शम्भू शरण सत्यार्थी
एक अख़बार की सुर्ख़ी है—
“हफ्ते भर तक काट-काटकर जलाता रहा पत्नी का शव”.
यह पंक्ति पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सोच पाना भी कठिन है कि कोई इंसान, जो कभी किसी औरत को अपनी कहकर दुनिया से लड़ने का दावा करता था, वही इंसान शक की आग में इतना अंधा हो जाए कि उसे मारने के बाद भी उसके शव को टुकड़ों में काटकर जलाता रहे. यह घटना केवल एक अपराध नहीं है, यह उस मानसिक बीमारी की भयावह परिणति है जिसे हम सामान्य भाषा में शक कहते हैं.
झाँसी की यह घटना हमें भीतर तक झकझोरती है. एक रिटायर्ड रेलकर्मी, अपनी पत्नी पर यह शक करने लगता है कि उसके संबंध किसी और से हैं. यह शक धीरे-धीरे उसके दिमाग में घर करता गया, बढ़ता गया, और अंततः उसने उसी स्त्री की हत्या कर दी, जो उससे उम्र में 32 साल छोटी थी, जो उसके घर की रसोई से लेकर उसके बिस्तर तक का हिस्सा थी. हत्या के बाद भी उसका पागलपन शांत नहीं हुआ—वह शव को काटता रहा, जलाता रहा, ताकि “सबूत” मिट जाए.
यह घटना कोई अपवाद नहीं है. यह हमारे समाज में फैलती उस मानसिक हिंसा का चरम उदाहरण है, जहाँ शक प्यार को निगल जाता है और रिश्ता कब कब्र में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता.
शक : एक धीमा ज़हर
शक कोई एक दिन में पैदा नहीं होता. यह धीरे-धीरे पनपता है—जैसे दीमक. शुरू में यह छोटे सवालों के रूप में आता है—
फोन देर से क्यों उठाया?
इतनी देर किससे बात कर रही थी?
तुम आज बदली-बदली क्यों लग रही हो?
शुरुआत में ये सवाल सामान्य लगते हैं. समाज इन्हें प्यार की चिंता कहकर जायज़ ठहरा देता है लेकिन यहीं से समस्या जन्म लेती है. जब सवाल भरोसे से नहीं, नियंत्रण की भावना से पूछे जाने लगें, तब रिश्ता बीमार होने लगता है.शक का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह तर्क नहीं सुनता.जितना समझाओ, उतना ही शक बढ़ता है.सफ़ाई को भी अपराध मान लिया जाता है.धीरे-धीरे शक करने वाला खुद को जज, वकील और जल्लाद—तीनों मानने लगता है.
पति-पत्नी का रिश्ता और पुरुष अहंकार
भारतीय समाज में पति-पत्नी का रिश्ता आज भी समानता से ज़्यादा स्वामित्व की भावना से देखा जाता है, खासकर पुरुषों के मामले में. पत्नी को अक्सर इज़्ज़त, मर्यादा और घर की आन से जोड़ दिया जाता है. ऐसे में यदि पुरुष के मन में ज़रा-सा भी शक पैदा हो जाए, तो वह इसे सिर्फ निजी भावना नहीं मानता, बल्कि अपनी मर्दानगी और सम्मान पर हमला समझने लगता है.
झाँसी की घटना में भी यही दिखता है. आरोपी को शक था कि पत्नी किसी और से बात करती है. सवाल यह नहीं कि शक सही था या ग़लत—सवाल यह है कि क्या किसी इंसान को शक के आधार पर दूसरे की जान लेने का हक़ मिल जाता है ?
लेकिन शक की बीमारी में इंसान यही मान लेता है कि वह जो कर रहा है, वह न्याय है.
शक और मानसिक हिंसा
हत्या अंतिम चरण है. उससे पहले लंबा दौर चलता है मानसिक हिंसा का.बार-बार शक करना.फोन चेक करना.आवाज़ ऊँची करना.चरित्र पर सवाल उठाना.अलग-थलग करना.डर के माहौल में जीने को मजबूर करना.बहुत-सी औरतें इसी दौर में घुट-घुट कर मरने लगती हैं.उनका शरीर जीवित होता है, लेकिन आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और खुशी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है. कई बार यही मानसिक हिंसा औरतों को आत्महत्या तक धकेल देती है. और कई बार यही हिंसा पुरुष को हत्या तक ले जाती है.
क्या शक सिर्फ पुरुष करते हैं?
नहीं.शक एक मानसिक बीमारी है, जिसका लिंग नहीं होता. कई मामलों में पत्नियाँ भी पति पर शक करती हैं—अफेयर का शक, कमाई छुपाने का शक, दूसरी औरतों से संबंध का शक. कुछ मामलों में यह शक इतना उग्र हो जाता है कि पत्नी पति की हत्या कर देती है या किसी और से करवा देती है लेकिन आँकड़े बताते हैं कि शक के नाम पर होने वाली घरेलू हत्याओं में पीड़ितों की संख्या ज़्यादातर औरतों की है. कारण साफ़ है—सत्ता का असंतुलन. पुरुष के पास शारीरिक ताकत, सामाजिक समर्थन और नियंत्रण अधिक होता है.
शक क्यों बढ़ता है?
शक की जड़ें कई स्तरों पर होती हैं.असुरक्षा खुद को कमतर महसूस करना.स्वामित्व की भावना पत्नी को अपनी चीज़ समझना.समाज की पितृसत्तात्मक सोच.औरत को शक के कटघरे में खड़ा करना.संवाद की कमी – बात करने की बजाय निगरानी करना.
सोशल मीडिया और फोन . हर मैसेज को शक की नजर से देखना.विडंबना यह है कि आज के समय में तकनीक ने शक को और आसान बना दिया है.ऑनलाइन स्टेटस, व्हाट्सऐप, कॉल हिस्ट्री—सब शक को खाद देने लगे हैं.
शक का अंत : या तो मौत, या टूटन
शक का रिश्ता कभी स्वस्थ अंत तक नहीं पहुँचता.इसका अंत दो ही तरह से होता है या तो रिश्ता टूट जाता है या कोई एक टूट जाता है.झाँसी की घटना में अंत हत्या के रूप में हुआ. लेकिन देश में हर दिन सैकड़ों रिश्ते ऐसे हैं, जो शक की आग में जल रहे हैं—बिना ख़बर बने, बिना सुर्ख़ी बने.
समाधान कहाँ है ?
शक को अपराध बनने से पहले रोका जा सकता है, रिश्तों में संवाद को प्राथमिकता देकर, प्यार को नियंत्रण से अलग समझ कर, मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेकर, पुरुषों को यह सिखाकर कि शक मर्दानगी नहीं, कमजोरी है, औरतों को यह भरोसा देकर कि वे अकेली नहीं हैं.
सबसे ज़रूरी बात
शक को सामान्य मत बनाइए. जिस दिन समाज शक को प्यार का नाम देना बंद करेगा, उसी दिन ऐसी हत्याओं की जड़ कटनी शुरू होगी. झाँसी की वह औरत अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उसका सवाल हमारे सामने है— क्या प्यार शक के साथ ज़िंदा रह सकता है? जवाब साफ़ है—नहीं, जहाँ भरोसा नहीं, वहाँ प्यार नहीं और जहाँ शक है, वहाँ देर-सबेर हिंसा है.
यह घटना नहीं बल्कि उस बीमारी पर है, जो चुपचाप हमारे घरों में पल रही है. अगर आज भी हमने इसे गंभीरता से नहीं लिया तो अगली सुर्ख़ी किसी और घर की होगी—किसी और औरत की, किसी और रिश्ते की.
शम्भू शरण सत्यार्थी