राजेश कुमार पासी
इस देश का विपक्ष जनता की अदालत में मोदी सरकार से नहीं लड़ पा रहा है, इसलिए वो कानून की अदालत में उसे घसीटना चाहता है। अभी तक कई मौकों पर विपक्ष अपनी चाल में कामयाब रहा है लेकिन लगता है कि नए सीजेआई इस चाल को समझ चुके हैं। उन्होंने पिछले दिनों एक मामले में टिप्पणी की थी कि वो राजनीति के लिए अदालतों का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दे सकते । उनका कहना था कि आजकल चुनाव के समय कुछ लड़ाई अदालतों में भी लड़ी जाती है । विपक्ष के कुछ बड़े वकील किसी न किसी मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़े रहते हैं । इन वकीलों का सुप्रीम कोर्ट में इतना प्रभाव है कि एक ही दिन में मामले की सुनवाई शुरू हो जाती है । अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके ऐसे वकीलों ने मोदी सरकार के खिलाफ कई आदेश प्राप्त किये हैं । सीजेआई सूर्यकांत त्रिपाठी नहीं चाहते हैं कि कुछ वकील अपने एजेंडे के लिए माननीय अदालत का इस्तेमाल कर सके ।
सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी को 12 प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सख्त रवैया अपनाया है । याचिकाकर्ताओं ने संवैधानिक नैतिकता के उल्लंघन को रोकने के लिए संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों और नौकरशाहों के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग की थी । सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस नागरत्ना, और जस्टिस बागची की पीठ के सामने याचिकाकर्ताओँ की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पक्ष रखते हुए कहा कि देश का माहौल जहरीला हो गया है और सुप्रीम कोर्ट ही इसे सुधार सकता है । वास्तव में याचिकाकर्ताओं ने असम, उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बयानों को आधार बनाकर हेट स्पीच के खिलाफ कठोर दिशानिर्देश जारी करने की मांग की है । इसके अलावा इस याचिका में केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़ें और कुछ नौकरशाहों के बयानों को भी शामिल किया गया है । याचिकाकर्ता चाहते हैं कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों और नौकरशाहों के सार्वजनिक बयानों पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम अदालत द्वारा दिशानिर्देश बनाएं जाएं । माननीय अदालत ने इस याचिका को सुनने से ही मना कर दिया । अदालत का मानना है कि ये याचिका भाजपा के मुख्यमंत्रियों को निशाना बनाने के लिए दायर की गई है । इस याचिका को देखकर लगता है कि सिर्फ भाजपा के मुख्यमंत्री ही हेट स्पीट देते हैं ।
माननीय न्यायाधीशों का यह भी कहना है कि ये याचिका अनुच्छेद-32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के अधिकार का दुरुपयोग है । न्यायाधीशों का कहना है कि उच्च न्यायालय भी संवैधानिक न्यायालय होते हैं, उनके पास भी इसे सुनने का अधिकार है और उनके पास हमसे ज्यादा अधिकार हैं । अदालत का कहना है कि अनुच्छेद-32 के तहत अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए नागरिकों को सीधे सुप्रीम कोर्ट आने का अधिकार है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि राजनीतिक फायदों और नुकसान के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया जाए । खंडपीठ ने कहा कि याचिका में समस्या को उजागर करते हुए कुछ चुनिंदा व्यक्तियों पर निशाना साधा गया है । उनका कहना था कि यह याचिका पूर्ण रूप से एकतरफा दिखाई देती है । इसमें उन लोगों को शामिल नहीं किया गया है जो नियमित रूप से हेट स्पीच देते हैं । याचिका को देखकर लगता है कि सिर्फ इसमें शामिल लोग ही हेट स्पीच देते हैं । माननीय अदालत का कहना है कि याचिकाकर्ताओं को इसका ध्यान रखना चाहिए था कि याचिका सिर्फ कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाने के लिए न हो । सीजेआई ने कहा कि मामला महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए निष्पक्ष याचिका दायर की जानी चाहिए ।
वास्तव में अदालत ने याचिकाकर्ताओं की मंशा को समझ लिया है । अदालत को समझ आ गया है कि कुछ लोग अपने एजेंडे के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं । अगर इन्हें सच में हेट स्पीच से परेशानी होती तो ये लोग पार्टी विशेष को टारगेट नहीं करते । वास्तव में याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य हेट स्पीच न होकर भाजपा के मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आदेश पारित करवाना है । क्या वो नहीं जानते कि हेट स्पीच सभी पार्टियों के नेताओं द्वारा की जाती है । जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा को लेकर हेट स्पीच की बाढ़ आई हुई है । देखा जाए तो नफरती भाषण खत्म करने के नाम पर याचिका दाखिल करने वाले खुद ही नफरत से भरे हुए लोग है । इनकी नफरत ही इन्हें अदालत ले आई है । इनकी याचिका अपने आप में एक हेट स्पीच है जो कहती है कि भाजपा के तीन मुख्यमंत्री ही हेट स्पीच कर रहे हैं ।
कितनी अजीब बात है कि दुराग्रह से ग्रस्त लोग हेट स्पीच बंद करवाना चाहते हैं जबकि यही लोग हेट स्पीच वालों के समर्थन में खड़े रहते हैं । हेट स्पीच को लेकर जब किसी के ऊपर कार्यवाही की बात आती है तो यही बड़े-बड़े वकील उनके लिए अदालत में खड़े हो जाते हैं । यही कारण है कि किसी के खिलाफ भी कार्यवाही नहीं हो पाती है । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पुत्र उदयनिधि मारन ने सनातन धर्म को डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारी बता दिया था और कहा था कि इसका विरोध नहीं होना चाहिए बल्कि इसे खत्म कर देना चाहिए । इसके अलावा उन्होंने हिंदी भाषा को लेकर कई बार जहर उगला है । अगर यही बात उन्होंने इस्लाम को लेकर कही होती तो यही याचिकाकर्ता उनके खिलाफ अदालत में खड़े होते । अजीब बात है कि एक धर्म को खत्म कर देने वाला बयान इन्हें हेट स्पीच नहीं लगता है। इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र प्रियांक खड़गे ने भी हिन्दू धर्म को लेकर इतने कड़वे बोल बोले हैं कि उन्हें दोहराना अच्छा नहीं लगता। अगर भाजपा के नेता विपक्ष के नेताओं के खिलाफ हेट स्पीच करते हैं तो ये काम दूसरी तरफ से भी होता है। अजीब बात तो यह है कि सबसे ज्यादा नफरती बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिया जाता है। एक तरह से उन्हें सीधी गाली देने का चलन विपक्षी नेताओं ने शुरू किया हुआ है। इसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी भाजपा नेताओं द्वारा भद्दी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। सवाल यह है कि यह कौन तय करेगा कि कौन ज्यादा नफरत फैला रहा है।
पिछले कुछ समय से राजनीतिक माहौल में ज्यादा गर्मी बढ़ गई है, इसलिए एक-दूसरे के खिलाफ नफरती भाषा बढ़ती जा रही है। इस दौड़ में कोई पीछे नहीं है, इसलिए किसी एक पक्ष को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने सिर्फ एक पक्ष के लोगों को नफरती बयान देने से रोकने की गुहार लगाई है। वो चाहते हैं कि अदालत उनको रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करे । अगर सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश जारी कर देता है तो उसके उल्लंघन को रोकने की जिम्मेदारी किस पर होगी। देखा जाए तो इन दिशानिर्देशों को लागू करने की जिम्मेदारी भी अदालत पर ही आ जायेगी। इसके बाद अदालत में इन दिशानिर्देशों के उल्लंघन के मामलों की बाढ़ आ सकती है।
देखा गया है कि जब मोदी सरकार और भाजपा हिन्दू धर्म और अपने खिलाफ दिए गए बयानों पर कार्यवाही करती है तो विपक्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में बता देता है। वास्तव में किसी के नेता के भाषण के खिलाफ जब कार्यवाही शुरू की जाती है या सिर्फ कार्यवाही करने की बात भी की जाती है तो उसके पक्ष के लोग उसके बचाव में खड़े हो जाते हैं। बहुत कम ऐसा देखने में आया है कि अपने नेता की हेट स्पीच का बचाव न किया गया हो। राज्य सरकारें अपने राज्यों में अपनी पार्टी के नेताओं के खिलाफ कभी कार्यवाही नहीं करती बल्कि उनका बचाव करती हैं। ये पक्षपाती रवैया सभी दलों द्वारा अपनाया जाता है। देखने में तो यह आया है कि जब उन नेताओं के खिलाफ मुकदमा दायर हो जाता है तो संबंधित राज्य सरकारें उनका मुकदमा जनता के पैसे से लड़ती हैं। अक्सर ऐसे मामलों में दूसरा पक्ष कितना भी शोर मचाये लेकिन संबंधित सरकारें मामला तक दर्ज नहीं करती । ऐसे मामलों को लेकर जनता जब अदालत जाती है तो मजबूरी में मामला दर्ज किया जाता है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा है कि राजनीतिक दलों के नेताओं को भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए।
अदालतें आदेश दे सकती हैं, लेकिन इनका पालन करना तो राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के हाथ में ही है। उनकी बात सभी दलों पर लागू होती है। एक-दूसरे को दोष देने की जगह सभी दलों को राजनीतिक मर्यादा में रहकर बोलना चाहिए। दक्षिण भारत के कई नेताओं ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का कई बार इस्तेमाल किया है लेकिन इस याचिका में उनका जिक्र तक नहीं किया गया है। महाराष्ट्र में हिंदी बोलने वालों के खिलाफ एक नेता ने जमकर जहर उगला, उसके खिलाफ कार्यवाही करने की बात किसी भी दल ने नहीं की। अदालत ने याचिका को फेंककर अच्छा किया है । एजेंडाधारी लोगों के साथ यही किया जाना चाहिए ताकि बेमतलब की राजनीति में अदालत को खींचने की मुहिम पर रोक लगे।
राजेश कुमार पासी