पंकज जायसवाल
आज असम में चुनाव हो रहे हैं. यह चुनाव सिर्फ राज्य का चुनाव नहीं है, पूर्वोत्तर में शांति और स्थिरता के भविष्य का भी चुनाव है. असम पूर्वोत्तर के सभी राज्यों की सीमाओं को जोड़ता है और पूर्वोत्तर के केंद्र में है. ऐसे में अगर असम में शांति और स्थिरता है तो पूर्वोत्तर में शांति और स्थिरता को मजबूत रखने का आधार और मजबूत होगा। असम एक ट्राइबल प्रदेश है और वहां शांति की चर्चा के बीच बोडोलैंड की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है. आज असम की शांति में शांत और स्थिर बोडोलैंड का होना जरुरी है. 2020 में हुए बोडो एकॉर्ड के बाद आई शांति आज सबकी साझा जिम्मेदारी है कि इस शांति को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर संरक्षित किया जाए। इसीलिए बोडोलैंड में शांति की निरंतरता इस असम चुनाव की सबसे बड़ी कसौटी है. बोडोलैंड के बदलाव को पिछले १२ सालों में मैंने नजदीक से देखा है. इस लेख में हम चर्चा करते हैं कि २०२० के पहले बोडोलैंड कैसा था, २०२० के बाद कैसा रहा और बोडोलैंड में शांति और स्थिरता के लिए किस किस का योगदान रहा.
लगभग छह वर्ष पहले तक बोडोलैंड एक अशांत क्षेत्र के रूप में जाना जाता था। लंबे संघर्ष, जातीय तनाव और राजनीतिक अस्थिरता ने इस क्षेत्र को विकास से दूर कर दिया था, युवा बेचैन और दिशाविहीन थे। दशकों तक शांति के लिए संघर्ष कर रहे बोडोफ़ा उपेंद्र नाथ ब्रह्मा का सपना तब साकार हुआ जब 27 जनवरी 2020 को नरेंद्र मोदी, अमित शाह, हिमंता बिस्वा सरमा, प्रमोद बोरो समेत सभी स्थानीय नेताओं के सहयोग से भारत सरकार, असम सरकार, नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड , ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन, और यूनाइटेड बोडो पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन के बीच शांति समझौते पर किया गया हस्ताक्षर बोडोलैंड में शांति युग का प्रस्तावना बना। २०२० का यह समझौता स्थायी शांति की दिशा में निर्णायक मोड़ साबित हुआ। असम में बोडो सबसे बड़ा समुदाय है और असम की कुल जनसंख्या का लगभग 5 से 6 फीसदी हैं। अबसु के साथ पहला बोडो समझौता 1993 में हुआ था और सीमित राजनीतिक शक्तियों के साथ बोडोलैंड स्वायत्त परिषद का गठन हुआ लेकिन सन २०२० में हुआ बोडो समझौता अब तक के किये गए समझौतों में सबसे निर्णायक समझौता बना और इससे स्थायी शांति की नींव पड़ी. इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में दशकों पहले बोडोफ़ा उपेंद्र नाथ ब्रह्मा के संघर्ष की भूमिका रही, जिन्हें सम्मान से “फादर ऑफ बोडोज़” कहा जाता है । बोडोलैंड में शांति की स्थापना आज उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है.
समझौते के तुरंत बाद हुए चुनाव में अबसु से राजनीति में आए प्रमोद बोरो को जनता का व्यापक समर्थन मिला और वे बोडोलैंड टेरीटोरियल रीजन जिसे बीटीआर कहते हैं के चीफ चुने गए । ये लेखक भी हैं और गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं. एक गाँधीवादी नेता का दशकों तक हिंसाग्रस्त रहे क्षेत्र में चीफ चुने जाने की घटना ने प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर नई उम्मीद पैदा की । लोकतंत्र में लोगों की आस्था बढ़ी और चुनाव उत्सव जैसे होने लगे.
2025 के बीटीआर चुनाव में भी जनता ने बड़ी संख्या में मतदान किया और राजनैतिक गणित में हुए बदलाव के कारण सत्ता परिवर्तन हुआ और अब हग्रामा मोहिलारी चीफ बने। सत्ता में बदलाव होना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ घटना है। हालांकि सत्ता परिवर्तन के बाद बीते पांच सालों में बोडो एकॉर्ड के बाद जो शांति स्थापित हुई उसके उलट देखने को मिला। कुछ स्थानों पर धरना-प्रदर्शन, हिंसा और असंतोष की घटनाएं देखने को मिलीं, जो बीते ५ सालों में इतिहास का विषय बन गई थी. इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि शांति की स्थापना ही नहीं उसकी निरंतरता बनाए रखना अभी भी एक वहां एक साझा जिम्मेदारी है. चुनाव के बाद भले ही चीफ बदल जाते हों सत्ता परिवर्तन के कारण बहुत अरसे के बाद बहुत मेहनत और त्याग से अर्जित इस शांति की प्रक्रिया पर ब्रेक नहीं लगना चाहिए। पहले यह जिम्मेदारी प्रमोद बोरो की थी और अब ये जिम्मेदारी वर्तमान चीफ हग्रामा मोहिलारी की है. आज असम चुनाव है और इस चुनाव में असली कसौटी बोडोलैंड की शांति है जिसमें जनता के हग्रामा मोहिलारी का 2020 के पूर्व का कार्यकाल और सितम्बर २०२५ के बाद का कार्यकाल है तो वहीँ प्रमोद बोरो का २०२० से २०२५ का पांच वर्ष का कार्यकाल है. दोनों के तथ्य जनता के सामने हैं , बोडोलैंड में शांति की कसौटी ही बतायेगा की दोनों चीफ में से कौन चीफ बोडोलैंड की आकांक्षाओं के अनुरूप है।
2020 के समझौते के बाद बीते पांच सालों में बीटीआर सरकार ने युवाओं को हिंसा से दूर रखने के लिए कई पहलें की । खेल प्रतियोगिताएं, फुटबॉल टूर्नामेंट, कौशल प्रशिक्षण, रोजगार मेले, बोडोलैंड इंटरनेशनल नॉलेज फेस्टिवल और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन प्रयासों का उद्देश्य युवाओं को सकारात्मक दिशा देना था। पुनर्वास कार्यक्रमों के माध्यम से पूर्व उग्रवादियों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की गई। समावेशी शासन के तहत क्षेत्र के 26 समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की गई और उनके सुझावों के आधार पर विज़न दस्तावेज तैयार किया गया। इससे लोकतांत्रिक सहभागिता को मजबूती मिली और विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बढ़ा। कई वर्षों बाद लोगों ने लगातार शांति का अनुभव किया, जो इस क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि मानी गई।
बीते पांच सालों में शांति को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाने के लिए कोकराझार को “सिटी ऑफ पीस” के रूप में प्रस्तुत किया गया । विभिन्न विकास एजेंसियों के साथ साझेदारी कर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया गया। भूमि अधिकार और सामुदायिक योजनाओं को प्राथमिकता दी गई। यही कारण था की तामुलपुर ब्लॉक को राष्ट्रीय स्तर पर आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉक का पुरस्कार मिला ।
बोडोलैंड का अनुभव यह बताता है कि शांति और विकास केवल समझौते से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों से कायम रहती है। यदि संवाद, समावेश और विकास की प्रक्रिया जारी रहती है तो बोडोलैंड न केवल उत्तर-पूर्व भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए शांति का स्थायी मॉडल बन सकता है। आज जब दुनिया के कई हिस्से युद्ध, आतंक, उग्रवाद, असंतोष और हिंसा की चपेट में हैं, ऐसे समय में आज के बोडोलैंड संदेश देता है कि अहिंसा, सही नेतृत्व, राजनीतिक इच्छाशक्ति, युवाओं के लिए रचनात्मक दिशा और विकास आधारित नीतियाँ मिलकर किसी भी हिंसाग्रस्त क्षेत्र को शांति में बदल सकती हैं। गांधी और नेल्सन मंडेला के बाद संवाद और सह-अस्तित्व के जिस रास्ते की चर्चा होती रही, गांधीवादी नेता प्रमोद बोरो के नेतृत्व में पिछले पांच सालों में बोडोलैंड में हुए बदलाव का अनुभव उसी विचार को नए संदर्भ में मजबूत करता है और इसमें देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और असम के मुख्यमंत्री सबका योगदान है। सितम्बर २०२५ के बाद यह जिम्मेदारी अब हग्रामा मोहिलारी के पास है जिन्हे इस विधानसभा चुनाव तक सिर्फ ६ महीने का ही कार्यकाल मिला है काम करने को. लेकिन जनता के सामने उनका इस ६ माह और पूर्व का कार्यकाल है बनाम २०२० के पांच वर्ष का कार्यकाल। इस चुनाव में देखना है कि जनता किसे अपना समर्थन देती है.
पंकज जायसवाल