गुरु के अतिरिक्त कोई ब्रह्म नहीं है, यह सत्य है

10 जुलाई 2025 को हम भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शास्त्रीय पर्व गुरू पूर्णिमा मनाने जा रहे हैं। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार गुरु और शिष्य के रिश्ते के पवित्र संबंध का प्रतीक माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस दिन शिष्य अपने गुरूओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। सनातन हिंदू धर्म में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान माना गया है, क्योंकि वे हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं।गुरु शब्द का अभिप्राय ही है-‘अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला।’ ‘गिरति अज्ञानान्धकार मइति गुरुः’ अर्थात् इसका मतलब यह है कि जो अपने सदुपदेशों के माध्यम से शिष्य के अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट कर देता है, वह गुरू है। अद्वयतारक उपनिषद (16) में गुरू का अर्थ बताया गया है। यहाँ ‘गु’ का अर्थ अंधकार है और ‘रु’ का अर्थ है दूर करने वाला। पाठकों को बताता चलूं कि रामचरित मानस के आरंभ में गोस्वामी तुलसीदास गुरु की वंदना करते हुए ‘वंदे बोधमयं नित्यं गुरु शंकर रूपिणम्’ कहकर आदि गुरु सदाशिव का स्थान दिया है। वास्तव में, शिव स्वयं बोध रूपरूप है, सृष्टि के सूत्र संचालक हैं। कहते हैं कि ‘गुरू बिना ब्रह्म नान्यन् सत्यं वरानने।’ तात्पर्य यह है कि गुरु के अतिरिक्त कोई ब्रह्म नहीं है, यह सत्य है, सत्य है। बहरहाल, कहना चाहूंगा कि गुरु पूर्णिमा का त्योहार भारत ही नहीं बल्कि नेपाल और भूटान में भी बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। ज्योतिष पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 10 जुलाई को रात 01 बजकर 37 मिनट पर होगी और अगले दिन यानी 11 जुलाई रात को 02 बजकर 07 मिनट पर तिथि खत्म होगी और इस प्रकार से 10 जुलाई को गुरू पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन शिष्य अपने गुरू के प्रति आभार प्रकट करते हैं और उनकी पूजा- अर्चना करते हैं।वहीं, कुछ लोग इस दिन गुरु दीक्षा भी लेते हैं। संस्कृत में ‘गुरु’ शब्द आध्यात्मिक शिक्षक या मार्गदर्शक को दर्शाता है, जबकि ‘पूर्णिमा’ पूर्णिमा(पूर्ण चंद्रमा) का प्रतीक है। वास्तव में गुरू पूर्णिमा का पर्व हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में  हमारे सभी शिक्षकों के सम्मान के लिए समर्पित दिन है-फिर चाहे वे आध्यात्मिक मार्गदर्शक हों या अकादमिक गुरू। यह कृतज्ञता, श्रद्धा, ज्ञान और बुद्धि के मूल्यों पर जोर देता है और उन्हें बढ़ावा देता है। पाठकों को बताता चलूं कि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन महर्षि वेद -व्यास जी का जन्म हुआ था, इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा(वेदव्यास जयंती) के नाम से भी जाना जाता है। पाठकों को बताता चलूं कि महर्षि वेद व्‍यास महाभारत, श्रीमद्भागवत समेत अट्ठारह पुराणों के रचयिता थे। पाठकों को बताता चलूं कि वेदव्यास जी ऋषि पराशर के पुत्र थे और शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास को तीनों कालों का ज्ञाता माना जाता है। गौरतलब है कि गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से सावन मास प्रारंभ हो जाता है, जिसका उत्तर भारत में बहुत महत्व है। कहते हैं कि यह वही दिन है जब भगवान गौतम बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया था। मान्यता है कि इसके बाद ही बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई थी। इसलिए गुरु पूर्णिमा को बौद्धों द्वारा गौतम बुद्ध के सम्मान में भी मनाया जाता है।इस दिन पीले वस्त्र पहनकर पूजा-अर्चना करने का भी विधान है। पाठकों को बताता चलूं कि ज्योतिष शास्त्र में पीले रंग को गुरु बृहस्पति का कारक माना जाता है तथा उनकी पूजा से ज्ञान, समृद्धि और भाग्य की प्राप्ति होती है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु को पीले रंग की चीजें जैसे कि पीले वस्त्र,पीले रंग की मिठाईयां, हल्दी,पीले फल(केला,आम), पीले पुष्प, कोई धार्मिक ग्रंथ या पुस्तक आदि भेंट करनी चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से गुरूओं का आशीर्वाद, सुख-समृद्धि, संपत्ति की प्राप्ति होती है। गुरू की महिमा कितनी है, इसका बखान कबीर दास जी ने क्या खूब किया है -‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।बलिहारी गुरु अपने, गोविंद दियो बताय।।’ इतना ही नहीं वे आगे एक दोहे में यह भी कहते हैं कि -‘गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।’ इसका तात्पर्य यह है कि गुरू के बिना ज्ञान का मिलना असंभव है।जब तक गुरु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तब तक कोई भी मनुष्य अज्ञान रूपी अधंकार में भटकता हुआ माया मोह के बंधनों में बंधा रहता है, उसे मोक्ष (मोष) नहीं मिलता। गुरु के बिना उसे सत्य और असत्य के भेद का पता नहीं चलता, उचित और अनुचित का ज्ञान नहीं होता। बौद्ध धर्म ही नहीं जैन धर्म में भी इस दिन का बहुत महत्व है।जैन धर्मावलंबी भगवान महावीर और उनके प्रमुख शिष्य गौतम स्वामी के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए गुरु पूर्णिमा मनाते हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जगत गुरु भगवान शिव ने इसी दिन से सप्तऋषियों को योग सिखाना शुरू किया था। कहते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने अध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचंद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए भी गुरु पूर्णिमा का दिन ही चुना था। इस दिन स्नान-दान का भी काफी महत्व माना जाता है। अंत में यही कहूंगा कि मानव जीवन बहुत अनमोल है और हमें मानव जीवन केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए मिला है। इसके लिए गुरु का होना बहुत जरूरी है। कबीर दास जी बड़े ही सुंदर शब्दों में यह कहते हैं कि-‘सात समंदर की मसि करूं, लेखनी करूं बनराय।धरती का कागज करुं, गुरु गुण लिख्या न जाये।।’ अतः आइए इस पावन गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हम सभी गुरूओं को नमन करें और अपने जीवन को धन्य बनाएं।

सुनील कुमार महला

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