ओंकारेश्वर पांडेय
28 फरवरी 2026 की सुबह ने मध्य पूर्व की तस्वीर हमेशा के लिए बदल कर रख दी। अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए। और कुछ ही घंटों के भीतर ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैले अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना दिया। अबू धाबी, दुबई, दोहा, मनामा, कुवैत सिटी, रियाद… एक के बाद एक खाड़ी की राजधानियाँ मिसाइल हमलों की चपेट में आ गईं। लेकिन असली धमाका उसके बाद हुआ, जब ईरानी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा कर दी। कयास लगाए गये कि हमले ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाने पर रखकर किये गये। और आखिरकार 1 मार्च की सुबह ने उस तस्वीर पर आधिकारिक मुहर लगा दी।
तेहरान की सड़कों पर सन्नाटा था। फिर अचानक एक आवाज़ गूंजी – “इंतक़ाम!” टीवी स्क्रीन पर टीवी की एंकर रो रही थीं। लाइव ऑन एयर। उन्होंने नहीं रोका खुद को। आंसू बह रहे थे, आवाज़ लड़खड़ा रही थी, लेकिन शब्द साफ थे – ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अब इस दुनिया में नहीं रहे।
86 साल की उम्र में, 28 फरवरी 2026 की उस सुबह, जब अमेरिका और इज़राइल के लड़ाकू विमानों ने तेहरान के उस इलाके को निशाना बनाया, जहां खामेनेई का कंपाउंड था, वे अपनी आखिरी सांस तक लड़ते रहे। ईरान के इतिहास में उन्हें ‘शहीद’ का दर्जा दिया गया है। ईरान की आधिकारिक समाचार एजेंसी IRNA ने इसकी पुष्टि की।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पोस्ट में लिखा – “खामेनेई, इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक, मर चुका है।
ईरान ने 40 दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा कर दी है। तेहरान की सड़कों पर लाखों लोग उमड़ पड़े हैं। “डेथ टू अमेरिका”, “डेथ टू इजराइल” के नारों से आसमान गूंज रहा है। यह सिर्फ गुस्सा नहीं है, यह उस नेता के लिए आखिरी सलाम है जिसने 35 साल तक ईरान की कमान संभाली और अमेरिका को “महाशैतान” कहने में कभी संकोच नहीं किया।
होर्मुज बंद: दुनिया की जीवनरेखा पर ताला
खामेनेई की शहादत के ऐलान के साथ ही ईरान ने वो कर दिखाया, जिसकी आशंका ने पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी थी। IRGC ने आधिकारिक तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा कर दी है। पीपल्स डेली के मुताबिक, IRGC ने हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो के जरिए सभी जहाजों को संदेश भेजा कि “किसी भी जहाज को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने का अधिकार नहीं है” ।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की वो नस है, जहां से हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल गुजरता है। यह वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का 20 से 30 प्रतिशत है। इसे बंद करने का मतलब है कि सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई, कतर जैसे देशों का तेल और एलएनजी निर्यात ठप। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं ।
ईरान ने आत्मघाती कदम उठाया है, क्योंकि उसका खुद का तेल निर्यात भी इसी रास्ते से होता है। लेकिन यह उसकी ‘दो तलवारों वाली’ रणनीति है – अगर मैं डूबूंगा तो दुनिया को भी साथ ले डूबूंगा।
दस देश एक साथ निशाने पर
खामेनेई की शहादत के बाद क्या ईरान चुप बैठेगा। ऐसा नहीं लगता। IRGC ने जो ‘ऑपरेशन सच्चा वादा-4’ शुरू किया है, इसके तहत शनिवार देर रात तक दस देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन बरसाए गए:
· बहरीन: अमेरिकी नेवी के पांचवें बेड़े का मुख्यालय सीधे निशाने पर
· क़तर: अल-उदैद एयरबेस (सबसे बड़ा अमेरिकी बेस) पर हमला
· कुवैत: अल-सलेम एयरबेस पर मिसाइल दागी गई
· यूएई: दुबई में एक लग्ज़री होटल में आग लग गई
· जॉर्डन, सऊदी अरब, इराक, इज़राइल भी हमले की चपेट में
अमेरिका ने दावा किया कि उसके किसी सैनिक की मौत नहीं हुई और नुकसान मामूली है । लेकिन ईरानी मीडिया के मुताबिक, होर्मुज़गान प्रांत में एक गर्ल्स स्कूल पर अमेरिकी-इजराइली हमले में 115 बच्चियां मारी गईं । कुल मिलाकर 201 लोगों की मौत की पुष्टि ईरानी रेड क्रेसेंट ने की है ।
चीन की प्रतिक्रिया: “बातचीत के दौरान हमला चौंकाने वाला”
चीन ने इस मामले में बेहद सावधानी से अपना रुख साफ किया है। CCTV इंटरनेशनल के मुताबिक, चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि “चीन अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य हमलों से अत्यधिक चिंतित है। हम सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल बंद करने का आह्वान करते हैं।”
लेकिन इससे भी अहम बात ग्लोबल टाइम्स ने छापी है। संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू कोंग ने सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में कहा: “यह चौंकाने वाला है कि ये सैन्य हमले उस समय हुए जब अमेरिका और ईरान के बीच राजनयिक वार्ता चल रही थी।” उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और कहा कि “नागरिकों की सुरक्षा की लाल रेखा को कभी पार नहीं किया जाना चाहिए। बल का अंधाधुंध इस्तेमाल अस्वीकार्य है।”
रूस का रुख: “कूटनीति का विश्वासघात”
रूस ने सबसे सख्त रुख अपनाया है। TASS न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि वसीली नेबेंजा ने कहा: “ईरान के खिलाफ यह आक्रमण पहले ही क्षेत्रीय संघर्ष में बदल चुका है और इसके मध्य पूर्व की सीमाओं से कहीं आगे तक फैलने की संभावना है।” उन्होंने इसे “कूटनीति का असली विश्वासघात” बताया और कहा कि “जब वार्ता पूरे जोरों पर थी, तब इन देशों ने ईरान के खिलाफ फिर से सैन्य बल का इस्तेमाल किया।”
रूसी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के मुताबिक, रूस ने इस हमले को “जानबूझकर, पूर्व-नियोजित और बिना उकसावे की सशस्त्र आक्रामकता” बताया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा: “हम तत्काल राजनीतिक और राजनयिक रास्ते पर लौटने का आह्वान करते हैं। रूस शांतिपूर्ण समाधान में मदद के लिए तैयार है।”
अमेरिका के भीतर की आवाज़ें: ट्रंप vs हैरिस
कमला हैरिस का विरोध
लेकिन अमेरिका के भीतर ही इस युद्ध का विरोध शुरू हो गया है। उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने 28 फरवरी को एक सख्त बयान जारी किया: “डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को उस युद्ध में घसीट रहे हैं, जो अमेरिकी जनता नहीं चाहती। मैं साफ कर दूं – मैं ईरान में रिजीम चेंज वार का विरोध करती हूं। हमारे सैनिक ट्रंप की पसंद के युद्ध के लिए खतरे में डाले जा रहे हैं।”
उन्होंने ट्रंप पर चुनावी वादा तोड़ने का आरोप लगाया: “चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने युद्ध शुरू करने के बजाय खत्म करने का वादा किया था। यह झूठ था।”
ट्रंप का रुख: “अब इम्युनिटी, बाद में डेथ”
ट्रंप ने खामेनेई की मौत के बाद ईरानी सेना और पुलिस से अपील की है। उनके ट्रुथ सोशल पोस्ट में लिखा था – “खामेनेई, इतिहास के सबसे बुरे लोगों में से एक, मर चुका है। यह सिर्फ ईरान के लोगों के लिए न्याय नहीं, बल्कि उन सभी महान अमेरिकियों और दुनिया भर के उन लोगों के लिए न्याय है, जो खामेनेई और उसके खून के प्यासे ठगों के गिरोह द्वारा मारे गए या अपंग किए गए।”
उन्होंने यह भी कहा कि “हम सुन रहे हैं कि IRGC, सेना और सुरक्षा बलों के कई जवान अब लड़ना नहीं चाहते और हमसे इम्युनिटी चाह रहे हैं। जैसा मैंने कल रात कहा था – ‘अब वे इम्युनिटी ले सकते हैं, बाद में उन्हें सिर्फ मौत मिलेगी!'” है
कितने यात्री फंसे? फ्लाइट कैंसिल का आंकड़ा
मध्य पूर्व में चल रहे इस संघर्ष ने हवाई यातायात को पूरी तरह ठप कर दिया है। कम से कम 11 देशों ने अपना एयरस्पेस बंद या प्रतिबंधित किया है: ईरान, इज़राइल, इराक, कुवैत, क़तर, बहरीन, यूएई, जॉर्डन, लेबनान, सऊदी अरब और ओमान।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अबू धाबी, दुबई और कुवैत सिटी की कम से कम 5 फ्लाइटें रद्द कर दी गईं। सूरत से दुबई जाने वाली एयर इंडिया एक्सप्रेस और इंडिगो की दैनिक उड़ानें शनिवार और रविवार को रद्द रहीं। करीब 260 यात्री रोज़ाना सूरत से दुबई जाते हैं ।
सबसे बड़ी समस्या उन भारतीय तीर्थयात्रियों की है जो रमज़ान के पवित्र महीने में उमरा के लिए मक्का-मदीना गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात के कई परिवार जेद्दा एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं। कुल मिलाकर अनुमान है कि 50,000 से ज्यादा भारतीय यात्री खाड़ी देशों के विभिन्न एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं। इंडिगो, एयर इंडिया, स्पाइसजेट, एमिरेट्स, कतर एयरवेज, एतिहाद सहित दर्जनों एयरलाइंस ने अपनी उड़ानें रद्द कर दी हैं।
खामेनेई का आखिरी भाषण: वो शब्द जो आज याद किए जा रहे हैं
खामेनेई की शहादत के बाद उनका आखिरी भाषण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। 17 फरवरी 2026 को, यानी अपनी मौत से ठीक 11 दिन पहले, उन्होंने तेहरान में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया था। उस भाषण में उन्होंने कहा था:
“हमारा दुश्मन हमारी ताकत को कम आंकता है। वह सोचता है कि हम डर जाएंगे, हम झुक जाएंगे लेकिन वह नहीं जानता कि यह राष्ट्र अपने नेता के पीछे खड़ा है। हम शहीदों का राष्ट्र हैं। हमारे लिए शहादत सम्मान है, अपमान नहीं। अगर एक दिन मैं भी शहीद हो जाऊं, तो जान लो कि यह रास्ता यहीं खत्म नहीं होगा। यह रास्ता हमारे लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा।”
ये शब्द आज उस समय और भी मायने रखते हैं जब लाखों ईरानी सड़कों पर उतरकर अपने शहीद नेता को आखिरी सलाम दे रहे हैं।
खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे, भारत से उनके गहरे रिश्ते थे। 1980 के दशक में, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और बाद में राजीव गांधी के कार्यकाल में, खामेनेई ने कश्मीर के मसले पर भारत की मदद की थी। उनके नेतृत्व में ईरान ने कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने से इनकार किया और हमेशा भारत की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया। यही वजह है कि आज भी कश्मीर की शिया बहुल आबादी में उनके प्रति गहरी श्रद्धा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, खामेनेई की मौत के बाद कश्मीर के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए। श्रीनगर के सैदा कादल इलाके में सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए, अमेरिका और इज़राइल विरोधी नारे लगाए । यह भारत-ईरान के गहरे जनसंपर्कों का प्रतीक है।
जयशंकर की डिप्लोमैटिक वॉक
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार को ईरान और इज़राइल दोनों के विदेश मंत्रियों से फोन पर बात की।
ईरानी विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराकची से बातचीत में उन्होंने “ईरान और क्षेत्र में हाल के घटनाक्रमों पर भारत की गहरी चिंता” साझा की ।
· इज़राबी विदेश मंत्री गिदोन सार से बातचीत में “तनाव कम करने के लिए संवाद और कूटनीति” का आह्वान किया ।
जयशंकर ने यूएई, कतर, कुवैत और बहरीन के अपने समकक्षों से भी बात की और भारतीय समुदाय की सुरक्षा का मुद्दा उठाया । खाड़ी देशों में करीब 1.5 करोड़ भारतीय रहते हैं।
विदेश मंत्रालय का बयान
भारत के विदेश मंत्रालय ने एक संतुलित बयान जारी किया: “भारत ईरान और खाड़ी क्षेत्र में हाल के घटनाक्रमों से गहरा चिंतित है। हम सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का आग्रह करते हैं। संवाद और कूटनीति के जरिए तनाव कम किया जाना चाहिए। सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए।”
वेनेजुएला से मादुरो, ईरान से खामेनेई: क्या बदल गया?
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पीछे मुड़कर देखना होगा। ठीक दो महीने पहले, 3 जनवरी 2026 को, अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कराकस से उठा लिया था। रेडियो हबाना क्यूबा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस सैन्य कार्रवाई में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। मादुरो को न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट में पेश किया गया, जहां उन्होंने खुद को “युद्धबंदी” घोषित किया ।
उस घटना के दो महीने बाद, अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान के सर्वोच्च नेता को निशाना बनाया। यह कोई संयोग नहीं है। यह एक पैटर्न है। पहले वेनेजुएला, अब ईरान। दोनों ही देश अमेरिकी नीतियों के मुखर विरोधी रहे हैं।
क्या बचा है रूल बेस्ड ऑर्डर?
यह सवाल अब हर अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार के मन में है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मुताबिक, किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल का प्रयोग निषिद्ध है। लेकिन अमेरिका और इज़राइल ने यह हमला बिना किसी स्पष्ट आत्मरक्षा के अधिकार के किया है।
रूसी राजदूत नेबेंजा ने सुरक्षा परिषद में यही सवाल उठाया: “जब बातचीत चल रही थी, तब सैन्य बल का इस्तेमाल कूटनीति का विश्वासघात है। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बहुत ही खतरनाक मिसाल है।”
चीनी राजदूत फू कोंग ने भी यही कहा: “अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने का सही तरीका बल का प्रयोग नहीं है, बल्कि बातचीत और वार्ता है।”
क्या युद्ध ही शांति का रास्ता है? गांधी का विकल्प
क्या युद्ध से कभी स्थायी शांति मिली है? इतिहास गवाह है कि युद्ध सिर्फ और युद्ध को जन्म देता है। जब 1938 में यहूदियों पर नाजी अत्याचार हो रहे थे, तब महात्मा गांधी ने एक लेख लिखा था – “द ज्यूज़”। उन्होंने जर्मनी के यहूदियों से कहा था कि वे सत्याग्रह अपनाएं, अहिंसक प्रतिरोध करें।
गांधी के इस लेख की काफी आलोचना हुई। लोगों ने कहा कि वे यहूदियों की पीड़ा नहीं समझते। लेकिन मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग के अनुसार, गांधी का रुख न तो भोलापन था, न राजनीतिक दबाव। उनका मानना था कि साधन और साध्य में अंतर नहीं किया जा सकता। अगर साधन हिंसक हैं, तो साध्य भी हिंसक ही होगा ।
आज जब मध्य पूर्व में मिसाइलें बरस रही हैं, जब स्कूलों में बच्चियां मर रही हैं, जब होर्मुज बंद है और दुनिया की अर्थव्यवस्था दांव पर लगी है – तब गांधी का यह सवाल फिर खड़ा होता है। क्या सच में युद्ध से शांति मिलेगी? या फिर गांधी का रास्ता – अहिंसा, संवाद, सहिष्णुता – ही एकमात्र विकल्प है?
आखिर में…
खामनेई, जिन्होंने 35 साल तक ईरान की कमान संभाली, अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनके जाने से ईरान का प्रतिरोध खत्म नहीं हुआ है। होर्मुज बंद है, तेल की कीमतें आसमान पर हैं, और लाखों ईरानी सड़कों पर “डेथ टू अमेरिका” के नारे लगा रहे हैं।
दस देश एक साथ निशाने पर। दुनिया की ऊर्जा जीवनरेखा ठप। एक सर्वोच्च नेता की शहादत। और सबसे बड़ी बात – अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता के वो सवाल, जिनका जवाब किसी के पास नहीं है।
इतिहास के इस मोड़ पर सिर्फ इतना कहा जा सकता है – जैसे गांधी ने कहा था, “आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।”
ओंकारेश्वर पांडेय