मैं कोई किताब नहीं

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मंजुल भटनागर मैं कोई किताब नहीं , एक कविता भी नहीं , एक शब्द भी नहीं , मेरा कोई अक्स नहीं , कोई रूप नहीं , सिर्फ भाव् है , विचारों का एक पुलिंदा है ——- विचार और भाव जब फैलते हैं दिगंत में प्रकृति के हर बोसे में , मेरा अक्स फैल जाता है… Read more »