पंकज जायसवाल
भारत का केंद्रीय बजट केवल आय व्यय का लेखा-जोखा नहीं होता बल्कि यह देश की आर्थिक सोच, नीति प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का सालाना और दीर्घकालिक दोनों का औपचारिक दस्तावेज़ भी होता है। मेरा मानना है कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों, धीमी वैश्विक वृद्धि और घरेलू आर्थिक आवश्यकताओं के बीच प्रस्तुत होने वाला यह बजट किसी बड़े झटके या चौंकाने वाली घोषणाओं का मंच नहीं बल्कि स्थिरता, निरंतरता और संरचनात्मक मजबूती का संदेश देने वाला होना चाहिए। इस बजट से अपेक्षा भावनात्मक नहीं बल्कि यथार्थवादी दृष्टि से की जानी चाहिए। वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण द्वारा इस बार भी बजट पेश करने की निरंतरता भी यह दर्शाती है कि सरकार की नीयत इस विभाग और वित्त की नीतियों में स्थायित्व ही है.
यह बजट स्थायित्व वाला है कि नहीं, इसका सबसे पहला और बड़ा संकेत यही होगा कि सरकार किसी प्रकार के प्रयोगात्मक या लोकलुभावन रास्ते पर जा रही है नहीं। मेरा आकलन है कि यह एक कंटिन्युइटी बजट होगा जहाँ न तो बड़े कर सुधार देखने को मिलेंगे और न ही ऐसे मुफ्त उपहार जो राजकोषीय अनुशासन को खतरे में डालें। जीएसटी के सुधार त्योहारों में हो गए थे और आयकर में भी सुधार पिछली बजट में हो गया था. सरकार का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना होगा कि भारत एक पूर्वानुमेय, अनुशासित और निवेश के अनुकूल अर्थव्यवस्था है। वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के लिए यह भरोसे का संकेत अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राजकोषीय अनुशासन भी इस बजट का केंद्रीय स्तंभ बना रहेगा। सरकार एक बार फिर यह स्पष्ट करेगी कि उसका मध्यम अवधि का लक्ष्य राजकोषीय घाटे को GDP के लगभग 4.5 प्रतिशत तक लाना है। इसका अर्थ यह नहीं कि खर्च कम किया जाएगा बल्कि खर्च को अधिक गुणवत्तापूर्ण और उत्पादक बनाया जाएगा। पूंजीगत व्यय आधारित वृद्धि की रणनीति पर कोई समझौता नहीं होगा। राजस्व अनुमानों में भी यथार्थवाद दिखेगा ताकि बाद में संशोधन या असंतुलन की स्थिति न बने।
इस संदर्भ में अवसंरचना और पूंजीगत व्यय की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने जिस तरह से रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेसवे, लॉजिस्टिक्स, बंदरगाहों और शहरी अवसंरचना पर निवेश बढ़ाया है, उसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया जाएगा। मेट्रो परियोजनाएँ, स्मार्ट सिटी से जुड़े काम, शहरी परिवहन और हरित अवसंरचना इस बजट में प्रमुख स्थान पाएँगे। खास बात यह होगी कि अब केवल बजट आवंटन नहीं बल्कि क्रियान्वयन की गति और दक्षता पर जोर रहेगा, ताकि निजी निवेश को भी आकर्षित किया जा सके।
विनिर्माण क्षेत्र और ‘मेक इन इंडिया’ इस बजट का एक और अहम आयाम होंगे। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार अंधाधुंध न होकर अधिक परिष्कृत और परिणामोन्मुख होगा। जिन क्षेत्रों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ है, वहाँ पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा। फोकस अब मात्र उत्पादन संख्या से हटकर मूल्यवर्धन, निर्यात क्षमता और रोजगार सृजन पर रहेगा। वैश्विक सप्लाई चेन में हो रहे बदलाव जहाँ चाइना प्लस वन की जगह चाइना प्लस मेनी का सिद्धांत उभर रहा है भारत के लिए अवसर भी हैं और चुनौती भी। यह बजट भारत को ‘असेंबली इकॉनमी’ से ‘इंडस्ट्रियल इकॉनमी’ की ओर ले जाने की सोच को मजबूत करेगा।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम तथा रोजगार सृजन को लेकर भी इस बजट से बहुत शोर-शराबे की उम्मीद नहीं करनी चाहिए लेकिन इसका महत्व कम नहीं होगा। सरकार यहाँ मुफ्त योजनाओं के बजाय संरचनात्मक सहायता पर ध्यान देगी। आसान ऋण उपलब्धता, क्रेडिट गारंटी का विस्तार, भुगतान चक्र को तेज करना और अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाना ये सभी कदम MSME सेक्टर को स्थिरता देंगे। मेरा आकलन है कि रोजगार को सीधे सब्सिडी से जोड़ने के बजाय, कौशल विकास और उत्पादकता बढ़ाने के जरिए रोजगार सृजन का रास्ता चुना जाएगा।
कर व्यवस्था के मोर्चे पर भी यही संतुलन दिखेगा। किसी बड़े टैक्स रिफॉर्म या क्रांतिकारी बदलाव की संभावना कम है। हालांकि, व्यक्तिगत आयकर में कुछ छोटे राहत उपाय, स्लैब या रिबेट में सीमित संशोधन, तथा TDS/TCS और कैपिटल गेन से जुड़ी जटिलताओं को सरल करने के संकेत मिल सकते हैं। GST को लेकर भी दरों में बड़े बदलाव के बजाय अनुपालन सरलीकरण, विवाद समाधान और प्रक्रिया सुधार पर जोर रहेगा। सरकार यह स्पष्ट संकेत देगी कि राजस्व स्थिरता उसके लिए सर्वोपरि है।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर इस बजट का एक ऐसा पक्ष होगा जिस पर शायद बहुत शोर न हो, लेकिन दीर्घकाल में इसका प्रभाव गहरा होगा। UPI, अकाउंट एग्रीगेटर, ONDC और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार के माध्यम से अर्थव्यवस्था को और अधिक औपचारिक बनाने की दिशा में कदम बढ़ेंगे। घरेलू बचत को भौतिक परिसंपत्तियों से वित्तीय परिसंपत्तियों की ओर मोड़ने का प्रयास भी जारी रहेगा। यह बदलाव भारत को एक डिजिटल-शासित और पारदर्शी अर्थव्यवस्था की ओर ले जाता है।
सामाजिक क्षेत्र में सरकार का दृष्टिकोण विस्तारवादी नहीं बल्कि लक्षित रहेगा। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर आधारित योजनाएँ, पोषण, महिलाओं से जुड़ी पहलें और आवास कार्यक्रमों की निरंतरता बनी रहेगी। लेकिन किसी नए बड़े अधिकार-आधारित या सार्वभौमिक कल्याण कार्यक्रम की संभावना कम है। कल्याण योजनाओं का उद्देश्य अधिक लोगों तक पहुँचना नहीं बल्कि सही व्यक्ति तक सही समय पर पहुँचना होना चाहिए। जी राम जी पर फोकस दिख सकता है क्यूंकि नाम बदलने के साथ ही सरकार इसे अब खुद के द्वारा लागू की गई योजना के रूप में प्रचारित करेगी।
इस बजट से यह भी स्पष्ट समझना जरूरी है कि किन चीज़ों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सार्वभौमिक आय योजना, बड़े पैमाने पर कृषि ऋण माफी, अचानक बड़े निजीकरण एलान या GST दरों में तीखे कट, ये सभी इस बजट के एजेंडे में नहीं होंगे। सरकार फिलहाल जोखिम उठाने के बजाय संतुलन बनाए रखने के मूड में दिख रही है। समग्र रूप से देखा जाए तो इस बजट के पीछे एक स्पष्ट आर्थिक दर्शन होगा खपत की बजाय निवेश से वृद्धि, नारों की बजाय प्रणालियों से सुधार और विस्तार की बजाय दक्षता से कल्याण। यह बजट शायद सुर्खियाँ न बनाए लेकिन भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संरचना को मजबूत करने का काम करेगा। यही कारण है कि इससे अपेक्षा भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि दीर्घकालिक नीति दृष्टि के आधार पर की जानी चाहिए।
पंकज जायसवाल