समाज

पश्चिमी शक्ति-संरचनाओं के यौन शोषण और मानव तस्करी का खेल 

गजेंद्र सिंह

सोशल मीडिया पर हाल के दिनों में वायरल हो रहे ‘एप्सटीन फ़ाइल्स’ के दृश्य—डरे हुए नाबालिगों के चेहरे, वर्षों पुराने ईमेल संवाद, और निजी द्वीपों पर जुटती वैश्विक एलीट की बंद मंडलियाँ—किसी सस्पेंस थ्रिलर का हिस्सा नहीं लगते। वे हमारे समय के उस अंधेरे यथार्थ की झलक देते हैं, जहाँ सत्ता, धन और प्रभाव नैतिक उत्तरदायित्व से लगभग पूरी तरह अलग हो चुके हैं। ये दृश्य केवल भय नहीं जगाते; वे उस असहज सच्चाई की ओर संकेत करते हैं कि आधुनिक लोकतंत्रों में भी कुछ अपराध ऐसे हैं, जिन्हें देखने के बाद भी व्यवस्था देखने से इंकार कर देती है।

हाल सार्वजनिक हुई फाइलों—ईमेल संवाद, वीडियो रिकॉर्डिंग, तस्वीरें और अदालती दस्तावेज़—से एक ऐसे नेटवर्क की तस्वीर उभरती है जो दशकों तक फैला रहा। अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इनमें 30 लाख से अधिक पन्नों के दस्तावेज़, 2,000 से अधिक वीडियो और लगभग 1.8 लाख तस्वीरें शामिल हैं।

फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन और अमेरिका  न्याय विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, पिछले दो दशकों में 1,000 से अधिक पीड़ितों ने एप्सटीन और उससे जुड़े नेटवर्क के विरुद्ध यौन शोषण के आरोप लगाए। 2020 तक उसकी संपत्ति से स्थापित पीड़ित मुआवज़ा कोष के माध्यम से लगभग 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया गया। मुआवज़ा अपने आप में अपराध का कानूनी प्रमाण नहीं होता, लेकिन यह संकेत अवश्य देता है कि शिकायतें महज़ कल्पना नहीं थीं। अमेरिकी नागरिक उड्डयन रिकॉर्ड्स यह भी बताते हैं कि उसके निजी विमान—कुख्यात ‘लोलिता एक्सप्रेस’—ने दो दशकों में सैकड़ों उड़ानें भरीं। प्रश्न यह नहीं है कि इन यात्राओं में कौन-कौन शामिल था बल्कि यह है कि यह सब इतने वर्षों तक सबकी आँखों के सामने कैसे चलता रहा।

जेफ़्री एप्सटीन का मामला नया नहीं है। 2019 में न्यूयॉर्क की मेट्रोपॉलिटन करेक्शनल सेंटर में उसकी रहस्यमय मृत्यु के साथ ही यह उम्मीद भी लगभग समाप्त हो गई थी कि पश्चिमी विश्व की शक्ति-संरचनाओं के भीतर छिपे यौन शोषण और मानव तस्करी के नेटवर्क पूरी तरह उजागर हो सकेंगे। आधिकारिक रूप से इसे आत्महत्या कहा गया, किंतु निगरानी कैमरों का निष्क्रिय होना, सुरक्षा कर्मियों की कथित लापरवाही और सह-आरोपियों पर निर्णायक कार्रवाई का अभाव—इन सबने इस मृत्यु को एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि न्यायिक जवाबदेही की मृत्यु में बदल दिया।

अमेरिकी अदालतों में दर्ज आरोपों के अनुसार, एप्सटीन पर कम-से-कम 200 से अधिक नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और तस्करी के गंभीर आरोप थे। इसके बावजूद 2008 में उसे जिस विवादास्पद प्ली डील के तहत बेहद सीमित सज़ा दी गई, उसे आज अमेरिकी न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी नैतिक विफलताओं में गिना जाता है।  मियामी हेराल्ड  की 2018 की खोजी रिपोर्ट ने स्पष्ट किया था कि इस समझौते ने दर्जनों पीड़िताओं को कानूनी प्रक्रिया से बाहर कर दिया और अभियोजन एजेंसियों ने प्रभावशाली हितों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया।

एप्सटीन फ़ाइल्स में जिन व्यक्तियों के नाम सामने आए हैं—जैसे  बिल गेट्स, बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रम्प, स्टेफन हाकिंग, नोआम चोम्स्की, मीरा नायर , दीपक चोपड़ा, बराक ओबामा  – अपने-अपने क्षेत्रों में असाधारण प्रभाव के प्रतीक रहे हैं। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी नाम का उल्लेख होना, आपराधिक दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। कई नाम केवल संपर्क, यात्रा या ईमेल संदर्भों में आए हैं; अधिकांश पर कोई आपराधिक सज़ा नहीं हुई है और कई ने सार्वजनिक रूप से इन आरोपों या संबंधों का खंडन भी किया है। न्याय विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि नए और ठोस साक्ष्य के बिना आरोप तय नहीं किए जाएंगे। यह सावधानी आवश्यक है, क्योंकि सार्वजनिक विमर्श न्यायिक प्रक्रिया का स्थान नहीं ले सकता। फिर भी, यह तर्क भी पर्याप्त नहीं कि “कुछ सिद्ध नहीं हुआ, इसलिए प्रश्न ही न उठाए जाएँ।” लोकतांत्रिक समाज में जवाबदेही का अर्थ केवल सज़ा नहीं, बल्कि पारदर्शिता, नैतिक साहस और संस्थागत आत्मनिरीक्षण भी है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे कम सुनी गई आवाज़ें पीड़ितों की हैं। यौन अपराधों में शक्ति-संतुलन निर्णायक भूमिका निभाता है—और यही कारण है कि ऐसे अपराध लंबे समय तक दबे रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार, मानव तस्करी के कुल पीड़ितों में लगभग 38 प्रतिशत नाबालिग होते हैं। जब अपराधी के पास धन, संपर्क और संरक्षण हो, तो पीड़ित के लिए न्याय तक पहुँचना और भी कठिन हो जाता है।

यह मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि सत्ता के मनोविज्ञान का भी है। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों बताते हैं कि जब सफलता, धन और प्रभाव एक बिंदु पर एकत्र हो जाते हैं, तो अधिकार की भावना —यानी स्वयं को नियमों से ऊपर समझने की भावना—मज़बूत होती है। सीमाएँ तुच्छ लगने लगती हैं, और सामान्य सुख अपर्याप्त। व्यक्ति “अगले स्तर” की तलाश में जोखिम, विकृति और हिंसा को भी उपभोग की वस्तु बना लेता है। इस संदर्भ में एप्सटीन का निजी द्वीप केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि असीमित पहुँच और सीमाहीन इच्छाओं का प्रतीक बन जाता है।

यह मान लेना कि ऐसी संरचनात्मक समस्याएँ केवल पश्चिमी समाजों तक सीमित हैं, एक खतरनाक सरलीकरण होगा। भारत सहित अनेक देशों में सत्ता, पैसा और संस्थागत संरक्षण के मेल से जुड़े अपराध सामने आते रहे हैं—अक्सर देर से, और अधूरे रूप में। अंतर केवल इतना है कि हर समाज की अपनी “एप्सटीन फ़ाइल्स” होती हैं। कुछ खुलती हैं; अधिकांश कभी नहीं। यह अंतर संस्थागत मज़बूती, मीडिया की स्वतंत्रता और नागरिक दबाव से तय होता है।

एप्सटीन फ़ाइल्स हमें दोषियों की अंतिम सूची नहीं देतीं; वे हमें एक दर्पण देती हैं। यह दर्पण दिखाता है कि जब सत्ता बिना जवाबदेही के होती है, तो नैतिकता कितनी शीघ्र अर्थहीन हो सकती है। यह मामला भावनात्मक उबाल या साज़िश-तर्कों से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रक्रियाओं और संस्थागत सुधार की मांग करता है। लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात से तय नहीं होता कि कितने अपराध होते हैं, बल्कि इस बात से कि वे कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता से सामने लाए जाते हैं। और जब समाज यह मान ले कि “हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा,” तब पतन केवल संभव नहीं—अपरिहार्य हो जाता है।आज आवश्यकता आक्रोश की नहीं, सतर्क विवेक और संस्थागत जवाबदेही की है।

गजेंद्र सिंह