समाज

क्या प्यार की भी कोई उम्र होती है?

अमरपाल सिंह वर्मा

इन दिनों अखबारों और सोशल मीडिया पर बाड़मेर के पूर्व सांसद मानवेन्द्र सिंह जसोल के पुनर्विवाह चर्चा हो रही है।  एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें उनकी और उनकी मां के बीच तकरार सुनाई दे रही है और उसी को इस चर्चा से जोडक़र देखा जा रहा है। दो साल पहले उनकी पत्नी चित्रा सिंह का सडक़ हादसे में निधन हो गया था। उनके बेटे का विवाह भी हाल में हुआ है। सोशल मीडिया पर यह प्रचार हुआ है कि कि 62 वर्षीय मानवेन्द्र सिंह ने पुनर्विवाह कर लिया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह बात सच है या नहीं और सच कहूं तो इस बहस में पडऩा जरूरी भी नहीं है लेकिन इस पूरे शोर ने एक सवाल फिर से सामने ला खड़ा किया है कि क्या उम्रदराज लोगों को प्रेम करने या विवाह करने का अधिकार नहीं है?


हमारे समाज में प्रेम का स्वागत तब तक है जब तक वह युवावस्था में हो। युवाओं के प्रेम को कभी कहानी बना दिया जाता है, कभी कविता, कभी फिल्म लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति पचास या साठ वर्ष की उम्र पार कर लेता है, समाज उससे एक अलग तरह के आचरण की अपेक्षा करने लगता है। मान लिया जाता है कि अब उसके जीवन में प्रेम, साथ और विवाह जैसे भावनात्मक प्रश्नों की कोई जगह नहीं बची है। अब उससे कहा जाता है कि धार्मिक कर्मकांड में समय लगाओ, नाती-पोतों के साथ खेलो, और जीवन की शेष यात्रा शांत भाव से काटो। यह सलाह देखने में भले ही सहज लगे लेकिन इसके पीछे एक कठोर सामाजिक धारणा छिपी होती है कि एक उम्र के बाद इंसान की भावनाएं समाप्त हो जानी चाहिए। वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। उम्र बढ़ती है लेकिन मनुष्य की भावनाएं समाप्त नहीं होतीं। जीवन के उत्तरार्ध में अक्सर परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं जब किसी साथी की जरूरत पहले से अधिक महसूस होती है। अनेक पुरुष ऐसे होते हैं जिनकी पत्नी का निधन हो चुका होता है। अनेक महिलाएं ऐसी होती हैं जिनके पति दुनिया में नहीं रहे। बच्चे अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हो जाते हैं। घर भरा हुआ दिखाई देता है लेकिन ऐसे लोगों के भीतर एक गहरा खालीपन धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाता है।


दुखद है कि समाज इस अकेलेपन को नहीं देखता लेकिन यदि वही व्यक्ति किसी के साथ जीवन बांटने की इच्छा प्रकट कर दे या विवाह करने का निर्णय ले ले तो समाज तुरंत असहज हो उठता है जैसे किसी सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन हो गया हो। मुझे पत्रकारिता के चार दशक के अनुभव में ऐसे अनेक प्रसंग देखने को मिले हैं जब ढलती उम्र में साथ तलाशने वाले लोगों को अनावश्यक सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ा। कुछ वर्षों पहले श्रीगंगानगर में एक घटना चर्चा में आई थी। अस्सी वर्ष के एक बुजुर्ग ने पचपन वर्ष की एक महिला से विवाह कर लिया। दोनों की मुलाकात एक बस यात्रा के दौरान हुई थी। बातचीत से शुरू हुआ परिचय धीरे-धीरे विश्वास में बदल गया और अंतत: उन्होंने विवाह का निर्णय लिया लेकिन विवाह के बाद सबसे बड़ी चुनौती समाज और परिवार की प्रतिक्रिया थी। परिवार के कई सदस्यों को यह स्वीकार करना कठिन लगा कि इस उम्र में भी कोई नया संबंध शुरू कर सकता है। सवाल यह नहीं था कि दोनों वयस्क हैं या नहीं बल्कि यह था कि इस उम्र में ऐसा क्यों?


मुझे क्राइम बीट की रिपोर्टिंग के दौरान पुलिस थानों में भी कई बार ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती थीं जब उम्रदराज विधुर किसी परिचित महिला के साथ बैठे हुए मिल जाते थे और इसे सनसनीखेज घटना की तरह पेश किया जाता था। कई बार उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित भी होना पड़ता था। दरअसल समस्या प्रेम नहीं है, समस्या हमारी सामाजिक सोच है। हमने मान लिया है कि प्रेम केवल युवाओं का अधिकार है। जबकि सच्चाई यह है कि जीवन के उत्तरार्ध का प्रेम कई बार युवावस्था के प्रेम से अधिक शांत और सच्चा होता है। उसमें न जल्दबाजी होती है, न प्रदर्शन। उसमें केवल साथ की इच्छा होती है। दिल चाहता है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसके साथ फुरसत के समय दो बातें की जा सकें, शाम की चाय साझा की जा सके और यह महसूस हो सके कि जीवन अभी पूरी तरह खाली नहीं हुआ है।

विडंबना यह है कि हम फिल्मों और साहित्य में बुजुर्गों की प्रेम कहानियों पर भावुक हो जाते हैं लेकिन अपने आसपास ऐसा कुछ घटित होते ही नैतिकता के पहरेदार बन जाते हैं। शायद समय आ गया है कि हम इस विषय पर थोड़ा ठहरकर सोचें। जीवन की शाम केवल अंधेरा नहीं होती। कई बार उसी समय आकाश सबसे सुंदर रंगों से भर जाता है। प्रेम उम्र की सीमाओं में कैद नहीं होता। वह तब भी जन्म ले सकता है जब जीवन की दोपहर बीत चुकी हो और शाम उतर रही हो। शायद सच यही है कि कभी-कभी सबसे खूबसूरत सूरज वही होता है जो ढलने से ठीक पहले सबसे ज्यादा चमकता है। उम्रदराज लोगों की प्रेम भावनाओं को भी इसी तरह देखा जाना चाहिए।

अमरपाल सिंह वर्मा