विश्ववार्ता

बंगलादेश से रिश्ते सुधरने की जल्दी उम्मीद नहीं

राजेश कुमार पासी

जब से बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार बनने की खबर आई है, भारत में बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीद कुछ ज्यादा ही पैदा हो गई है। इसमें कोई शक नहीं है कि बांग्लादेश की नई सरकार यूनुस सरकार से बेहतर साबित होने वाली है क्योंकि वो बाहरी शक्तियों के इशारे पर चल रही थी। मोहम्मद यूनुस तो एक तरह से अमेरिका और चीन की गोद में बैठे हुए थे और पाकिस्तान के साथ प्यार की पींगे बढ़ा रहे थे। बीएनपी का इतिहास भारत के लिए अच्छा नहीं रहा है लेकिन आज समय बहुत बदल गया है। ये पुराना भारत नहीं है बल्कि एक बड़ी वैश्विक ताकत बन चुका है और बांग्लादेश का पड़ोसी है। भारत का विरोध करना बांग्लादेश के हित में नहीं है। पिछले 15-20 सालों में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बहुत आगे बढ़ चुके हैं, इसका बहुत बड़ा फायदा बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को मिला है।

तारिक रहमान का इतिहास भारत के लिए अच्छा नहीं रहा है लेकिन उम्मीद है कि वो वक्त के साथ बदल गए होंगे। ये बदलाव कितना बड़ा है, ये भी दोनों देशों के संबंधों को तय करेगा। तारिक ने लंबा वक्त विदेश में व्यतीत किया है. ये उनकी कमजोरी और ताकत दोनों ही हैं। इतने साल तक बांग्लादेश से बाहर रहने के कारण वो बंगलादेशी समाज से कट गए हैं. सवाल है कि क्या वो नए बांग्लादेश को समझते हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि विदेश में रहने के कारण उन्होंने एक नए आधुनिक बांग्लादेश की कल्पना जरूर की होगी । आधुनिक बांग्लादेश का सपना बिना भारत की मदद के पूरा करना बहुत मुश्किल होगा।   देखा जाए तो बांग्लादेश की राजनीति में जहां पहले बीएनपी खड़ी थी, वहां आज जमात-ए-इस्लामी खड़ी है और जहां अवामी लीग खड़ी थी, वहां आज बीएनपी खड़ी है। सवाल है कि क्या बीएनपी अपना कट्टरवादी इस्लामिक चेहरा बदल कर नई अवामी लीग बन सकती है। वैसे देखा जाए तो बांग्लादेश की जनता भी कट्टरपंथी सरकार नहीं चाहती, इसलिए उसने जमात को सत्ता से दूर कर दिया है।  प्रधानमंत्री मोदी ने नई सरकार की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है लेकिन यह पूरी सतर्कता के साथ किया गया है। शेख हसीना को  भारत ने शरण दी हुई है लेकिन लगता नहीं है कि नई सरकार उनको वापस भेजने की जिद्द करेगी। वैसे भी शेख हसीना का बांग्लादेश जाना नई सरकार के लिए मुसीबत भी बन सकता है। शेख हसीना का मामला दोनों देशों के संबंधों को खराब न करे तो बेहतर होगा।   

             शेख हसीना को सत्ता से हटाना हो या मोहम्मद यूनुस को सत्ता में बिठाना हो, दोनों ही काम अमेरिका द्वारा किये गए हैं। ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के चुनाव में भी अमेरिका के दबाव ने काम किया है क्योंकि मोहम्मद यूनुस चुनाव करवाने के इच्छुक नहीं थे। इस तरह से देखा जाए तो तारिक रहमान भी अमेरिका की मदद से ही सत्ता में पहुंचे हैं। मोहम्मद यूनुस ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाकर तारिक रहमान के लिए रास्ता साफ किया है।  जिन छात्रों ने शेख हसीना का तख्तापलट किया था, उन्हें सिर्फ 3 सीटें मिली है। इससे पता चलता है कि बांग्लादेश की जनता में उनका कितना समर्थन है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि छात्रों ने बांग्लादेश में तख्तापलट नहीं किया था क्योंकि उनकी हैसियत ही नहीं थी। ये काम अमेरिका ने अपने इको सिस्टम के जरिये उनको आगे रखकर करवाया है। मोहम्मद यूनुस का सत्ता से हटना भी कहीं न कहीं अमेरिका की चाल है। ऐसा लगता है कि मोहम्मद यूनुस अमेरिका की मदद नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। शेख हसीना का तख्तापलट अमेरिका ने इसलिए करवाया क्योंकि उन्होंने उसकी नाजायज मांग मानने से मना कर दिया था।

सवाल यह है कि अब अमेरिका की उन मांगो के सामने तारिक क्या रवैया अपनाते हैं। अगर तारिक रहमान अमेरिका का काम नहीं करते हैं तो क्या अमेरिका उनके  खिलाफ भी साजिश करना शुरू कर देगा।  सबसे बड़ा  सवाल यही है कि क्या तारिक अमेरिका और चीन के प्रभाव से खुद को बचा पाएंगे और पाकिस्तान को बांग्लादेश में दखल देने से रोक पाएंगे । इन सवालों में ही भारत का हित छुपा हुआ है। शेख हसीना ने अपनी कुर्सी गंवा दी लेकिन अमेरिका के आगे नहीं झुकी क्योंकि वो भारत के रणनीतिक हितों को नजरअंदाज नहीं कर पाई। अमेरिका बांग्लादेश में सैनिक अड्डा बनाना चाहता है, जिसके लिए वो तैयार नहीं हुई। क्या तारिक रहमान के शासन में इस काम को करने में अमेरिका कामयाब हो सकता है। अगर ऐसा हो गया तो भारत के साथ रिश्ते सुधरना मुश्किल हो जाएगा। 

             तारिक रहमान ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ के नारे के साथ सत्ता में आ रहे हैं और उनका कहना है कि देश को चलाने में इस्लाम की मुख्य भूमिका रहेगी। सवाल यह है कि ऐसे में भारत की मुख्य चिंता बंगलादेशी हिंदुओं का क्या होगा। बांग्लादेश फर्स्ट कोई परेशानी की बात नहीं है क्योंकि हर सरकार अपने देश के हित सबसे आगे रखती है। वैसे भी देखा जाए तो बांग्लादेश के हित भारत के साथ जुड़े हुए हैं। बांग्लादेश और भारत के रिश्तों में कड़वाहट दोनों देशों के लिए नुकसानदेह है। भारत की बड़ी चिंता वहां की हिन्दू आबादी की सुरक्षा  है। जमात की बढ़ती ताकत भारत को परेशान कर रही है। भारत की चिंता यह भी है कि कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी ने भारतीय सीमा से जुड़े इलाकों में बड़ी जीत दर्ज की है। इसमें महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उन्हें चुनाव में 31% मत हासिल हुए हैं। बेशक बीएनपी सत्ता में आ गई है लेकिन जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती ताकत भारत के लिए बड़ी चिंता है। सवाल यह है कि तारिक रहमान कट्टरपंथियों पर लगाम लगा पाएंगे, या फिर वो पहले की तरह ही दनदनाते हुए घूमेंगे।

मोहम्मद यूनुस ने कट्टपंथियों को खुली छूट दे दी थी जिसके कारण उनका प्रभाव बहुत बढ़ गया है. इसे रोकना तारिक के लिए आसान नहीं होगा। जिस तरह कुछ ही महीनों में पाकिस्तान की मदद से आतंकवादियों ने बांग्लादेश में अपनी पकड़ बना ली है, उसे कम करना तारिक के लिए आसान नहीं होगा। ये काम मुश्किल है लेकिन सवाल यह भी है कि क्या तारिक आतंकवादियों और कट्टरपंथियों को रोकना भी चाहते हैं या उन्हें भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहते हैं। इस सवाल में भारत और बंगलादेश के रिश्तों का रहस्य छुपा हुआ है। पिछले 18 महीनों में मोहम्मद यूनुस ने रिश्तों को इतना खराब कर दिया है कि बांग्लादेश की नई सरकार के लिए इन्हें सुधारना आसान नहीं होगा। इन 18 महीनों में यूनुस सरकार ने कई ऐसे काम कर दिए हैं जिन्हें पलटना आसान नहीं होगा।

               हमें उम्मीद करनी चाहिए कि दोनों देशों के संबंध सुधर जाएंगे लेकिन ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि ये पहले जैसे हो जाएंगे। मोहम्मद यूनुस ने दोनों देशों के रिश्तों में जो जहर घोला है, उसे ठीक करना तारिक के लिए बहुत मुश्किल होगा। दूसरी बात यह है कि बीएनपी और जमात पुराने सहयोगी हैं और अवामी लीग के शासन में दोनों मुख्य विपक्षी दल थे। बीएनपी को सत्ता इसलिए मिल गई है क्योंकि जनता के पास कोई दूसरा अच्छा विकल्प नहीं था। जमात को न चुनकर बीएनपी को चुनना, ये साबित करता है कि आज भी बंगलादेशी जनता कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ खड़ी है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में उसने बीएनपी को सरकार बनाने का मौका दिया। जमात की ताकत भी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि विपक्ष में जमात और छात्रों की नई पार्टी थी । छात्रों की पार्टी को जनता ने नकार दिया लेकिन जमात को मुख्य विपक्षी दल बना दिया। वास्तव में बीएनपी को मिले वोटों में बड़ा हिस्सा अवामी लीग के समर्थकों का है और जमात को मिले वोटों में बड़ा हिस्सा बीएनपी के समर्थकों का है।

 बेशक बांग्लादेश में चुनी हुई सरकार है, लेकिन उसे जनता की सरकार नहीं कहा जा सकता। अवामी लीग को चुनाव से बाहर करके किये गए चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सकते। भारत के लिए यही अच्छा है कि नई सरकार के साथ संबंधों को बेहतर करे लेकिन कदम सतर्कता से भरे हों। इस सरकार पर चीन और पाकिस्तान का प्रभाव बना रहेगा, ऐसे में जरूरी होगा कि अपने हितों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ा जाए। दोनों देशों के संबंधों में जल्दी सुधार की उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है। उम्मीद सिर्फ इतनी है कि अब रिश्ते और बिगड़ने वाले नहीं हैं. इसमें सुधार ही होगा। 

राजेश कुमार पासी