राजनीति

‘गोवा क्रांति’ राष्ट्रवादी विचारों का संकल्प

गोवा मुक्ति दिवस’- 19 दिसंबर

डॉ. रमेश ठाकुर

 
‘गोवा’ को आजाद हुए 64 वर्ष पूरे हो गए। इस दिन को ‘गोवा मुक्ति दिवस’ के रूप में सालाना 19 दिसंबर को मनाया जाता है। दरअसल, ‘मुक्ति दिवस’ एक ऐसा राष्ट्रवादी विचारों वाला एहसास है जो प्रत्येक भारतीयों के भीतर अपने हक-हुकूक और अधिकारों से लड़ने को न सिर्फ प्रेरित करता है, बल्कि सहासिक संबल भी प्रदान करता है। 15 अगस्त 1947 में जब पूरा मुल्क स्वतंत्रता का उत्सव मना रहा था, तब गोवा पुर्तगाली शासन की जंजीरों में जकड़ा था। गोवा मुक्ति दिवस इसी ऐतिहासिक अन्याय के अंत और गोवा की वास्तविक आजादी का जुनून है। गोवा भारत की आजादी के 14 वर्ष बाद मुक्ति हुआ था। उसी मुक्ति को ‘गोवा कं्राति’ भी कहते हैं जिसका आज 64 वां संस्करण समूचे भारत में मनाया जा रहा है। दिसंबर की 19 तारीख गोवा की आजादी के लिए सैन्य बल और क्रांतिकारियों ने मिलकर मुकर्रर थी। ये तारीख पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन के अंत और हिंदुस्तानी सशस्त्र बलों के साहसिक बल का प्रतीक है।

 
गौरतलब है कि 16वीं शताब्दी से पुर्तगालियों ने गोवा पर कब्जा करना आरंभ कर दिया था। साल-1498 में ‘वास्को डी गामा’ समुद्री मार्ग से भारत पहुंचकर पुर्तगालियों को धीरे-धीरे भारत के तटीय क्षेत्रों में बसाना शुरू कर दिया था। उसके बाद उन्होंने अपने व्यापारिक और राजनीतिक किले बनाने आरंभ किए। धीरे-धीरे उन्होंने अपना मजबूत वर्चस्व स्थापित कर लिया। लेकिन उनके साम्राज्य का 1961 में अंत कर दिया गया। गोवा को आजाद कराने के लिए भारतीय सैन्य अभियान इतना तेज शुरू हुआ कि उसके सामने पुर्तगाली सेना महज कुछ ही घंटे टिक सकी। अभियान के बीच में ही पुर्तगाल के करीब 10 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर अपने हथियार जमीन पर डाल दिए थे। वर्ष-1961 में भारतीय सेना ने अपने अदम शौर्य से ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत गोवा को करीब 450 साल के पुर्तगाली शासन से मुक्त कराया। भारतीय सेना ने लगभग 36 से 40 घंटे बिना रूके सैन्य अभियान चलाकर गोवा, दमन और दीव को पुर्तगालियों के चुंगल से छुड़वाने में अप्रत्याशित सफलता अर्जित की थी।

 
मुक्ति के उपरांत 1987 में गोवा को भारत का 25वां राज्य घोषित किया गया। गोवा सन्-1510 से लेकर 1961 तक पुर्तगालियों के कब्जे में रहा। पुर्तगाली किसी भी सूरत में गोवा को नहीं छोड़ना चाहते थे। गोवा की प्राकृतिक सुंदरता और कुदरती संपदा उन्हें जकड़े हुई थी। अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी बेशक 1947 में मिल गई लेकिन गोवा तब भी पुर्तगालियों का गुलाम रहा। इसलिए उस वक्त हम भारत को पूर्ण आजाद नहीं मानते थे क्योंकि हमारा एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमसे तब भी दूर था। भारत की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम 1940 के दशक में शुरू हुआ था जिसमें डॉ. राम मनोहर लोहिया ने 1946 में लोगों को पुर्तगालियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। लोगों ने उनके आहवान को स्वीकारा। गोवा मुक्ति की लड़ाई राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित लोगों ने सामुहिक रूप से लड़ी जिसका नतीजा  ये निकला कि गोवा मुक्त हुआ।


गोवा को मुक्त करवाने के लिए क्रांतिकारियों ने सबसे पहले अहिंसा, शांति पाठ और कूटनीतिक रास्ता अपनाया लेकिन उनकी उदारता का पुर्तगाल सेना ने नाजायज फायदा उठाकर अपना दमन जारी रखा। हारकर फिर आंदोलनकारियों ने अपने हाथों में हथियार उठाए। 1947 के बाद गोवा में स्वतंत्रता की भावना और तेज हुई। गोवा मुक्ति को लेकर आंदोलन न सिर्फ गोवा में हुए बल्कि पूरे देश में तेज हुए। डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने गोवा आकर आंदोलन की दिशा को और धार दी। कई गुमनाम क्रांतिकारी भी कूदे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने भी मोर्चा संभाला। सत्याग्रह, विरोध प्रदर्शन और जनसभाओं के जरिए पुर्तगाली शासन के खिलाफ आवाज उठाई। पुर्तगाली सरकार ने आंदोलन को कठोरता से दबाने का प्रयास किया, कई स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डालकर उनपर अनैतिक अत्याचार और जुल्म भी किए। उसके बाद भारत सरकार ने सेना को लगाया। सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ चलाकर पुर्तगालियों की कमर तोड़कर उनके सभी नापाक मंसूबों को चकनाचूर कर दिया।


गोवा की आजादी के लिए ‘ऑपरेशन विजय’ बहुत निर्णायक साबित हुआ था। 17 दिसंबर 1961 को ऑपरेशन आरंभ किया गया था। ऑपरेशन में भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के लगभग 30,000 सैनिक शामिल थे। भारतीय सेना ने रणनीति के तहत पुर्तगालियों के मुख्य मार्गों पर सबसे पहले नियंत्रण किया। ऐसी तस्वीरें देखकर गोवा में प्रवेश करने वाले मुख्य मार्ग को पुर्तगालियों ने धमाके से उड़ा दिया था ताकि वह घुस न पाएं लेकिन भारतीय सैनिक फिर भी नहीं रूके, आगे बढ़ते गए। उसके बाद भारतीय वायु सेना ने भी पुर्तगालियों के ठिकानों पर जमकर बमबारी की और थल सेना ने चारों ओर से मोर्चा संभाला। तब पुर्तगालियों ने महसूस किया कि अब वो टिक नहीं पांएगे। तभी पुर्तगाली गवर्नर ‘मेन्यू वासलो डे सिल्वा’ ने औपचारिक रूप से घुटने टेककर समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और अपने बोरी बिस्तरा बांधकर वापस जाने शुरू हुए। गोवा मुक्ति दिवस की यादें हर भारतीयों को सदैव देशभक्ति और एकता का पाठ पढ़ाती रहेगी।


डॉ. रमेश ठाकुर