विश्ववार्ता

अमेरिका, इजरायल – ईरान युद्ध : विचार, वर्चस्व और संप्रभुता का खूनी संघर्ष

डॉ घनश्याम बादल

अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए जा रहे हमले आज की वैश्विक राजनीति का वह क्रूर चेहरा है, जहाँ ‘शक्ति ही नीति’ है और नीति नैतिकता का स्थान ले चुकी है।

अमेरिका और इज़रायल के लिए ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि ऐसी शक्ति संरचना है जो उनके प्रभुत्व वादी ढाँचे को चुनौती देती है, उनकी भू-राजनीतिक रणनीति को असहज करती है और उनकी वैश्विक व्यवस्था के लिए वैचारिक ख़तरा बन लगती है। ईरान के विरुद्ध इस आक्रामकता की जड़ें तो स्वार्थपरक राजनीति में हैं, लेकिन उसकी शाखाएं अर्थव्यवस्था, समाज और वैश्विक शक्ति-संतुलन तक फैली हुई हैं।

ईरान ने पश्चिमी वर्चस्व को स्वीकार करने से इनकार किया है । उसने न केवल अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी स्वयं को एक वैकल्पिक शक्ति-केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। यह वही ‘प्रतिरोध की धुरी’ है, जो अमेरिकी-इज़रायली प्रभाव क्षेत्र को सीधी चुनौती देती है।

वैचारिक धरातल पर इज़रायल के लिए यह चुनौती अस्तित्व का प्रश्न है, क्योंकि ईरान न केवल उसकी नीतियों का विरोध करता है, बल्कि उसके प्रभुत्व को भी अस्वीकार करता है। जबकि अमेरिका के लिए यह टकराव इससे भी ज़्यादा मायने रखता है क्योंकि ईरान उसकी वर्ल्ड लीडर की भूमिका,सैन्य-संधि व्यवस्था और आर्थिक एकाधिकार के लिए सीधी चुनौती है।

निर्विवाद रूप से ईरान ऊर्जा संसाधनों की दृष्टि से एक वैश्विक शक्ति है। तेल और गैस के विशाल भंडार, फारस की खाड़ी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर रणनीतिक प्रभाव, और वैकल्पिक ऊर्जा व्यापार मार्गों की संभावनाएँ,ये सभी वैश्विक पूंजी के समीकरणों को प्रभावित करती हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों की नीति हमेशा से रही है कि वैश्विक ऊर्जा प्रवाह उनके नियंत्रण में रहे, इसके विपरीत, ईरान रूस और चीन जैसे देशों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक आर्थिक धुरी खड़ी करने की कोशिश करता रहा है, जो डॉलर आधारित वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देती है इसीलिए यह संघर्ष केवल बम और मिसाइलों का नहीं है, मुद्रा, बाजार, व्यापार मार्ग और संसाधनों के नियंत्रण का भी युद्ध है।

सामाजिक स्तर पर यह टकराव पश्चिमी आधुनिकता बनाम इस्लामी-सांस्कृतिक स्वायत्तता का संघर्ष है। ईरान जिस सामाजिक मॉडल को अपनाता है, वह पश्चिमी उदार लोकतांत्रिक ढाँचे से भिन्न है। यह भिन्नता जीवन-दृष्टि, और सांस्कृतिक पहचान की है। इसलिए यह युद्ध एक वैचारिक युद्ध भी है, जहाँ मीडिया, सूचना, प्रचार और मनोवैज्ञानिक दबाव भी हथियार बन रहे हैं। बेशक, अमेरिका और इसराइल बहुत ताकतवर हैं लेकिन सामरिक दृष्टि से ईरान को कमज़ोर आंकना ऐतिहासिक भूल होगी। प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति में अमेरिका और इज़रायल तकनीकी रूप से भले ही आगे हों, लेकिन ईरान की असममित युद्ध क्षमता उसे अत्यंत प्रभावी बनाती है। मिसाइल तकनीक, ड्रोन नेटवर्क, साइबर युद्ध क्षमता और क्षेत्रीय सहयोगी समूह उसे एक ऐसे देश के रूप में स्थापित करते हैं जो पारंपरिक युद्ध के नियमों से नहीं, बल्कि नेटवर्क आधारित युद्ध से लड़ता है। यही कारण है कि यह संघर्ष किसी निर्णायक युद्ध में बदलने के बजाय एक लंबे, थकाऊ और व्यापक अस्थिरता के रूप में फैले की ओर अग्रसर होता दिखाई दे रहा है।

बीते समय में आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरानी समाज को कमजोर किया है, महँगाई और बेरोज़गारी ने असंतोष को जन्म दिया है, लेकिन बाहरी हमलों ने एक विरोधाभासी स्थिति भी पैदा की है-जहाँ सत्ता के प्रति आलोचना के बावजूद राष्ट्र के प्रति निष्ठा मजबूत होती है। बाहरी ख़तरा समाज को विभाजित करने के बजाय एक प्रकार की राष्ट्रीय एकजुटता पैदा करता है, जो सत्ता को वैधता भी देता है और विरोध को सीमित भी करता है।

अब तक इस संघर्ष में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामनेई सहित कई बड़े सैन्य और रणनीतिक नेतृत्वकर्ता मारे जा चुके हैं। रिवोल्यूशनरी गार्ड के वरिष्ठ अधिकारी, रक्षा और वैज्ञानिक कार्यक्रमों से जुड़े प्रमुख नाम, और क्षेत्रीय अभियानों के योजनाकार टकराव की भेंट चढ़ चुके हैं। ईरान विरोधी ताकतों की एक रणनीति है नेतृत्व, ज्ञान और संरचना को तोड़ने की नीति, ताकि ईरान की दीर्घकालिक सामरिक क्षमता कमजोर हो सके।

वैश्विक स्तर पर इसके प्रभाव दूरगामी और विनाशकारी हैं। ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता, तेल की कीमतों में उछाल, वैश्विक मुद्रास्फीति का दबाव, विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर संकट और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की अनिश्चितता इस संघर्ष के प्रत्यक्ष परिणाम होंगे।

यह युद्ध दुनिया को स्पष्ट रूप से दो ध्रुवों में बाँट रहा है। एक ओर अमेरिका-इज़रायल और उनके सहयोगी हैं, दूसरी ओर ईरान के साथ सहानुभूति रखने वाली शक्तियाँ। हैं अभी तक रूस और चीन इस संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदार नहीं है लेकिन रणनीतिक रूप से गहराई से जुड़े हैं, क्योंकि ईरान की स्थिरता उनके भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों से जुड़ी है। तुर्की, सऊदी अरब और खाड़ी देशों के लिए यह युद्ध क्षेत्रीय संतुलन को अस्थिर करने वाला कारक है। भारत पर ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, समुद्री मार्गों और प्रवासी नागरिकों के माध्यम से युद्ध का गहरा प्रभाव पड़ेगा।

यह संघर्ष यदि रोका नहीं गया, तो यह केवल मध्य-पूर्व का संकट नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक संकट में बदल जाएगा। यह एक ऐसी आग है, जो धीरे-धीरे पूरे अंतरराष्ट्रीय तंत्र को अपनी चपेट में ले सकती है। युद्ध का विस्तार केवल भौगोलिक नहीं होगा, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर पूरी दुनिया को अस्थिर करेगा।

संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संस्थानों की भूमिका अब बेमानी बन चुकी है। वास्तविक आवश्यकता है एक नई वैश्विक राजनीतिक इच्छा-शक्ति की, जहाँ संवाद को युद्ध से ऊपर रखा जाए, संतुलन को प्रभुत्व से ऊपर और सह-अस्तित्व को वर्चस्व से ऊपर। प्रतिबंधों की राजनीति, सैन्य दबाव और रणनीतिक घेराबंदी ने अब तक केवल हिंसा को जन्म दिया है, समाधान नहीं।

यह संघर्ष केवल ईरान, अमेरिका या इज़रायल का प्रश्न नहीं,वैश्विक नैतिकता का प्रश्न है। यह उस अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का आईना है, जहाँ ताकतवर देशों के लिए युद्ध नीति है और कमज़ोर देशों के लिए नियति। यदि यह युद्ध नहीं रुका, तो इतिहास इसे एक और ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज करेगा, जहाँ मानवता ने विवेक के बजाय वर्चस्व को चुना, संवाद के बजाय हथियारों को और न्याय के बजाय शक्ति को। यही वक्त है जब दुनिया को तय करना होगा कि वह शक्ति की राजनीति के साथ चलेगी या शांति की राजनीति के साथ और यदि यह चुनाव अब नहीं हुआ, तो भविष्य में विकल्प ही नहीं बचेगा।

डॉ घनश्याम बादल