मनोरंजन

कला, अभिव्यक्ति और बदलाव का माध्यम-थिएटर

(रंगमंच) 27 मार्च दिवस विशेष आलेख 

-सुनील कुमार महला 

हर वर्ष 27 मार्च को विश्व रंगमंच दिवस (वर्ल्ड थिएटर डे) मनाया जाता है। वास्तव में,इसकी शुरुआत वर्ष 1961 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (आइटीआइ) द्वारा की गई थी, जो यूनेस्को से जुड़ा एक प्रमुख सांस्कृतिक संगठन है।पाठक जानते होंगे कि रंगमंच(थिएटर)को समाज का दर्पण कहा जाता है, क्योंकि यह केवल मनोरंजन का ही साधन नहीं है, बल्कि यह विचार, संवेदना और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम है।सच तो यह है कि थिएटर लोगों को सोचने, महसूस करने और बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यह विभिन्न देशों की संस्कृतियों, वहां के लोगों के विचारों और उनके संघर्षों को समझने में सहायता करता है तथा वैश्विक तनाव, युद्ध और सामाजिक विभाजन के दौर में मानवता को जोड़ने वाली कला के रूप में कार्य करता है। साथ ही, यह शिक्षा, साक्षरता, संवाद, सहिष्णुता और शांति को बढ़ावा देता है।सरल शब्दों में कहें तो ‘रंगमंच’ वह मंच है, जहाँ अभिनय, संवाद, संगीत, नृत्य और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से किसी कथा या विचार को जीवंत रूप दिया जाता है। अर्थात् यह साहित्य, कला और समाज का अनूठा संगम है। रंगमंच के महत्व के बारे में समझाते हुए अंग्रेजी भाषा के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर ने प्रसिद्ध नाटक ‘ऐज यू लाइक इट’ में यह बात कही थी कि-‘सारी दुनिया एक रंगमंच है, और सभी स्त्री-पुरुष केवल पात्र हैं।’ वास्तव में, इस विचार के माध्यम से शेक्सपियर बताते हैं कि पूरा संसार एक रंगमंच के समान है, जहाँ हर व्यक्ति एक अभिनेता की तरह अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाता है। जीवन के अलग-अलग चरण-बचपन, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा-मानो किसी नाटक के विभिन्न दृश्य हैं, जिनमें इंसान समय के अनुसार अपने किरदार बदलता रहता है। इस प्रकार रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मानव जीवन और समाज का सजीव प्रतिबिंब भी है।

भारतीय रंगमंच के इतिहास की यदि हम यहां पर बात करें तो भारतीय रंगमंच का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी है, जिसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। उस समय यज्ञ, मंत्र, सामगान और धार्मिक अनुष्ठानों में संवाद, अभिनय, संगीत और नृत्य के प्रारंभिक रूप दिखाई देते हैं। इस परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने का श्रेय भरतमुनि को जाता है, जिन्होंने नाट्य शास्त्र की रचना की। पाठकों को बताता चलूं कि यह ग्रंथ अभिनय (आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक), रंगमंच संरचना, संगीत, नृत्य और ‘रस सिद्धांत’ का विस्तृत विवेचन करता है।इसके बाद संस्कृत नाटकों का स्वर्णकाल आया, जिसमें कालिदास, भास और शूद्रक जैसे नाटककारों ने अभिज्ञानशाकुंतलम्, स्वप्नवासवदत्तम् और मृच्छकटिकम् जैसे महान नाटकों की रचना की। वास्तव में, इन रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, नीति और मानवीय भावनाओं का सुंदर चित्रण मिलता है।मध्यकाल में रंगमंच(थिएटर) लोकजीवन से जुड़ गया और रामलीला, रासलीला, नौटंकी, यक्षगान और जत्रा जैसे लोकनाट्य विकसित हुए। इसी समय कथकली, कुचिपुड़ी और भरतनाट्यम जैसी नृत्य-नाट्य परंपराएँ भी विकसित हुईं, जिनमें वेशभूषा, मुखाभिनय और मुद्राओं के माध्यम से कथा प्रस्तुत की जाती है।आधुनिक काल में, विशेषकर ब्रिटिश शासन के दौरान, पाश्चात्य रंगशैली का प्रभाव पड़ा। इस दौर में यथार्थवाद, सामाजिक आलोचना और प्रयोगधर्मिता बढ़ी। उल्लेखनीय है कि हबीब तनवीर, विजय तेंदुलकर और गिरीश कर्नाड जैसे रंगकर्मियों ने सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय मुद्दों को मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इस प्रकार भारतीय रंगमंच ने वैदिक परंपरा से लेकर आधुनिक प्रयोगधर्मी रूप तक लंबी यात्रा तय की है।

इस दिवस का मुख्य उद्देश्य रंगमंच और कलाकारों के महत्व को समझाना और बढ़ावा देना है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य क्रमशः रंगमंच कला के प्रति जागरूकता फैलाना, विभिन्न कलाकारों, लेखकों और तकनीकी कर्मियों के योगदान को सम्मान देना, सांस्कृतिक विविधता और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना तथा सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय मुद्दों पर संवाद स्थापित करना है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2025 की थीम-‘थिएटर और शांति की संस्कृति’ रखी गई थी।इसका अर्थ है कि थिएटर के माध्यम से शांति, सह-अस्तित्व और संवाद को बढ़ावा देना। इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में इसका मुख्य फोकस वैश्विक सहभागिता और सांस्कृतिक संवाद पर रहा है। यहां यह भी गौरतलब है कि वर्ष 2026 में विश्व रंगमंच दिवस का 64वाँ आयोजन 25-27 मार्च के बीच लक्जमबर्ग शहर में किया गया। यह आयोजन आइटीआइ के जनरल सेक्रेटेरिएट और लक्ज़मबर्ग सेंटर के सहयोग से थिएटर फेडरेशन के साथ आयोजित किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह कार्यक्रम मंच(प्रदर्शन)कला दिवस के अंतर्गत हुआ और थिएटर फेडरेशन की 30वीं वर्षगांठ भी इसी दौरान मनाई गई। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष का आधिकारिक संदेश प्रसिद्ध अमेरिकी अभिनेता विलेम डेफ़ो द्वारा लिखा गया, जिन्हें चार बार अकादमी अवार्ड्स के लिए नामांकन मिला है तथा वर्ष 2018 में वेनिस फ़िल्म महोत्सव में कोप्पा वोल्पी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

पाठकों को बताता चलूं कि आइटीआइ की स्थापना 1948 में हुई थी और इसका मुख्यालय पेरिस में स्थित है। इसके विश्वभर में 85 से अधिक केंद्र हैं। विश्व रंगमंच दिवस पर हर वर्ष एक प्रतिष्ठित कलाकार द्वारा संदेश दिया जाता है तथा वर्ष 1962 में पहला संदेश जीन कोक्टो ने दिया था। वर्ष 2002 में भारत के गिरीश कर्नाड को यह सम्मान मिला,जो महान नाटककार रहे हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह संदेश 50 से अधिक भाषाओं में अनुवादित किया जाता है।कहा जाता है कि महान् कवि/लेखक कालिदास ने ‘मेघदूत’ की रचना भारत की पहली नाट्यशाला में की थी, जो छत्तीसगढ़ के रामगढ़ पहाड़ (अंबिकापुर क्षेत्र) में स्थित मानी जाती है। हमारे पुराणों में भी यम, यमी और उर्वशी जैसे पात्रों के संवादों में नाट्य तत्वों के प्रारंभिक संकेत मिलते हैं।भारतीय रंगमंच में नृत्य और नाटक का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

आज रंगमंच का प्रभाव फिल्मों, वेब-सीरीज और डिजिटल माध्यमों में भी देखा जा सकता है। थिएटर ने कई सच्ची घटनाओं और सामाजिक मुद्दों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। भारत में फिल्मों का व्यापक प्रभाव है। पाठक जानते होंगे कि साल 1957 में मदर इंडिया, 1988 में सलाम बॉम्बे तथा  2001 में लगान जैसी फिल्मों को  प्रतिष्ठित ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया था।हालाँकि, ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक सिनेमा और थिएटर को चुनौती भी दी है, फिर भी रंगमंच अपनी जीवंतता और प्रत्यक्ष संवाद के कारण आज भी विशिष्ट स्थान रखता है।

अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि विश्व रंगमंच दिवस यह संदेश देता है कि रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण, संस्कृति का संवाहक और विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। नाट्य शास्त्र से लेकर आधुनिक प्रयोगधर्मी रंगमंच तक इसकी यात्रा निरंतर विकास की कहानी है। आज के डिजिटल व एआइ के इस युग में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है, क्योंकि यह मानवता, संवाद और संवेदनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। यह दिवस हमें प्रेरित करता है कि हम इस कला को संरक्षित करें, नई पीढ़ी तक पहुँचाएँ और इसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाएं।