आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन और इंटरनेट ने जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही असुरक्षित भी। देश भर में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। आए दिन समाचारों में किसी न किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी, बैंक फ्रॉड, फर्जी कॉल, लिंक के माध्यम से ठगी या डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं। चिंता की बात यह है कि इस जाल में केवल अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, बल्कि शिक्षित और समझदार नागरिक भी फँसते जा रहे हैं।
हाल ही में हिसार में एक महिला के साथ हुई साइबर ठगी की घटना इसका ताजा उदाहरण है। साइबर अपराधियों ने महिला का फोन हैक कर निजी डाटा चुरा लिया और तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल करने की धमकी देकर दो लाख रुपये की ठगी कर ली। बाद में पीड़िता ने साइबर थाने में शिकायत दर्ज करवाई। यह घटना बताती है कि अपराधी किस हद तक तकनीक का दुरुपयोग कर रहे हैं और आम नागरिक कितने असहाय हो जाते हैं।
आज छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी के हाथों में स्मार्टफोन है। ऑनलाइन पढ़ाई, बैंकिंग, खरीदारी, सोशल मीडिया और मनोरंजन के लिए हम लगातार इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं। ऐसे में साइबर अपराधियों को नए-नए तरीके खोजने का अवसर मिल जाता है। कभी केवाईसी अपडेट के नाम पर, कभी लॉटरी या इनाम का लालच देकर, कभी पुलिस या अधिकारी बनकर डराकर, तो कभी डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठे जाते हैं।
डिजिटल अरेस्ट की घटनाएँ विशेष रूप से चिंताजनक हैं। इसमें ठग खुद को सीबीआई, पुलिस या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर व्यक्ति को मानसिक दबाव में ले लेते हैं। डर के कारण लोग बिना सोचे-समझे अपनी जमा-पूंजी अपराधियों के खाते में ट्रांसफर कर देते हैं। बाद में उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
यह सच है कि साइबर पुलिस और सरकारी एजेंसियाँ शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई करती हैं। भारतीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत साइबर सुरक्षा संस्थाएँ लगातार प्रयास कर रही हैं, परंतु अपराधी इतने शातिर होते हैं कि कई बार कानून की पकड़ से बच निकलते हैं। तकनीक की तेजी से बदलती दुनिया में अपराधियों का नेटवर्क भी लगातार मजबूत हो रहा है।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आम नागरिक स्वयं को कैसे सुरक्षित रखें? इसका उत्तर बहुत सरल है—सावधानी और जागरूकता। किसी भी अनजान कॉल, लिंक, ई-मेल या संदेश पर तुरंत भरोसा न करें। बैंक, पुलिस या कोई भी सरकारी विभाग फोन पर कभी गोपनीय जानकारी नहीं मांगता। ओटीपी, पासवर्ड या एटीएम विवरण किसी के साथ साझा करना भारी नुकसान का कारण बन सकता है।
इसके साथ ही, मोबाइल और कंप्यूटर में मजबूत पासवर्ड रखें, नियमित रूप से सॉफ्टवेयर अपडेट करें और अनजान एप्स डाउनलोड करने से बचें। सोशल मीडिया पर अपनी निजी जानकारी, फोटो और लोकेशन साझा करने में भी संयम बरतना आवश्यक है। बच्चों और बुजुर्गों को विशेष रूप से डिजिटल सुरक्षा के बारे में समझाना आज की आवश्यकता बन चुका है।
परिवार और समाज की भूमिका भी इसमें महत्वपूर्ण है। यदि किसी के साथ ठगी हो जाए, तो उसे छिपाने के बजाय तुरंत शिकायत दर्ज करवानी चाहिए, ताकि अपराधियों तक पहुँचा जा सके और दूसरों को भी सतर्क किया जा सके। डर और संकोच अपराधियों को और ताकत देते हैं।
आज स्मार्टफोन हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इससे अलग होना संभव नहीं, लेकिन इसके सुरक्षित उपयोग से हम स्वयं को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं। तकनीक का लाभ तभी सार्थक है, जब हम उसका उपयोग समझदारी से करें।
अंत में यही कहा जा सकता है कि साइबर ठगी से बचने का सबसे बड़ा उपाय है—सतर्कता, संयम और जागरूकता। यदि हम लोभ, भय और जल्दबाजी से बचें, तो अधिकांश साइबर अपराधों को रोका जा सकता है। जागरूक नागरिक ही सुरक्षित डिजिटल भारत की नींव रख सकते हैं।
-सुरेश गोयल धूप वाला