डा.वेदप्रकाश
विगत दिनों आया यूजीसी का समता संवर्धन विनियम गंभीर समीक्षा की मांग करता है क्योंकि जब से यह आया है, तभी से चिंता स्वरूप इसके विरोध और समर्थन का मुद्दा अब राजनीतिक रंग ले रहा है। देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों व अन्य स्थानों पर भी धरने- प्रदर्शन जारी हैं। विगत दिनों विनियम के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे वामपंथी संगठन के छात्रों ने सवाल पूछने पर महिला यूट्यूबर रुचि तिवारी को पीट दिया। हाल ही में जेएनयू में छात्रों के दो ग्रुपों में जमकर झगड़ा हुआ है। एक समाचार यह भी है कि मध्यप्रदेश की छात्रा सोनाली प्रजापति ने मंत्री विजय शाह से यह प्रश्न पूछा कि पढ़ाई में जातिगत भेदभाव क्यों किया जा रहा है? शिक्षा के लिए जातिगत नहीं, आर्थिक आधार पर सरकारी सुविधाएं दी जानी चाहिए क्योंकि हर वर्ग में लोग पिछड़े हैं। क्या उपर्युक्त दोनों समाचार गंभीर नहीं हैं?
ध्यातव्य है कि 13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु विनियम 2026 प्रकाशित किया। विनियम के उद्देश्य में लिखा है कि- धर्म, नस्ल, जाति, लिंग,जन्म स्थान या दिव्यंगता के आधार पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना है। विनियम के प्रकाशित होते ही इसके देशव्यापी विरोध के समाचार आने लगे। तदुपरांत कहीं-कहीं से समर्थन के समाचार भी आ रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने इस मामले में अभी यथास्थिति का आदेश जारी किया है। यहां प्रश्न यह है कि जब विनियम का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता की बात करता है तो क्या उपर्युक्त वर्णित वर्गों के अतिरिक्त सामान्य वर्ग के छात्र इस हितधारक श्रेणी में नहीं हैं?
ध्यान रहे शिक्षण संस्थान विद्या के मंदिर हैं जहां सभी विद्यार्थी एकता एवं समानता का पाठ पढ़ते हैं। क्या शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों को इस प्रकार के घोषित जाति आधारित वर्गीकरण में बांटना उचित है जबकि शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार की असमानता अथवा भेदभाव के उन्मूलन हेतु पहले से ही प्रावधान हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या सामान्य श्रेणी के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव नहीं होता? यदि होता है तो क्या उनके लिए भी अलग विनियम नहीं होने चाहिए? प्रस्तुत विनियम जिस प्रकार से विभिन्न शब्दों की परिभाषा देता है। समता के संवर्धन का कर्तव्य बताता है। समान अवसर केंद्रों का प्रविधान करता है। समता के संवर्धन हेतु उपाय, घटनाओं के मामले में प्रतिक्रिया, अपील, निगरानी एवं अनुपालन आदि की विस्तृत रूपरेखा बताता है। यह रूपरेखा शिक्षण संस्थानों की सभी के लिए समान की भावना को खंडित करेगी।
संविधान के भाग 3 में मूल अधिकार के अंतर्गत समता का अधिकार सभी के लिए धर्म,मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करता। क्या शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थी के साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव के संबंध में संविधान का यह प्रविधान लागू नहीं होता? यदि हां तो फिर अलग से यूजीसी का यह विनियम क्यों बनाया गया है? क्या यह विनियम इससे जुड़े अधिकारियों की मंशा पर सवाल नहीं उठा रहा है? यूजीसी का यह जिम्मा है कि वह देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु प्रयास करे। अधिकाधिक छात्रों को उच्च शिक्षा का अवसर मिले, इसके लिए प्रयास करे। छात्रों की संख्या के अनुपात में शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की संख्या सुनिश्चित करे। संविधान सम्मत विभिन्न आरक्षित वर्ग के छात्रों के कल्याण हेतु छात्रवृत्तियों आदि का प्रावधान सुनिश्चित करे। आज भी देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भिन्न-भिन्न रूपों में ढांचागत सुविधाओं का नितांत अभाव है। क्या यूजीसी को उस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का अध्याय 6 स्पष्ट करता है कि कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक लगातार नामांकन घट रहा है। नामांकन में यह गिरावट सामाजिक- आर्थिक रूप से वंचित समूहों में अधिक है। क्या आर्थिक रूप से वंचित समूह की श्रेणी में सामान्य जातियों के छात्र नहीं आते? इसी प्रकार नीति का अध्याय 14 उच्च शिक्षा में समता और समावेश शीर्षक से स्पष्ट करता है कि विद्यालयी शिक्षा और उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में समता, समानता और समावेश से जुड़ा दृष्टिकोण एक समान होना चाहिए। क्या यूजीसी द्वारा प्रकाशित यह विनियम सभी की समानता के विरुद्ध नहीं है? नीति में आगे लिखा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ बने सभी नियमों को शक्ति से लागू करना। क्या इस निर्देश के दायरे में अनुसूचित जाति, जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग आदि के छात्र नहीं आते? यदि आते हैं तो फिर यूजीसी का यह नया विनियम क्यों? ध्यातव्य है कि यूजीसी का यह नया विनियम एक प्रकार से संविधान सम्मत अधिकारों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों को कमजोर सिद्ध करते हुए वैमनस्य पैदा करने का प्रयास है। आज हमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जाति,भाषा अथवा क्षेत्रीयता आधारित भेदभाव भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रकृति नहीं है। यह व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के विकास में बाधक है।
भारतीय ज्ञान परंपरा,संत परंपरा और महापुरुषों का संदेश स्पष्ट है कि जाति के भेदभाव को मिटाकर ही मानवता के कल्याण का रास्ता बनाया जा सकता है। संघ प्रमुख मोहन भागवत लगातार समरस समाज हेतु जन जागरण कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लगातार सबका साथ, सबका विकास हेतु विभिन्न योजनाएं बनाकर पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए काम कर रहे हैं। फिर अचानक यूजीसी इस प्रकार के मतभेद खड़े करने वाला विनियम लेकर क्यों आया? क्या यूजीसी की यह तत्परता चिंताजनक नहीं है?
शिक्षण संस्थान वे केंद्र हैं जो समाज को मार्गदर्शन देते हैं। शिक्षण संस्थानों में विभिन्न रूपों में प्रवेश हेतु संविधान सम्मत आरक्षण के प्रविधान हैं। तदुपरांत शिक्षण संस्थानों में पहुंचा किसी भी जाति, संप्रदाय अथवा क्षेत्र का विद्यार्थी केवल विद्यार्थी माना जाए। वहां उसके साथ किसी भी प्रकार के भेदभाव अथवा शोषण के मामले को गंभीरता से हल किया जाना चाहिए। जाति की जकड़न से निकलकर ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का विकास संभव है। विकसित राष्ट्र के संकल्प हेतु समरसता की कड़ियां जोड़नी होंगी और जाति की कारा तोड़नी होगी। संविधान की उद्देशिका हम भारत के लोग का उद्घोष करती है। तो शिक्षण संस्थानों में भी किसी भी विद्यार्थी के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव न हो इस भाव को लेकर विनियम बनाए जाने चाहिए।
यूजीसी का यह विवादित विनियम गंभीर समीक्षा की मांग करता है। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। आशा की जा सकती है कि सुप्रीम कोर्ट शिक्षण संस्थानों के महत्व एवं गरिमा के अनुरूप इस विषय पर ऐसा ऐतिहासिक निर्णय देगा जिससे शिक्षण संस्थानों में किसी भी जाति अथवा वर्ग के विद्यार्थी के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो सके। वे भारत के नागरिक हैं, एक हैं इस भाव से शिक्षा ग्रहण करते हुए वे सर्वोच्च नागरिक बनें।
डा.वेदप्रकाश