कविता
नारी : एक करुण पुकार
/ by मुनीष भाटिया
सदियों से मानव की कमजोरीनारी को समझा गया हर बार,विजय चिन्ह समझ लूट लियाजैसे कोई युद्ध का उपहार। कभी अपनों की बेरुखी झेली,कभी दुश्मनों की तलवार,युद्धभूमि की आग में जलकरसहती रही अस्मिता पर प्रहार। आज बदल गया रूप समय का,पर चाल वही, व्यवहार वही,क्षद्म प्रेम का जाल बिछाकरभटकाया जाता बार-बार। अब जागे समाज, बढ़े चेतना,पहचाने […]
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