राजनीति विधि-कानून

सुप्रीम कोर्ट का अतिक्रमणकारियों को सख्त संदेश

राजेश कुमार पासी

हल्द्वानी में अतिक्रमण का मामला बहुत जटिल है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर जैसा स्पष्ट रुख अपनाया है, उससे पूरे देश में एक सकारात्मक संदेश गया है। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण देश की बहुत बड़ी समस्या है लेकिन अदालतों के कारण इस समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। वास्तव में जब भी सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही शुरू की जाती है तो अदालतें इस पर रोक लगा देती हैं। ज्यादातर मामलों में यही दलील दी जाती है कि वर्षों तक रहने वाले लोगों को उजाड़ना मानवीय दृष्टि से सही नहीं है।

 अतिक्रमणकारियों को अदालतों, राजनीतिक दलों और एनजीओ का साथ मिल जाता है, इसलिए उनका हौसला बढ़ा हुआ है। देखा जाए तो पूरे देश में लाखो एकड़ सरकारी भूमि अतिक्रमण का शिकार है। विशेष रूप से रेल की पटरियों और सड़कों के आसपास की खाली जमीन पर अतिक्रमण किया जाता है। समस्या यह है कि जब सरकारी जमीन पर कब्जा शुरू होता है तो सरकारी विभाग आंख बंद करके बैठे रहते हैं। जब धीरे-धीरे वहां बसावट हो जाती है तो वोट के लालच में राजनीतिक दल वहां सारी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवा देते हैं। ज्यादातर मामलों में सत्ताधारी दल के नेता इन लोगों को वोट बैंक के रूप में देखते हैं और इनका संरक्षण करते हैं। अगर संबंधित विभाग अपनी जमीन खाली भी करवाना चाहे तो ये नेता अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके मामले को लटका देते हैं। अगर विभाग अदालत चला जाए तो वहां मामला वर्षों तक लटका रहता है।

 अतिक्रमणकारी अदालत में दलील देते हैं कि वो गरीब लोग हैं. अगर उन्हें हटाया जाता है तो वो सड़क पर आ जाएंगे, इसलिए उनके पुनर्वास  का इंतजाम किया जाए। कितनी अजीब बात है कि ये लोग पहले जबरन कब्जा करके वर्षों तक सरकारी जमीन का इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें हटाया जाता है तो उन्हें मुआवजा और पुनर्वास भी चाहिए। देखा जाए तो वर्षों तक सरकारी जमीन का इस्तेमाल करने की एवज में इनसे किराया वसूला जाना चाहिए। दूसरी बात , जो अफसर और नेता अतिक्रमण के लिये जिम्मेदार होते हैं, उनसे राजस्व हानि की भरपाई की जानी चाहिए। सरकारी जमीन पर कब्जे के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस सवाल का जवाब हर अतिक्रमण के लिए पूछा जाना चाहिए कि जब कब्जा हो रहा था तो उसे उस समय ही क्यों नहीं रोक दिया गया। 

              हल्द्वानी का अतिक्रमण भी अफसरों और नेताओं की मिलीभगत का नमूना है। रेलवे की 31 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा करके 5000 परिवार वहां बस गए हैं। कब्जा की गई जमीन पर लगभग 50000 की आबादी रहती है। उनका दावा है कि वो लोग यहां 45-50 साल से रह रहे हैं। ये सवाल तो उठता है कि 31 हेक्टेयर जमीन पर जब कब्जा हो रहा था तो रेलवे कहां सोया हुआ था। ये कब्जा एक-दो दिन में नहीं हुआ होगा. धीरे-धीरे लोगों ने वहां कच्चे मकान बनाये होंगे और फिर लोगों का आना बढ़ता गया होगा। कुछ वर्षों बाद लोगों ने वहां पक्के मकान बना लिए होंगे। आज वहां बड़े-बड़े भवन खड़े हुए हैं। वहां सिर्फ गरीब लोग नहीं रहते बल्कि सम्पन्न लोगों की आबादी बढ़ गई है। वहां कई मस्जिदों और मदरसों का निर्माण कर लिया गया है। इसके अलावा वहां सरकार की तरफ से पानी की दो टंकी, 5 प्राथमिक विद्यालय, एक छोटा अस्पताल और सामुदायिक केंद्र बनाए गए हैं। वहां पर 15 निजी स्कूल और दूसरे व्यापारिक केंद्र भी हैं। सरकारी सुविधाओं को एक अवैध कब्जे पर उपलब्ध करवाना प्रशासन और शासन की शर्मनाक करतूत है। इससे साबित होता है कि वोट बैंक के लिए नेताओं ने इस कब्जे को बनाये रखने में मदद की है। आज कुछ राजनीतिक दल अतिक्रमणकारियों के पक्ष में खड़े हुए हैं, इससे साबित होता है कि इन्हीं लोगों की मेहरबानी से ये कब्जा बना हुआ था। 

             इस कब्जे की ओर किसी का ध्यान नहीं था. एक पुल के गिरने से इस कब्जे के खिलाफ कार्यवाही शुरू हुई। बनभूलपुरा में गौला पुल गिरने की जब जांच हुई तो पता लगा कि रेलवे की जमीन पर कब्जा करने वालो के खनन के कारण ही पुल गिरा था । इससे मामले की जांच में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मामला भी जुड़ गया। इसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका में बताया गया कि रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण करके घर, मस्जिद और मदरसे बने हुए हैं और रेलवे ने बताया कि 31.87 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा किया गया है। इसके बाद माननीय अदालत ने दिसंबर, 2022 में अतिक्रमण हटाने का आदेश दे दिया। कब्जाधारी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर चले गए जहां जनवरी, 2023 में इस आदेश पर रोक लगा दी गई। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटा दिया है और इस अतिक्रमण को हटाने के आदेश जारी कर दिए हैं। ज्यादातर कब्जाधारी मुस्लिम समाज से आते हैं और अभी रोजे चल रहे हैं, इसलिए अदालत ने ईद के बाद इस कब्जे को हटाने के निर्देश दिए हैं।

              कब्जाधारियों के वकीलों ने बहुत जोर लगाया कि उन्हें न हटाया जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि सरकारी भूमि पर कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। देखा जाए तो माननीय सुप्रीम अदालत ने सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों को सख्त संदेश दिया है। कब्जाधारियों के वकील का कहना था कि वो लोग पिछले 50 सालों से वहां रह रहे हैं, रेलवे को अपने विकास कार्य दूसरी जगह कर लेने चाहिए और उन्हें वहीं रहने देना चाहिए। जवाब में न्यायाधीशों ने कहा कि ये कब्जाधारी तय नहीं कर सकते कि रेलवे अपने विकास कार्य कहाँ और कैसे करे। इसमें कोई विवाद नहीं है कि भूमि सरकार की है और सरकार को ही तय करना है कि उसे जमीन का कैसे इस्तेमाल करना है। रेलवे की जमीन पर कब्जा करने वालो को वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन अवैध कब्जाधारियों को जमीन खाली करनी ही पड़ेगी।

कब्जाधारियों के वकील का कहना था कि इनको हटाने से पहले इनके पुनर्वास का इंतजाम किया जाए। इसके जवाब में अदालत ने कहा कि पुनर्वास इनकी मदद ज्यादा है, अधिकार कम है। कब्जाधारियों के प्रति मानवीय रुख अपनाते हुए अदालत ने कहा कि राज्य के अधिकारियों को प्रभावितों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पात्रता को देखते हुए पुनर्वास का इंतजाम किया जाए। ये कब्जाधारियों के लिए नई समस्या बनने वाली है क्योंकि पीएम आवास योजना की पात्रता के लिए सभी योग्य साबित नहीं होंगे। ये योजना गरीब लोगों के लिए बनाई गई है जबकि वहां बड़ा वर्ग सम्पन्न लोगों का है। इसके अलावा भी इस योजना का लाभ लेने के लिए उचित दस्तावेज उपलब्ध करवाने होंगे । इन कब्जाधारियों में बड़ी संख्या अवैध घुसपैठियों की है जो योजना का लाभ नहीं उठा पाएंगे। कब्जाधारियों के वकील प्रशांत भूषण का कहना था कि रेलवे के पास और भी जमीन है, वो वहां जाकर विकास कार्य कर सकता है। अदालत ने कहा कि ये हम नहीं तय कर सकते कि रेलवे अपने विकास कार्य कहां करे। देखा जाए तो अदालत ने सरकारी भूमि पर कब्जा करने वालों को बता दिया है कि सरकारी भूमि का इस्तेमाल कैसे करना है, ये सरकार का अधिकार है। कब्जाधारियों को इतने दिन रहने दिया गया, ये भी बड़ी बात है। वो लोग तय करें कि उन्हें पीएम आवास योजना का लाभ लेना है या नहीं। 

              देखा जाए तो अदालत ने कब्जाधारियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है लेकिन सरकारी जमीन पर कब्जे को भी गलत भी ठहरा दिया है। इसका दूसरा पहलू भी है कि इस मामले में सिर्फ कब्जाधारी ही दोषी नहीं हैं। वो लोग वहां दशकों से कब्जा करके बैठे हुए थे लेकिन उन्हें हटाने की कोशिश नहीं की गई, इसलिए अदालत को लगता है कि योग्य व्यक्तियो के लिए पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए। इस मामले ने बता दिया है कि अवैध कब्जे देश की बड़ी समस्या है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अवैध कब्जे के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। उन्होंने लगभग 68000 एकड़ जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त करवाया है। इससे साबित होता है कि पूरे देश में कितनी जमीन होगी, जिस पर अभी भी अवैध कब्जा बना हुआ है।

 इस मामले में उत्तराखंड सरकार ने भी बड़ी कार्यवाही की है। योगी आदित्यनाथ को तो लोग बुलडोजर बाबा कहते हैं क्योंकि अवैध कब्जे के खिलाफ उनका बुलडोजर दौड़ता रहता है। उनकी देखादेखी अन्य राज्यों में भी अवैध कब्जों के खिलाफ कार्यवाही हो रही है। विशेष रूप से भाजपा शासित राज्यों में यह अभियान तेजी से चल रहा है। गुजरात में सरकार ने बड़ी मात्रा में सरकारी भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त करवाया है। सवाल यह है कि ये काम पहले क्यों नहीं किया गया और दशकों तक कब्जे क्यों बने रहे। इससे यह भी साबित होता है कि मोदी सरकार के आने से पहले अवैध कब्जों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होती थी।

 कई राज्यों में भाजपा की सरकारें मोदी सरकार के आने से पहले से काम कर रही हैं, लेकिन उनका भी अभियान 2014 के बाद ही शुरू हुआ है। स्पष्ट है कि अवैध कब्जों के खिलाफ कार्यवाही में मोदी सरकार की भी अहम भूमिका है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अवैध कब्जाधारियों के मन में भय पैदा किया है कि उनका कब्जा कितना भी पुराना हो, वो अवैध ही रहेगा।

राजेश कुमार पासी