धर्म-अध्यात्म

मर्यादा के पर्याय, आदर्श शासक ‘राम’ 

मर्यादा के पर्याय, आदर्श शासक ‘राम’ 

राम अनंत,नाम अनंता !

डॉ घनश्याम बादल

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अवतरण दिवस रामनवमी केवल एक तिथि नहीं, भारतीय चेतना के उस आदर्श का उत्सव है, जिसने मानवता को सन्मार्ग दिखाया है। 

   चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अयोध्या की धरती पर जब भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में श्रीराम का अवतरण हुआ, तो वह केवल एक असुर के अंत के लिए नहीं, बल्कि ‘मर्यादा’ की स्थापना के लिए था। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम  उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाते हैं।

आदर्शों की पराकाष्ठा

श्रीराम’मर्यादा पुरुषोत्तम’ हैं, जो मर्यादाओं में रहकर उत्तम कार्य करते हैं । उनका जीवन शास्त्र सम्मत और लोक कल्याणकारी रहा। जब  राज्याभिषेक के स्थान पर चौदह वर्ष का वनवास मिला, तो न तो क्रोध था और न ही दुःख। पिता के वचन को निभाने के लिए राजसी सुखों को एक पल में त्याग दिया। यह दर्शाता है कि एक आदर्श व्यक्ति के लिए कर्तव्य व्यक्तिगत सुखों से ऊपर होता है।

 नैतिकता का संबल

राम का चरित्र एक धवल वस्त्र के समान निष्कलंक है। एक पुत्र के रूप में वे आज्ञाकारी , भाई के रूप में त्यागी और पति के रूप में वे एकनिष्ठ हैं। उस युग में जब राजाओं की अनेक पत्नियाँ होना सामान्य था, श्रीराम ने ‘एकपत्नी व्रत’ का पालन कर वैवाहिक निष्ठा का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका संयम और धैर्य कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी डगमगाया नहीं।

 रामराज्य की संकल्पना

‘रामराज्य’ शब्द आज भी सुशासन का पर्याय माना जाता है। एक शासक के रूप में राम का एकमात्र ध्येय प्रजा का सुख था। न्यायप्रियता: उनके शासन में न्याय की तुला सबके लिए समान थी।उन्होंने एक साधारण धोबी की टिप्पणी पर भी ध्यान दिया, जो यह दर्शाता है कि वे प्रजा की आवाज को  प्राथमिकता देते थे गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं— ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि व्यापा’। जो इंगित करता है कि रामराज्य में किसी को भी शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कष्ट नहीं था।

नारी उद्धारक और गरिमा के रक्षक

श्रीराम का जीवन नारी शक्ति के प्रति अगाध सम्मान का प्रतीक है।  अहिल्या उद्धार: पत्थर बन चुकी अहिल्या को मुक्त कर उन्होंने समाज द्वारा तिरस्कृत नारी को सम्मान दिलाया। जाति-पाति के बंधनों को तोड़कर उन्होंने  शबरी के जूठे बेर खाए, वनवास का कारण बनने वाली कैकेयी को भी उन्होंने वन से लौटने पर वही पुत्रवत सम्मान दिया, जो माता कौशल्या को दिया था।

दुष्ट संहारक: 

राम अधर्म के विरुद्ध महाकाल के समान कठोर  थे। उनका धनुष ‘कोदंड’ हमेशा पीड़ितों की रक्षा और दुष्टों के दमन के लिए उठा। ताड़का और सुबाहु से लेकर खर-दूषण और रावण तक, उन्होंने उन सभी शक्तियों का विनाश किया जो समाज में भय और अराजकता फैला रही । रावण का वध करके राम ने सिद्ध किया कि ज्ञान और शक्ति यदि बिना चरित्र के हों, तो वे विनाश का कारण बनती हैं।

शक्ति और शील का संगम

 शासक के रूप में राम ने कभी अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं किया। जब उन्होंने समुद्र से मार्ग माँगा और समुद्र ने उत्तर नहीं दिया, तब उन्होंने क्रोध में धनुष उठाया, लेकिन जैसे ही समुद्र ने क्षमा माँगी, उन्होंने उसे अभयदान दिया। वे ‘शरणगत वत्सल’ हैं; विभीषण जैसा शत्रु का भाई भी जब उनकी शरण में आया, तो उन्होंने उसे लंका का राजा स्वीकार कर लिया।

  आज के आपाधापी भरे युग में श्रीराम  एक प्रकाश स्तंभ हैं। वे हर उस व्यक्ति के भीतर मौजूद हैं जो सत्य के मार्ग पर चलता है, जो अपनी मर्यादा नहीं तोड़ता और जो दूसरों के दुःख को दूर करने का प्रयास करता है।

रामनवमी पर केवल उनकी पूजा नहीं, बल्कि उनके ‘शील’, ‘शक्ति’ और ‘मर्यादा’ को हर शासक को अपने जीवन में उतारना चाहिए।  आज भी रामराज्य आधुनिक प्रशासन के लिए एक शाश्वत ब्लूप्रिंट है। कॉर्पोरेट जगत और सरकारी प्रशासन के लिए भी इसमें  महत्वपूर्ण सूत्र छिपे हैं। 

लोकमत का सम्मान

आधुनिक लोकतंत्र का आधार ‘जनता की आवाज़’ है। श्रीराम ने एक साधारण नागरिक की शंका के निवारण हेतु  सीता तक का त्याग कर दिया। यह बताता है कि प्रशासक को न केवल पारदर्शी होना चाहिए, बल्कि उसे आलोचना के प्रति सहिष्णु और जवाबदेह भी होना चाहिए। जनता का विश्वास ही शासन की असली शक्ति है। 

योग्यता आधारित चयन

जब हनुमान जी पहली बार राम से मिले, तो राम ने उनके बोलने की शैली और व्याकरण ज्ञान को देखकर तुरंत पहचान लिया कि वे एक विद्वान और कुशल कूटनीतिज्ञ हैं। उन्होंने सुग्रीव की वानर सेना और विभीषण जैसे विशेषज्ञों का सही समय पर सही कार्य के लिए उपयोग किया। इससे प्रशासनिक सीख मिलती है कि सही व्यक्ति को सही काम सौंपना, संसाधनों और प्रतिभा का सही प्रबंधन ही किसी भी संगठन की सफलता की कुंजी है। 

विकेंद्रीकरण और कूटनीति 

श्रीराम ने कभी भी जीते गए राज्यों लंका और किष्किंधा को अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया। उन्होंने वहां के स्थानीय नेतृत्व (विभीषण और सुग्रीव) को ही सत्ता सौंपी। यह स्वायत्तता  का बेहतरीन उदाहरण है। शासन को थोपने के बजाय स्थानीय लोगों को सशक्त करना अधिक टिकाऊ परिणाम देता है।

समावेशी विकास 

राम ने समाज के सबसे निचले तबके यथा निषादराज, शबरी, वानर, भालू आदि को साथ लेकर रावण जैसी महाशक्ति को परास्त किया। उन्होंने समाज के मुख्य मार्ग से कटे हुए लोगों को सम्मान और पहचान दी ।  ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मूल मंत्र यहीं से आता है। और बताता है कि विकास की योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए।

संकट प्रबंधन 

समुद्र पार करने की चुनौती हो या लक्ष्मण के मूर्छित होने का समय, श्रीराम ने कभी धैर्य नहीं खोया। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से पुल का निर्माण कराया और उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग किया । सबक साफ है कि एक लीडर को दबाव की स्थिति में शांत रहकर तार्किक निर्णय लेने चाहिए।

दंड विधान और न्याय 

रामराज्य में ‘दंड’ का भय नहीं था, बल्कि ‘धर्म’  का पालन स्वतः होता था। कानून सबके लिए समान था, चाहे वह स्वयं राजा ही क्यों न हो। स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन तभी संभव है जब नियम स्पष्ट हों और उनका पालन बिना किसी भेदभाव के किया जाए।

  रामराज्य का अर्थ यह नहीं है कि कोई समस्या नहीं होगी, बल्कि इसका अर्थ यह है कि उन समस्याओं का समाधान न्याय, करुणा और मर्यादा के साथ किया जाएगा। यदि आज के प्रशासक श्रीराम के ‘समदर्शी’ भाव को अपना लें, तो समाज से असुरक्षा और असंतोष का स्वतः ही अंत हो जाएगा।

डॉ घनश्याम बादल