सियासत का सधा हुआ कदमताल!

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     जी हाँ बिहार की धरती पर चुनावी बिगुल बज चुका है सभी पार्टियों ने अपने-अपने योद्धाओं को चुनावी मैदान में झोंक रखा है। शाब्दिक बाणों की बौछार आरम्भ हो चुकी है। आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। सभी सियासी महारथियों ने अपने-अपने करतब दिखाना आरंभ कर दिया है। सब अपने-अपने तरीके से सियासी वार कर रहे हैं। कोई पाकिस्तान से जिन्ना के जिन को फिर से जिंदा करने में लगा है तो कोई अपराध और भ्रष्टाचार के शैतान का सहारा लेकर उसे जान फूँकने में लगा हुआ है तो कोई अपने कार्य के गुणगान में लगा हुआ है तो कोई बिहार में सत्ता परिवर्तन की सपनों को जनता की खुली हुई आँखो में सपना झोंकने की जुगत में लगा हुआ है। चुँकि सियासी मौसम आ गया है इसलिए सब अपने-अपने हुनर दिखा रहे हैं। लेकिन जिस प्रकार से बिहार में सियासी बिसात इस बार बिछाई गई है वह बहुत ही रोचक है जिसे बहुत ही गहराई में उतरकर समझने की आवश्यकता है। क्योंकि बिहार का चुनाव इस बार कुछ अलग ही रूप में लड़ा जा रहा है। इस बार बिहार की सियासत में जो सियासी दाँव चला गया है वह पूर्ण रूप शतरंज के घोड़े की चाल में चला गया जोकि कभी भी सीधा चलता ही नहीं है। ठीक इसी प्रकार इस बार बिहार की राजनीति अपनी चाल चल रही है। जिसमें नीतीश की पार्टी शतरंज के घोडे की चाल से घिरी हुई नजर आ रही है। यदि एनडीए के गठबंधन पर नजर डालते हैं तो काफी कुछ दृश्य साफ हो जाता है। बिहार के सभी समीकरणों को समझने के बाद जो निष्कर्ष निकलता है वह बहुत ही चौकाने वाला है क्योंकि बिहार के चुनाव में चिराग की पार्टी लोजपा इस बार एनडीए से अलग होकर चुनाव ल़ड़ रही है। लोजपा का अपने बल पर चुनाव लड़ना कोई नई बात नहीं है लेकिन अगर लोजपा अलग-रूप रेखा पर चुनाव लड़ती है तो स्थिति चौकाने वाली है क्योंकि जेडीयू के सामने लोजपा अपना उम्मीदवार खड़ा करती है और भाजपा के सामने लोजपा अपना उम्मीदवार नहीं खड़ा करती तो क्या यह संदेश नहीं जाता की लोजपा जेडीयू का रास्ता रोकना चाहती है और भाजपा को खुला मैदान देना चाहती है। बात यहीं समाप्त नहीं होती यह बात और आगे तक जाती है वह यह कि भाजपा और जेडीयू के सीट के बंटवारे में जो सीट जेडीयू को मिली उस पर जेडीयू ने अपने प्रत्यासी उतार दिए और स्वाभाविक रूप से भाजपा के सिंबल को वहाँ से टिकट नहीं मिला। लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि सीट के बँटवारे में भाजपा के प्रत्यासियों को टिकट लोजपा से प्राप्त हो गया और वह प्रत्यासी जेडीयू के प्रत्यासी के सामने लोजपा के सिम्बल पर चुनाव लड़ रहे हैं। तो क्या यह समझ लिया जाए कि चुनावी रणनिति के अंतर्गत लोजपा एनडीए से अलग हो गई और अधिक से अधिक सीट पर अप्रत्यक्ष रूप से रणनति के तहत भाजपा के उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे हुए हैं। चुँकि नेताओं के भाषण और नीति में सदैव अंतर देखा गया है। नेता भाषणों में तो और कुछ कहते हैं लेकिन नीति के आधार पर कुछ और ही करते हुए नजर आते हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि इस बार नितीश की जेडीयू को पूरी तैयारी के साथ सीमित करने की चुनावी योजना बन चुकी है जिसके मात्र परिणाम आने बाकी हैं। क्योंकि सियासत के सियासी मैदान में सब कुछ संभव है। प्रत्येक सियासी योद्धा अपनी-अपनी रणनीति को फिट करने की जुगत में लगा रहता है। यह सत्य है इसे नकारा नहीं जा सकता यह अलग बात है किसकी रणनीति में कितनी धार है। जिस प्रकार की धार होगी निश्चित ही उसी धार पर सियासी समीकरण को गति करना है। क्योंकि सियासत में धार ही आधार है। दूसरी विषय यह है कि कौन सी पार्टी का पार्टी अध्यक्ष कितनी दूर की सियासी कौड़ी लाता है क्योंकि सियासत में जो भी चक्रव्यूह रचा जाता है उसके परिणाम दूरगामी होते हैं। यदि शब्दों को बदलकर कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि सियासत की पिच पर खेलता हुआ सियासी बल्लेबाज प्रत्येक गेंद को बाउंड्री लाईन के बाहर भेजना चाहता है। लेकिन यह भी सत्य है दूसरी छोर पर खड़ा हुआ गेंदबाज भी कोई अनाड़ी नहीं होता वह भी सियासत की दुनिया का मंझा हुआ परिपक्व खिलाड़ी होता है जोकि गुगली और यार्क दोनों तरीके गेंद फेंकने में माहिर होता है। अगर सियासी बल्लेबाज ज़रा भी गेंद की गति भाँपने में चूक गया तो टाईमिंग बिगड़ना तय है। बस फिर क्या सियासत के मैदान पर टाईमिगं की मुख्य भूमिका होती है जिसने टाईमिगं को भाँपने चूक की उसका आउट होना तय है। यदि शब्दों को बदलकर कहें कि सियासत के मैदान में टाईमिगं बहुत महत्वपूर्ण होती है तो यह अडिग सत्य है। क्योंकि प्रत्येक सियासी खिलाड़ी को जनता की नब्ज समझनी पड़ती है जिस नब्ज के आधार पर कार्यकर्ता से लेकर संगठन के पदाधिकारी की नियुक्ति होती है। जिसमें जाति,धर्म,संप्रदाय के आधार पर संगठन में पदाधिकारी बनाए जाते हैं। फिर इसी आधार पर वोट का आंकलन किया जाता है। फिर इसी अनुमानित वोट बैंक के आधार पर प्रत्यासी के टिकट की दावेदारी का आंकलन किया जाता है। फिर उसके बाद टिकट वितरण की प्रक्रिया आरंभ होती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि प्रत्येक पार्टी ऐसे प्रत्यासी को टिकट देना चाहती है जोकि चुनाव में जीत दर्ज कर सके। क्योंकि प्रत्येक पार्टी जिताऊ उम्मीदवार को मैदान में उतारना चाहती है। लेकिन चुनाव के एक अहम हिस्सा यह भी होता है कि वोट का बिखराव कैसे किया जाए जिससे कि अपने लिए सीधा रास्ता निकल सके साथ ही दूसरी अपने टक्कर की पार्टी का रास्ता कैसे रोका जाए जिससे वह पार्टी संख्या बल तक न पहुँच सके। अपने लिए रास्ता खोजना और दूसरे के लिए रास्ता रोकना चुनाव रणनीति का मुख्य हिस्सा होता है। इसी को टाईमिंग कहते हैं। सियासत में टाईमिंग को समझना बहुत जरूरी है। क्योंकि आज की सियासत जाति-धर्म के इर्द-गिर्द परिक्रमा कर रही है। साथ ही सरकार बनाने बिगाड़ने में संख्या बल की आवश्यकता होती है जिस कारण प्रत्येक सियासी पार्टी अपना अधिक से अधिक उम्मीदवार जिताना चाहती है। बस सियासत की यही मुख्य नब्ज ने पूरे सियासी सिस्टम को बाँध रखा है। क्योंकि जिसके पास अधिक संख्या बल होगा वह सरकार की भूमिका में खड़ा दिखाई देगा। सियासत का पूरा खेल इसी संख्या बल के लिए किया जाता है। यदि शब्दों को बदलकर कहें तो शायद गलत नहीं होगा कि इसी संख्या बल के लिए सियासत के सारे दाँव-पेंच लगाए जाते हैं इसी संख्या बल के लिए सियासत के सारे जाल बुने जाते हैं इसी संख्या बल के लिए सियासत के सभी समीकरण बिठाए जाते हैं। फिर चाहे जातीय समीकरण हो या धार्मिक अथवा अपराधिक माफिया रूपी समीकरण हो प्रत्येक प्रकार का समीकरण मात्र संख्या बल जुटाने के लिए ही बिठाए जाते हैं। क्योंकि बिना संख्या बल के सत्ता की कुर्सी तक पहुँचना असंभव है इसीलिए संख्या बल सियासत की रीढ़ हड्डी बन चुका है जिस पर सभी सियासी योद्धाओं की नजरें टिकी हुई होती हैं। इसी संख्या बल को आधार बनाते हुए इस बार भाजपा ने बिहार में एक बड़ा दाँव चला है जोकि समय के साथ जनता के सामने परिणाम के रूप में खुद ही चलकर आ जाएगा। क्योंकि सियासत के सियासी दाँव-पेंच बहुत ही दूर गामी होते हैं जिन्हें आसानी के साथ समझ पाना सबके पहुँच से बाहर होता है।

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