समाज सहेजना ज़रूरी है, पर कितना? संचय प्रवृत्ति का द्वंद्व January 27, 2026 / January 27, 2026 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment -सुनील कुमार महला मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह इस जीवन को स्थायी मानकर चलने लगता है। वह सोचता है कि जितना अधिक वह संचय कर लेगा-धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा या संबंध-उतना ही उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। वास्तव में, इसी सोच के कारण वह निरंतर संग्रह में लगा रहता है। परंतु […] Read more » संचय प्रवृत्ति का द्वंद्व