा बलो के विभिन्न अभियानों के तहत जहां 16,550 नक्सली गिरफ्तार किये जा चुके हैं। वहीं अब तक उच्च रैंक कैडरों समेत करीब 10,225 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। सरकारी आंकड़ो के मुताबिक, इस दशक में दिसंबर 2025 तक नक्सलवादी घटनाओं में जहां 1734 नागरिक मारे गये और उच्चाधिकारियों समेत करीब 600 सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। वहीं 1841 उग्रवादी मारे गये हैं। यही कारण है कि नक्सली हिंसा में 2010 की तुलना में आज घटनाओं में 88 फीसदी और मौतों में 90 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। नक्सल से प्रभावित प्रभावित पुलिस स्टेशनों में भी 74 फीसदी कमी आई है।  

बहु-आयामी रणनीति में ‘समाधान’
गृह मंत्रालय ने में नक्सलवाद से निपटने के लिए ‘समाधान'(SAMADHAN)रणनीति के रूप में एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें(Smart Leadership) कुशल नेतृत्व और समन्वय, (Aggressive Strategy)उग्रवादियों के खिलाफ आक्रामक अभियान, (Motivation and Training) सुरक्षा बलों का मनोबल और बेहतर प्रशिक्षण, (Actionable Intelligence)सटीक खुफिया जानकारी का तंत्र, (Dashboard Based KPIs) विकास कार्यों की निरंतर निगरानी, (Harnessing Technology) ड्रोन और आधुनिक हथियारों का उपयोग, (Action Plan for Each Theatre) हर प्रभावित क्षेत्र के लिए अलग रणनीति और (No Access to Financing) नक्सलियों की फंडिंग और रसद आपूर्ति को रोकना शामिल रहा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विचारधारा
देश में दशकों पहले, पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव ‘नक्सलबाड़ी’ से उठी चिंगारी ने भारत के एक बड़े हिस्से को अपनी लपटों में ले लिया था। ‘लाल गलियारा’ के नाम से मशहूर यह इलाका पशुपति (नेपाल) से तिरुपति (आंध्र प्रदेश) तक फैला हुआ था। माना जाता है कि नक्सलवाद की जड़ें 1967 के किसान विद्रोह में निहित हैं, जिसका नेतृत्व चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने किया था। यह विचारधारा माओत्से तुंग के ‘सशस्त्र क्रांति’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका लक्ष्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंककर ‘जनता की सरकार’ स्थापित करना है। एक समय था जब नक्सलवाद का प्रभाव भारत के 10 से अधिक राज्यों में था, जिसे ‘पशुपति से तिरुपति’ तक का लाल गलियारा कहा जाता था। इसमें छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य प्रमुख रूप से शामिल थे।