समाज

सबको साथ लेकर चलना बंधुता का शाश्वत आधार


पवन शुक्ला

​मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि,हमने जब भी प्रगति की है,वह सामूहिक प्रयासों का ही परिणाम रही है। ‘सबको साथ लेकर चलना’ केवल एक नारा या विचार नहीं है, बल्कि यह वह जीवन-दर्शन है जो वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को चरितार्थ करता है। समाज रूपी विशाल भवन की मजबूती उसकी हर ईंट के आपसी जुड़ाव पर टिकी होती है। यदि एक भी ईंट कमजोर पड़ जाए या अलग होने की कोशिश करे, तो पूरे ढांचे का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। इसी जुड़ाव का नाम बंधुता है। बंधुता वह अदृश्य धागा है जो विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में पिरोकर रखता है।

​सच्ची बंधुता का अर्थ केवल अपने परिचितों या स्वजनों के प्रति प्रेम भाव रखना नहीं है, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी विकास की मुख्यधारा में शामिल करना है। जब हम ‘सबको साथ’ लेकर चलने की बात करते हैं, तो इसमें समावेशिता का गहरा भाव छिपा होता है। इसका अर्थ है कि प्रगति के पथ पर कोई पीछे न छूटे। अक्सर देखा जाता है कि विकास की दौड़ में कुछ वर्ग बहुत आगे निकल जाते हैं, जबकि कुछ हाशिए पर रह जाते हैं। ऐसी प्रगति स्थाई नहीं हो सकती क्योंकि वह समाज में असंतोष और ईर्ष्या को जन्म देती है। बंधुता का आधार यह सिखाता है कि जो समर्थ हैं, वे अक्षम का हाथ थामें और जो आगे हैं, वे पीछे रह गए लोगों की राह आसान करें।

​भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में तो यह दर्शन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यहाँ धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीयता की अनगिनत परतें हैं। इन विविधताओं के बीच सामंजस्य बिठाने का एकमात्र तरीका बंधुता ही है। जब हम दूसरों के विचारों,विश्वासों और जीवनशैली का सम्मान करते हैं, तभी हम उन्हें साथ लेकर चलने की दिशा में पहला कदम बढ़ाते हैं। सहिष्णुता बंधुता की पहली सीढ़ी है। यदि हमारे भीतर दूसरों को स्वीकार करने का धैर्य नहीं है, तो ‘सबको साथ लेकर चलना’ महज एक काल्पनिक विचार बनकर रह जाएगा। परस्पर सम्मान और विश्वास ही वह खाद-पानी है जिससे बंधुता का वृक्ष फलता-फूलता है।

​ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो महान सभ्यताओं का पतन तभी हुआ जब उनके भीतर ऊंच-नीच और भेदभाव की खाई चौड़ी हो गई। जब समाज का एक हिस्सा दूसरे हिस्से को अपने से नीचा समझने लगा या उसके अधिकारों का हनन करने लगा, तो बंधुता की नींव दरक गई। इसके विपरीत, जिन समाजों ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के मार्ग को चुना,वे आज भी विश्व पटल पर प्रेरणा के केंद्र बने हुए हैं। बंधुता का आधार न्याय और समानता पर टिका होता है। यदि समाज में न्याय नहीं है, तो वहां बंधुता की कल्पना करना व्यर्थ है। सबको साथ लेकर चलने के लिए यह अनिवार्य है कि संसाधनों और अवसरों का वितरण न्यायसंगत हो, ताकि हर व्यक्ति को यह महसूस हो कि वह इस महान सामाजिक यात्रा का एक अभिन्न हिस्सा है।
​आज के इस आधुनिक और प्रतिस्पर्धी युग में व्यक्तिवाद की भावना प्रबल होती जा रही है। लोग अक्सर अपनी व्यक्तिगत सफलता की अंधी दौड़ में यह भूल जाते हैं कि उनकी सफलता में समाज का भी बड़ा योगदान है। हम अकेले चाहे कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, लेकिन सुरक्षित लैंडिंग के लिए हमें उसी जमीन की जरूरत होती है जहाँ समाज खड़ा है। एक एकाकी व्यक्ति शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन एक संगठित समाज अजेय होता है। सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति व्यक्ति के भीतर संकुचित मानसिकता को समाप्त कर उसे उदार बनाती है। जब हम दूसरों के दुःख को अपना दुख और दूसरों की सफलता को अपनी खुशी मानने लगते हैं,तभी सही मायनों में बंधुता का जन्म होता है।
​शिक्षा और संस्कारों की इसमें बहुत बड़ी भूमिका है। नई पीढ़ी को यह सिखाना आवश्यक है कि नेतृत्व का अर्थ दूसरों पर हुक्म चलाना नहीं, बल्कि दूसरों को प्रेरित कर साथ लेकर चलना है। एक सच्चा नेता वही है जो अपनी टीम के सबसे कमजोर सदस्य की गति से अपनी प्रगति को मापता है। बंधुता का भाव हमें सहानुभूति से ऊपर उठकर समानुभूति सिखाता है।यह हमें सिखाता है कि हम दूसरों के जूतों में पैर रखकर देखें कि उनकी राह कितनी पथरीली है। जब यह समझ विकसित होती है,तो हाथ अपने आप सहायता के लिए बढ़ जाते हैं और मतभेद मिटने लगते हैं।
​आर्थिक और सामाजिक विषमताएं अक्सर बंधुता के मार्ग में बाधक बनती हैं। अमीर और गरीब, शहरी और ग्रामीण के बीच बढ़ती दूरी समाज को खंडित करती है। सबको साथ लेकर चलने का संकल्प इन दूरियों को पाटने का प्रयास है। यह वह सेतु है जो समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद और सहयोग को प्रोत्साहित करता है। जब हम किसी सार्वजनिक उपक्रम या राष्ट्र निर्माण की बात करते हैं, तो वहां व्यक्ति की पहचान उसके कार्य और योगदान से होनी चाहिए,न कि उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से। जब हर हाथ को काम और हर काम को सम्मान मिलता है, तो बंधुता का आधार स्वयं ही पुख्ता हो जाता है।
​अंततः,सबको साथ लेकर चलना कोई राजनीतिक विवशता नहीं,बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। यह हमारे चरित्र की परीक्षा है कि हम अपनी समृद्धि के क्षणों में उन लोगों को याद रखते हैं या नहीं, जो अभी भी अंधकार में हैं। बंधुता ही वह सुगंध है जो जीवन के उपवन को महकाती है।यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ एक शांतिपूर्ण और समृद्ध विश्व में सांस लें,तो हमें आज ही बंधुता के इस बीज को अपने हृदय में बोना होगा। प्रेम, करुणा और सहयोग के माध्यम से ही हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहाँ ‘स्व’ का विसर्जन ‘सर्व’ में हो जाए। यही वह पथ है जो हमें मानवता की सर्वोच्च शिखर तक ले जाएगा और यही बंधुता का सच्चा आधार है। जब तक हम एक-दूसरे का हाथ थामे हुए हैं, तब तक कोई भी बाधा हमें अपनी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।

लेखक-पवन शुक्ला