विश्ववार्ता

मध्य-पूर्व संकट और और उसका  वैश्विक भू-राजनीतिक प्रभाव

डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र

अमेरिका और ईरान के बीच टकराव की जड़ें परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय शक्ति सन्तुलन तथा मध्य-पूर्व की राजनीति में निहित हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में शुरू हुआ था, लेकिन 2002 में गुप्त परमाणु प्रतिष्ठानों के उजागर होने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की चिन्ता बढ़ गई। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ईरान पर कठोर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए। 2015 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन और जर्मनी ने ईरान के साथ जॉइंट कॉम्प्रिहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन(JCPOA) समझौता किया जिसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार करने पर सहमति दी। इसके बदले उस पर लगे कई आर्थिक प्रतिबन्ध हटाए गए किन्तु 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया और ईरान पर फिर से कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव तेजी से बढ़ गया।इसके बाद फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों पर हमले, इराक और सीरिया में अमेरिकी ठिकानों पर रॉकेट हमले तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया।

7 अक्टूबर 2023 को गाज़ा से शुरू हुआ यह संकट अब मध्य-पूर्व में एक व्यापक युद्ध का रूप ले चुका है। हमास द्वारा इज़रायल पर किए गए हमले के बाद शुरू हुई सैन्य कार्रवाई ने धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र को ध्रुवीकृत कर दिया और इज़रायल-हमास संघर्ष ईरान-इज़रायल टकराव में बदलने लगा। इज़रायल का आरोप रहा है कि हमास, हिज़्बुल्लाह और यमन के हूती जैसे समूहों को ईरान का समर्थन प्राप्त है। गाज़ा युद्ध के बाद लेबनान सीमा पर झड़पें, लाल सागर में जहाजों पर हमले और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा किया। अन्ततः 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमलों के साथ यह झड़प एक पूर्ण युद्ध में तब्दील हो गई।

मध्य-पूर्व में प्रति दिन बड़ी तेजी से स्थितियाँ बदल रही हैं। अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों के साथ-साथ लेबनान में हिज़्बुल्लाह के गढ़ों पर व्यापक हवाई हमले किए जिससे भारी तबाही और बड़े पैमाने पर जन-विस्थापन हुआ। विशेष रूप से बेरूत के दक्षिणी क्षेत्रों में इज़रायली हमलों के कारण लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े।ट्रम्प अब यह कह रहे हैं कि इस सैन्य अभियान का अन्त केवल ईरान के “बिना शर्त आत्मसमर्पण” से ही सम्भव है। वस्तुतः यह युद्ध अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। इज़रायल का कहना है कि उसके हमलों का लक्ष्य ईरान के मिसाइल ठिकाने, सैन्य कमांड केंद्र और हिज़्बुल्लाह के सैन्य ढांचे हैं।इसके जवाब में ईरान ने क्षेत्रीय प्रतिक्रिया देते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनका लक्ष्य इज़रायल और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने थे। कुवैत, क़तर, सऊदी अरब और बहरीन जैसे देशों में भी हमले किए गए क्योंकि वहां अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इससे पूरा मध्य-पूर्व क्षेत्र युद्ध की चपेट में आता दिखाई दे रहा है।इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए हैं, जबकि तेल आपूर्ति, अन्तर्राष्ट्रीय उड़ानों और वैश्विक बाजारों पर भी असर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र और कई अन्तर्राष्ट्रीय नेताओं ने इस संकट को रोकने और तनाव कम करने की अपील की है, क्योंकि यदि युद्ध लम्बा चला तो इसका प्रभाव पूरे विश्व की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ सकता है।

इस युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीतिक आयाम फारस की खाड़ी में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है, जिसे वैश्विक ऊर्जा व्यापार की बड़ी कड़ी माना जाता है। यह संकीर्ण जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और मध्य-पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशोंसऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरातके तेल निर्यात का मुख्य मार्ग है। यहाँ से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल, यानी विश्व के कुल तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा, इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव तुरन्त वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है। यदि युद्ध के कारण इस मार्ग की सुरक्षा पर खतरा बढ़ता है या तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित होती है, तो अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है। इसका प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक महँगाई, परिवहन लागत और आर्थिक स्थिरता पर भी व्यापक असर पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने केवल तेल आपूर्ति ही नहीं बल्कि वैश्विक डिजिटल अवसंरचना के लिए भी गम्भीर संकट पैदा कर दिया है। विशेष रूप से फारस की खाड़ी में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के आसपास समुद्र के नीचे बिछी इन्टरनेट केबलों की सुरक्षा को लेकर चिन्ता बढ़ गई है। यह क्षेत्र वैश्विक तेल परिवहन के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय डाटा संचार का भी एक महत्त्वपूर्ण मार्ग है। कई प्रमुख फाइबर-ऑप्टिक केबलें इसी समुद्री मार्ग से गुजरती हैं जो भारत सहित एशिया और मध्य-पूर्व के बीच डिजिटल कनेक्टिविटी का आधार बनाती हैं। ईरान इस क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकता है। निःसंदेह इससे वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था और संचार नेटवर्क प्रभावित होगा।

इस युद्ध के व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं और इस क्रम में रूस और चीन दोनों की भूमिका भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह युद्ध जितना लम्बा खिचेगा उसका फायदा रूस और चीन को मिलेगा क्योंकि रूस पहले से ही पश्चिमी देशों के साथ यूक्रेन युद्ध के कारण टकराव की स्थिति में है, इसलिए मध्य-पूर्व में उत्पन्न संकट उसके लिए कूटनीतिक अवसर प्रदान कर सकता है, जिससे उसे यूक्रेन पर बढ़त मिलेगी। रूस प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से बचते हुए ईरान को राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन या तो कर रहा है या करेगा, साथ ही संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर अमेरिकी नीतियों का विरोध भी करेगा। इस युद्ध से उत्पन्न ऊर्जा संकट से रूस को आर्थिक लाभ भी मिल सकता है. दूसरी ओर चीन की भूमिका मुख्यतः आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हुई है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक है और उसकी ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आता है। चीन के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग आधा भाग इसी क्षेत्र से प्राप्त होता है, इसलिए क्षेत्रीय अस्थिरता सीधे उसकी अर्थव्यवस्था और औद्योगिक उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इसी कारण चीन आमतौर पर इस क्षेत्र में सैन्य हस्तक्षेप से बचते हुए स्थिरता और कूटनीतिक समाधान पर जोर देता है। बीजिंग की रणनीति यह रही है कि वह मध्य-पूर्व में सभी पक्षोंईरान, सऊदी अरब, इज़रायल और खाड़ी देशोंके साथ सन्तुलित सम्बन्ध बनाए रखे, ताकि ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक हित सुरक्षित रह सकें लेकिन इस बात की भी सम्भावना है कि आने वाले दिनों में उसकी निर्भरता इस हेतु रूस पर बढ़े लेकिन अमेरिका के यहाँ उलझे होने से उसे ताइवान पर भू-रणनीतिक बढ़त मिल सकती है क्योंकि चीन की फितरत हमेशा से चालाकी और धोखे की रही है।

सारतः जिस प्रकार की स्थिति बन रही है उससे यह लगता है कि अमेरिका और इजराइल इस युद्ध में बुरी तरह फंस  चुके हैं क्योंकि उनके शुरुआती प्लान को ईरान ने विफल कर दिया है। ईरान इस युद्ध को अब आर्थिक युद्ध में तब्दील कर चुका है। एक सप्ताह बाद भी लगभग 3500 मिसाइलों के अनुमान वाले ईरान का इस युद्ध में टिका रहना इस बार का द्योतक है कि इसे हथियार, सटीक लोकेशन और अन्य साजो समान कही और से मिल रही है और निःसंदेह यह रूस चीन और उत्तर कोरिया हो सकते हैं। ईरान इस युद्ध को जितना लम्बा खींचेगा, वैश्विक मन्दी और युद्ध के यूरोप और एशिया के अन्य कक्षेटरों में फैलने की सम्भावना उतनी अधिक होगी।

डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र