आर्थिकी
विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने
/ by कमलेश पांडेय
कमलेश पांडेय दावोस में चली विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक में भारत ने अपनी मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक उपस्थिति दर्ज कराई है। यहां पर भारतीय ट्रेड कूटनीति ने जो पॉलिसी नैरेटिव सेट किए और ग्लोबल इमेज विकसित किया, वह यहां कई मायने में अहम है। सबसे बड़ी बात तो यह कि यहां पर भारत ने वैश्विक निवेशकों के सामने खुद को चीन का वैकल्पिक हब के रूप में प्रस्तुत किया और विकसित भारत होने का स्थायी नजरिया पेश किया। दरअसल, इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत ने जिस आर्थिक स्थिरता, वैश्विक लोकतंत्र और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर बल दिया, उससे वैश्विक नीति-निर्धारण में इंडिया की भूमिका और अधिक मजबूत हुई। जब संयुक्त राष्ट्र संघ की कीमत पर अमेरिका नई विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु एक से बढ़कर एक जोखिम भरे दांव चल रहा हो, उस दौर में भी भारत की यह अहम उपस्थिति बहुत कुछ चुगली करती है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने के मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट हैं जिसे भरपूर दुनियावी समर्थन भी मिल रहा है। इसके अहम आर्थिक व कूटनीतिक मायने हैं। देखा जाए तो इस महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय बैठक में भारत के विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख उद्योगपतियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल ने जिस तैयारी के साथ शिरकत की और निजी वैश्विक निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया, उसका रणनीतिक महत्व है। इस दौरान देखा गया कि दावोस में भारत का प्रतिनिधिमंडल रेल, आईटी, ऊर्जा और उद्योग जैसे मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक फैला हुआ था जबकि रिलायंस, टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस जैसे अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट दिग्गजों की भागीदारी ने निजी क्षेत्र में भारत की अहम ताकत दिखाई। इससे नानाविध लाभ मिला और निवेश समझौते हुए, जैसे महाराष्ट्र के लिए हजारों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर होना। इससे दावोस में भारत पर चर्चा का केंद्र बना रहा। चर्चा भी वह कि क्या भारत मैन्युफैक्चरिंग और निवेश का नया हब बन सकता है, खासकर दिन ब दिन बदलते भू-राजनीतिक तनावों के बीच। सबसे खास बात यह कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अध्यक्ष ने भारत को सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताते हुए पीएम मोदी के सुधारों और ग्लोबल साउथ की आवाज की भरपूर सराहना की। इससे भारत-ईयू व्यापार समझौते पर भी सकारात्मक इनपुट के संकेत मिले। इस तरह से देखा जाए तो दावोस (WEF 2026) की मौजूदा बैठक से भारत को सीधे‑सीधे दो तरह के बड़े फायदे मिलते दिखाई दे रहे हैं– पहला, निवेश व व्यापार के ठोस मौके, और दूसरा, भारत की छवि व कूटनीतिक प्रभाव में बढ़त। वहीं, निवेश और जॉब के बेशुमार मौके मिलने की बात अलग है। कहना न होगा कि भारत का पवेलियन और अलग‑अलग राज्य (खासतौर पर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि) दावोस में निवेश आकर्षित करने के लिए आक्रामक तरीके से रोडशो, मीटिंग और एमओयू साइन कर रहे हैं, जिनका फोकस मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर व डिजिटल इकोनॉमी पर है। दरअसल पिछले सालों के ट्रेंड के आधार पर दावोस प्लेटफॉर्म से भारत को अरबों डॉलर के निवेश आश्वासन मिलते रहे हैं, जो बाद में प्लांट, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप फंडिंग के रूप में नौकरियां और उत्पादन क्षमता बढ़ाते हैं। वहीं इस बार की खास बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावोस में भारतीय बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट लीडर्स के साथ विशेष बैठक कर रहे हैं, जिसे संभावित भारत‑अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि यहां किसी प्रकार की रूपरेखा या राजनीतिक सहमति बनती है तो आगे चलकर टैरिफ, मार्केट एक्सेस और टेक्नोलॉजी/डिफेंस कोऑपरेशन में भारत के लिए बेहतर शर्तें निकल सकती हैं। विश्व आर्थिक मंच (WEF) पर भारत को “सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था”, ग्लोबल ग्रोथ में लगभग 20 प्रतिशत योगदान देने की क्षमता वाला देश और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़ के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। इससे भारत की पॉलिसी नैरेटिव मजबूत हुई है और देश के ग्लोबल इमेज में उत्तरोत्तर सुधार होते रहने के संकेत मिले हैं। ऐसा इसलिए कि अश्विनी वैष्णव जैसे नरेंद्र मोदी के कुशल मंत्री वहाँ अगले 5 साल के लिए 6–8% ग्रोथ, 2047 तक प्रति व्यक्ति आय 5 गुना करने, ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस, लेबर रिफॉर्म और डिजिटल पब्लिक इंफ्रा (UPI आदि) जैसे एजेंडा को सफलता पूर्वक पेश कर रहे हैं, जिससे विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ता है। उनकी कोशिशों से भारत के राज्यों को भी भरपूर लाभ मिलने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र राज्य उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर व मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर को ग्लोबल प्लेयर्स के सामने रख कर अलग से निवेश आकर्षित कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर इंडस्ट्रियलाइजेशन की संभावनाएं बढ़ती हैं। वहां देखा गया कि दावोस का “इंडिया पवेलियन” अब डील‑मेकिंग का हब बन चुका है, जहाँ राज्य सरकारें और केंद्र सरकार संयुक्त रूप से “टीम इंडिया” के रूप में प्रेज़ेंट हो रही हैं। इससे दुनिया को स्पष्ट संदेश जाता है कि भारत में नीतिगत स्थिरता और कोऑर्डिनेशन की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही दावोस से सीधे सीधे किसी को सब्सिडी या स्कीम नहीं मिलती है, लेकिन वहां तय हुए निवेश, व्यापार समझौते, और पॉलिसी भरोसे का असर मीडियम टर्म में नौकरियों, इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के रूप में स्पष्ट दिखता है। यहां पर यदि भारत निवेश का भरोसेमंद सेंटर बनता प्रतीत होता है तो मैन्युफैक्चरिंग/ग्रीन एनर्जी/डिजिटल सेक्टर में बड़े प्रोजेक्ट आते हैं, जिसका असर वेतन, लोकल इकोनॉमी, टैक्स रेवेन्यू और कल्याणकारी व्यय पर पड़ेगा, जो अंततः आम नागरिक तक पहुँचेगा। यही वजह है कि दावोस की हालिया विश्व आर्थिक मंच (WEF) 2026 बैठक में भारत ने निवेश आकर्षण और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित प्रमुख पहलों की घोषणा की, जिसमें निजी क्षेत्र की बड़ी योजनाएं शामिल रहीं। ये घोषणाएं महाराष्ट्र, असम और झारखंड जैसे राज्यों में ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रा पर फोकस करती हैं। यदि उपलब्धियों की बात करें तो अडानी ग्रुप ने एविएशन, क्लीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रा और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में 6 लाख करोड़ रुपये (लगभग 6.6 बिलियन डॉलर) के निवेश का ऐलान किया। इसमें असम में 2700 मेगावाट सौर क्षमता, महाराष्ट्र में धारावी पुनर्विकास, नवी मुंबई एयरपोर्ट लॉजिस्टिक्स, 3000 मेगावाट ग्रीन डेटा सेंटर, 8700 मेगावाट पंप्ड स्टोरेज और सेमीकंडक्टर फैब शामिल हैं। यह 7-10 वर्षों का प्लान रोजगार सृजन और ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देगा। वहीं, झारखंड में टाटा स्टील ने ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट्स के लिए 11,000 करोड़ रुपये निवेश की प्रतिबद्धता जताई जबकि महाराष्ट्र ने रायगढ़-पेण ग्रोथ सेंटर की घोषणा की, जो 1 लाख करोड़ के निवेश का केंद्र बनेगा। देखा जाए तो दावोस में वैश्विक साझेदारियां मजबूत हुईं हैं। यहीं पर भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर सकारात्मक प्रगति हुई, जिसे ईयू प्रमुख ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा। वहीं, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एआई (AI) समिट होस्ट करने की घोषणा की जो भारत के वैश्विक तकनीकी नेतृत्व को मजबूत करेगी। वहीं ये पहलें भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने पर जोर देती हैं। कुलमिलाकर दावोस बैठक से भारत को प्राप्त निवेश प्रतिबद्धताएँ निम्नलिखित हैं जो मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर और डिजिटल इकोनॉमी पर केंद्रित हैं, जो लाखों नौकरियाँ पैदा करने की क्षमता रखती हैं। इनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के माध्यम से 5-10 लाख नौकरियाँ बनने का अनुमान है, खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े व अहम राज्यों में। पिछले दावोस चक्रों के आधार पर 20 लाख करोड़ रुपये के निवेश से औसतन 5-8 लाख प्रत्यक्ष नौकरियाँ (फैक्ट्री वर्कर, इंजीनियर) और दोगुने अप्रत्यक्ष रोजगार (लॉजिस्टिक्स, सर्विसेज) उत्पन्न होते हैं। हरित ऊर्जा व डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स से विशेष रूप से 2-3 लाख हाई-स्किल्ड जॉब्स (टेक्नीशियन, एनालिस्ट) बनेंगी। पहला, मैन्युफैक्चरिंग: फैक्ट्री ऑपरेटर, स्किल्ड वेल्डर, क्वालिटी कंट्रोलर- 3 लाख+ जॉब्स, मुख्यतः स्किल्ड/सेमी-स्किल्ड श्रमिक। दूसरा, हरित ऊर्जा: सोलर इंस्टॉलर, विंड टरबाइन टेक्नीशियन, प्रोजेक्ट मैनेजर – 1-2 लाख जॉब्स, फोकस इंजीनियरिंग व सस्टेनेबिलिटी स्किल्स पर। तीसरा, डेटा सेंटर/डिजिटल: सर्वर एडमिन, डेटा एनालिस्ट, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट– 1 लाख+ हाई-पे जॉब्स, आईटी/सॉफ्टवेयर बैकग्राउंड वालों के लिए। जहां तक इसके क्षेत्रीय प्रभाव की बात है तो उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर व डेटा सेंटर से स्थानीय स्तर पर 2 लाख+ जॉब्स, जिसमें 40% महिलाओं/युवाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। वहीं, महाराष्ट्र व गुजरात जैसे राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से अतिरिक्त 1-2 लाख रोजगार जोड़ेंगे। इन जॉब्स में 60% स्किल्ड (ITI/डिप्लोमा) की जरूरत होगी, इसलिए ITI व अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग पर फोकस बढ़ेगा। देरी से बचने के लिए एमओयू लागू करने पर सबकुछ निर्भर करेगा अन्यथा सिर्फ 50-70% ही मटेरियलाइज होंगी। कमलेश पांडेय
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