राजेश कुमार पासी
अमेरिका-इजराइल और ईरान के युद्ध के कारण पूरी दुनिया ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। इस संकट का सामना वो सभी देश कर रहे हैं जहां तेल और गैस का उत्पादन नहीं होता है। हमारा देश तो 88% तेल आयात करता है. ऐसे में यह कैसे संभव है कि हम इस संकट से बच जाएं। भारत के पास लगभग दो महीनों के लिए तेल का सुरक्षित भंडार है, इसलिए अभी तेल की समस्या नहीं है। दूसरी बात यह है कि भारत ने तेल खरीद के लिए अपने विकल्प बढ़ा लिए हैं, इसलिए इस युद्ध का असर जल्दी होने वाला नहीं है। पहले भारत लगभग 23 देशों से तेल खरीदता था लेकिन अब 40 से ज्यादा देशों से तेल खरीद हो रही है। यही कारण है कि भारत में तेल को लेकर कोई समस्या नहीं है। अभी हम एलपीजी की कमी की समस्या का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उसकी भंडारण क्षमता भारत में बहुत कम है।
दूसरी बात यह है कि भारत की ज्यादातर गैस सप्लाई होमरुज स्ट्रेट के रास्ते से ही होती है। सरकार कुछ भी कहे, लेकिन गैस की कमी की समस्या से देश जूझ रहा है। मीडिया दिखा रहा है कि किस तरह लोग गैस सिलेंडर लेकर लाइन में खड़े हुए हैं लेकिन उन्हें गैस नहीं मिल रही है। गैस सिलेंडर की जमकर कालाबाज़ारी शुरू हो गई है। इस बाजार में घरेलू और व्यावसायिक सिलेंडर लगभग दुगुनी कीमत पर मिल रहे हैं। ये क्यों हो रहा है, जनता को इससे मतलब नहीं है. ये हो रहा है, वो इससे परेशान है। विपक्षी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं. इसमें कुछ गलत नहीं है। उन्हें इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका मिल गया है, वो इसे क्यों छोड़ेंगे । संसद भवन परिसर में इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने जमकर हंगामा किया है। इसके अलावा भी विपक्षी दल अन्य जगहों पर इस मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी सरकार के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। सरकार कह रही है कि ज्यादा समस्या नहीं है लेकिन इसे दूर करने की कोशिश की जा रही है। अब सरकार भी मान रही है कि बाजार में गैस की कमी हो गई है।
अगर देश में एलपीजी की कमी हो गई है तो विपक्ष को सरकार को घेरने का हक है। सवाल उठता है कि क्या इस कमी के लिए सरकार जिम्मेदार है। अगर इस समस्या के लिए सरकार जिम्मेदार होती तो विपक्ष का शोर मचाना जायज था लेकिन यह समस्या वैश्विक परिस्थितियों के कारण पैदा हुई है। देखा जाए तो पूरी दुनिया इस समस्या का सामना कर रही है। जिन देशों की गैस भंडारण क्षमता ज्यादा है, वो अभी इस समस्या से बचे हुए हैं। अब सवाल उठता है कि हमारे देश में एलपीजी का भंडारण इतना कम क्यों है, इस कमी के लिए सरकार को दोष क्यों न दिया जाए। देखा जाए तो इस कमी के लिए सरकार से सवाल पूछा जाना चाहिए। सवाल तो यह भी है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले क्या भंडारण क्षमता थी। वास्तव में मोदी सरकार के आने से पहले इससे कहीं ज्यादा बुरा हाल था। इस सरकार ने इस समस्या को खत्म करने की कोशिश की है लेकिन अभी पूरी सफलता इसमें नहीं मिली है।
दूसरी बात यह भी है कि इस सरकार के आने के बाद भारत में एलपीजी पर लोगों की निर्भरता बहुत बढ़ गई है। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो देश में लगभग 14 करोड़ एलपीजी कनेक्शन थे लेकिन अब ये बढ़कर 33 करोड़ हो गए हैं। लगभग 12 करोड़ एलपीजी कनेक्शन तो मोदी सरकार ने उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गरीबों को बांटे हैं । यही कारण है कि आज देश में 33 करोड़ गैस कनेक्शन हैं। जिन गरीबों के लिए एलपीजी गैस कनेक्शन लेना मुश्किल था, उन्हें इस सरकार ने मुफ्त में उपलब्ध करवाया है। आज सरकार की बड़ी उपलब्धि ही उसे भारी पड़ रही है। सवाल यह है कि क्या गरीबों को एलपीजी उपभोक्ता नहीं बनाया जाना चाहिए था, सरकार ने यह गलत किया है। वास्तव में ये सरकार की बड़ी सफलता है, इसे किसी भी प्रकार झुठलाया नहीं जा सकता। गरीबों का भी हक़ है कि उन्हें चूल्हे से आज़ादी मिले और वो एलपीजी जैसे सुरक्षित, सुगम और स्वास्थ्य अनुकूल ईंधन का इस्तेमाल कर सके। ऐसा नहीं है कि सरकार ने 33 करोड़ गैस उपभोक्ताओं के लिए गैस उपलब्ध नहीं करवाई. अभी तक इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। लोगों को घर बैठे, बिना किसी परेशानी के गैस सिलेंडर मिल रहे थे। अगर ईरान-इजराइल युद्ध नहीं होता, तो अभी भी कोई समस्या नहीं आने वाली थी। अब ये भी नहीं कहा जा सकता कि ये युद्ध भारत सरकार ने करवाया है। न तो इस सरकार ने इस युद्ध को शुरू करवाया है और न ही बंद करवा सकती है। देखा जाए तो इस समस्या के पैदा होने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
सवाल यह है कि क्या देश में एलपीजी की कमी आ गई है या ये कमी पैदा कर दी गई है। वास्तव में इस युद्ध के कारण लोगों में भय पैदा हो गया है, इसलिए लोग अपने खाली सिलेंडरों को भरकर रखने लगे हैं। सरकार का कहना है कि युद्ध से पहले देश में 50-55 लाख सिलेंडर प्रतिदिन की मांग थी लेकिन ये मांग अब बढ़कर 75 लाख से ऊपर हो गई है। देखा जाए तो एलपीजी सिलेंडर की मांग में लगभग 50% की बढ़ोतरी हो गई है। इससे साबित होता है कि एलपीजी की सप्लाई में कमी नहीं आयी है बल्कि अचानक इसकी मांग बढ़ गई है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ मांग बढ़ जाने से देश में गैस की कमी हो गई है। वास्तव में इसके अलावा भी इस कमी की कई और वजह हैं। गैस की कमी को देखते हुए इसकी कालाबाज़ारी और जमाखोरी शुरू हो गई है। जमाखोरी के कारण कृत्रिम कमी भी पैदा हो गई है । कई जगहों पर सरकार ने जमाखोरों के खिलाफ कार्यवाही की है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब भी किसी वस्तु की कमी की आशंका पैदा होती है तो उसकी जमाखोरी करने का पूरा तंत्र सक्रिय हो जाता है।
भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो इस मौके की तलाश में रहते हैं। कोरोना के समय भी ऐसे लोगों ने दवाईयों और मेडिकल उपकरणों की कृत्रिम कमी पैदा करके जबरदस्त मुनाफा कमाया था। पता नहीं क्यों सरकारें इन लोगों पर अंकुश नहीं लगा पाती हैं। देखा जाए तो इसके खिलाफ कार्यवाही करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है क्योंकि पुलिस उनके अधीन है। उत्तरप्रदेश में पुलिस इसके खिलाफ बड़ा अभियान चला रही है, ये दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। विपक्षी दलों की सरकारों को भी इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। सरकार ने रिफाइनरी चलाने वाली देश की सभी कंपनियों को निर्देश दिया है कि वो गैस का उत्पादन बढ़ा दें. इसका असर यह हुआ है कि गैस उत्पादन लगभग 30% बढ़ गया है। ईरान सरकार से बात करके होमरुज स्ट्रेट से गैस लाने की कोशिश की जा रही है और सरकार को इसमें बड़ी सफलता भी मिली है। देखा जाए तो सरकार कोशिश कर रही है कि समस्या का समाधान किया जाए। उम्मीद है कि आने वाले कुछ दिनों में ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा।
गैस की कमी है, चाहे वजह कुछ भी हो, लेकिन इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है। उसकी जिम्मेदारी इस कमी को पूरा करने की है और वो इस कोशिश में लगी हुई है। देखा जाए तो यह एक ऐसा संकट है जो अचानक पैदा हो गया है। विपक्ष इस मुद्दे पर राजनीति कर रहा है। सरकार को घेरने का मौका मिला है तो विपक्ष इस मौके का फायदा क्यों न उठाएं। सवाल उठता है कि विपक्ष की देश के प्रति भी कोई जिम्मेदारी है कि नहीं। यह ठीक है कि विपक्ष का काम समस्या का समाधान करना नहीं है, लेकिन समस्या को बढ़ाना भी विपक्ष का काम नहीं है। विपक्ष इस समस्या को बढ़चढ़ बता रहा है, जिससे जनता में भय पैदा हो रहा है। लोगों के भय का कालाबाज़ारी पूरा फायदा उठा रहे हैं।
इस युद्ध के कारण पूरी दुनिया ऊर्जा संकट का सामना कर रही है, इसलिए इस मुद्दे पर राजनीति करना ठीक नहीं है। सरकार जनता को समझा रही है कि गैस की कमी थोड़े दिनों में ठीक कर ली जाएगी, ताकि पैनिक में आकर लोग अनावश्यक रूप से सिलेंडरों की जमाखोरी न करें । विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए कि उसकी किसी गतिविधि से लोगों में डर पैदा न हो। संकटकाल में राजनीति नहीं की जाती, बल्कि संकट का सामना किया जाता है। अगर युद्ध लंबा चलता है तो देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इस युद्ध से देश और देश की सरकार का कोई लेना देना नहीं है। ये समय राजनीति करने का नहीं है बल्कि देश के साथ खड़े होने का है। देश के हालात कुछ और ही बता रहे हैं, विपक्ष इस संकट पर जमकर राजनीति कर रहा है। इससे बचने की कोशिश की जानी चाहिए।
राजेश कुमार पासी