राजनीति

भारतीय संविधान का रक्षा कवच है नौवीं अनुसूची, लेकिन कतिपय सीमाओं के बाद नहीं!

कमलेश पांडेय

भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची को उसका रक्षा कवच करार देते हुए उसे राजनेताओं द्वारा अत्यंत जरूरी ठहराया गया है क्योंकि यह उन विशेष कानूनों की एक सूची है जिन्हें न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार से देखा जाए तो कतिपय व्यापक जनहितकारी निर्णयों के विरुद्ध सत्तागत बहुमत प्रेरित सियासी सोच को इसी नौवीं अनुसूची के माध्यम से राष्ट्र पर थोप दिया गया है और आगे भी ऐसा किया जा सकता है। 

चूंकि संविधान की नौंवीं अनुसूची को वर्ष 1951 में प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा ही शामिल किया गया था, खासकर भूमि सुधार और अन्य प्रगतिशील कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए ताकि इन्हें बिना किसी विघ्न के लागू किया जा सके। इसलिए इस पर एक स्वस्थ बहस अपेक्षित है। भले ही इसका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करना और किसानों तथा वंचित वर्गों को संरक्षण देना बताया जाता है लेकिन कुछेक मामलों में इससे आम आदमी के प्राकृतिक अधिकारों का हनन भी हुआ है। 

इसलिए इस पर एक जनमत सर्वेक्षण तो होना ही चाहिए। इससे राजनीतिक मनमानी भी थमेगी क्योंकि नेहरू से लेकर मोदी प्रशासन तक ने इसके दुरुपयोग पर अंगुली नहीं उठाई है। दरअसल, नौवीं अनुसूची का महत्व इस बात में है कि यह सरकार को ऐसे कानून बनाने की स्वतंत्रता देती है जो सामाजिक न्याय और आर्थिक सुधार के लिए जरूरी हैं लेकिन इन्हें न्यायालयों के समक्ष चुनौती से बचाया जाता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि यदि नौवीं अनुसूची में शामिल कोई भी कानून मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है, तो वह न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता है। 

इस तरह, नौवीं अनुसूची सामाजिक-आर्थिक सुधारों को सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक ढाल का काम करती है जिससे देश में भूमि संबंधी अन्य सुधार निर्बाध रूप से लागू हो सकें और न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक रुकावटें न आएं। यह संविधान के सामाजिक न्याय के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है लेकिन सवाल है कि क्या वाकई ऐसा हो पाया है? जवाब होगा बिल्कुल नहीं!

आंकड़े बताते हैं कि नौवीं अनुसूची में मुख्यतः भूमि सुधार/जमींदारी उन्मूलन, कृषि भूमि Ceiling, राज्य के सार्वजनिक नियंत्रण वाले आर्थिक उपाय, और कुछ आरक्षण-संबंधी कानून (जैसे तमिलनाडु का 69% आरक्षण) विभिन्न समयों में डाले गए; इसे 1951 के प्रथम संशोधन से जोड़ा गया था और 24 अप्रैल 1973 के बाद डाले गए कानून “मूल संरचना” का उल्लंघन करने पर न्यायिक समीक्षा योग्य हैं। 

जहां तक इज़की पृष्ठभूमि और उद्देश्य की बात है तो नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा अनुच्छेद 31B के साथ जोड़ा गया ताकि विशेषतः भूमि सुधार/जमींदारी उन्मूलन जैसे सामाजिक-आर्थिक सुधारों को मौलिक अधिकारों के आधार पर निरस्तीकरण से संरक्षा मिल सके। इसमें केंद्र और राज्यों के वे कानून रखे गए जिनका उद्देश्य भूमि का पुनर्वितरण, कृषि सुधार, तथा समानता-उन्मुख नीतियाँ लागू करना था।

सवाल है कि कब-कब और किस प्रकार के मुद्दे इसमें जोड़े गए तो यह कहना उपयुक्त होगा कि 1951 से शुरुआती दशकों में: प्रमुख रूप से जमींदारी उन्मूलन, भू-सीमा (land ceiling), भूसुधार और कृषि भूमि के पुनर्वितरण से जुड़े राज्य कानूनों को शामिल किया गया, ताकि वे दीर्घ न्यायिक विवादों से मुक्त रहकर लागू हों। जबकि बाद के वर्षों में: आर्थिक नियंत्रण, राज्य द्वारा अधिग्रहण/सम्बंधित नीतियाँ, तथा कुछ आरक्षण-संबंधी प्रावधान भी शामिल किए गए। प्रमुख उदाहरण के रूप में तमिलनाडु का 69% आरक्षण कानून नौवीं अनुसूची में रखा गया। वहीं, समग्र रूप से, सूची में सैकड़ों राज्य/केंद्रीय क़ानून सम्मिलित हुए जिनमें बहुलांश भूमि-सुधार संबंधी हैं, जबकि एक भाग आरक्षण और सामाजिक न्याय उपायों से संबंधित है। 

जहां तक इनकी न्यायिक समीक्षा की स्थिति का सवाल है तो केशवानंद भारती (1973) के बाद का सिद्धांत: नौवीं अनुसूची में रखे हुए क़ानून भी यदि “मूल संरचना” का उल्लंघन करें तो न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं। वामन राव (1981): 24 अप्रैल 1973 से पहले शामिल क़ानूनों को सामान्यतः वैध माना गया, परन्तु इस तिथि के बाद जोड़े गए क़ानून “मूल संरचना/मौलिक अधिकार” के उल्लंघन पर चुनौती योग्य हैं। 

जहां तक आज की स्थिति और उदाहरण की बात है तो आज भी कुछ राज्य उच्च आरक्षण सीमा जैसी व्यवस्थाओं के लिए अपने क़ानूनों को नौवीं अनुसूची में रखने/रखवाने की मांग उठाते हैं ताकि उन्हें अतिरिक्त कवच मिल सके; परंतु यह कवच पूर्ण नहीं है और मूल संरचना कसौटी लागू रहती है। तमिलनाडु के 69% आरक्षण का हवाला अक्सर दिया जाता है जो अनुसूची 9 में निहित है पर उस पर भी मूल संरचना परीक्षण लागू हो सकता है। 

इसलिए राजनेताओं को आरक्षण सम्बन्धी अति उत्साह से बचना चाहिए। साथ ही, इस 9वीं अनुसूची को विलोपित किया जाना चाहिए ताकि इसमें शामिल किए हुए मुद्दों पर स्वस्थ न्यायिक बहस का मार्ग प्रशस्त हो सके। नेहरू प्रशासन के इस अतिवादी सोच को मोदी प्रशासन दुरुस्त करेगा, यही आम प्रबुद्ध लोगों की इच्छा भी है।

कमलेश पांडेय