राजनीति

‘गलाथिया बे’ प्रोजेक्ट का भारत के लिए सामरिक महत्व

रामस्वरूप रावतसरे

देश के सबसे बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी ने मंजूरी दे दी है। 92,000 करोड़ रुपए से बनने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अंडमान निकोबार का सबसे निचला द्वीप ग्रेट निकोबार काफी अहम है। सरकार को उम्मीद है कि 2040 तक ये पूरी तरह तैयार हो जाएगा। अगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह बन जाता है तो भारत को एक ‘हॉगकॉग’ या ‘सिंगापुर’ मिल जाएगा। भारत हिन्द महासागर में चीन पर बढ़त बना लेगा।

जानकारों के अनुसार सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का जलडमरूमध्य वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरते है। इसे हिन्द महासागर का ‘चोक प्वांइट पॉलिटिक्स’ का केन्द्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम बताए जा रहे है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट। पावर प्लांट, जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें।

जानकारों की माने तो भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन जाएगा, लाखों नौकरियाँ पैदा होगी। अभी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ज्यादा होने से परेशानी आ रही है। जब ग्रेट निकोबार में आधुनिक पोर्ट बनेगा तो कंटेनर सीधे यहाँ पहुँचेंगे। समय के साथ-साथ खर्च भी कम होंगे। दूसरे देशों की शिप भी पहुँचेगी और भारत को समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मिलेगी। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी ये प्रोजेक्ट काफी अहम है। इस प्रोजेक्ट पर 92000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्यौकफ्यू और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक तरह से उसने समुद्र में भारत को घेरने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाए। इस प्रोजेक्ट से निगरानी और सैनिकों की मौजूदगी आसान हो जाएगी। इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए भी ये काफी अहम बताया जा रहा है।

साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया था। 90000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। जानकारी के अनुसार इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख टीईयू (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ कंटेनर तक संभालने के काबिल हो जाएगा। बताया जा रहा है कि ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25 प्रतिशत कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का नुकसान लगता है।

गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गा के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है जहाँ अभी 70 प्रतिशत से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।

कॉन्ग्रेस और पर्यावणविद इसके दीर्घकालीन पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध कर रहे हैं। परियोजना का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस और पर्यावरणविद का मानना है कि इससे जैव विविधता, पारिस्थिकी तंत्र और शेरोन जैसे जनजातीय समुदाय को नुकसान होगा जिनकी आबादी पहले ही सैकड़ों में बची है। परियोजना के विरोध में कई याचिकाएँ कोलकाता हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं। इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी आदिवासियों का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी कुछ नहीं कह रही हैं। इस पर भी इन्हें अपना मत रखना चाहिए।

भारत का 40 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक योजना बताई जा रही है।

जानकारों के अनुसार भारत अब विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल और चीन के दबदबे को हिन्द महासागर में झेल नहीं सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।

रामस्वरूप रावतसरे