प्रमोद दीक्षित मलय
“हम सब मिलकर एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर सकते हैं जो सभी के लिए समान अधिकारों और करुणा पर आधारित हो और एक मानव परिवार के रूप में शांति से रह सकें।” संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस यह कथन भारतीय मनीषा के बोधवाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अद्यतन व्याख्या ही है जिसमें एक शांत, सुखी, स्वस्थ, समृद्ध और तमाम भेद-भावों से मुक्त सुंदर दुनिया रचने की मार्मिक अपील समाहित है। सुंदर एवं समझ-बूझ भरी दुनिया बनाने का सपना केवल पारस्परिक बंधुत्व भाव से ही सम्भव है।समतामूलक ममतायुक्त दुनिया कि निर्मिति प्रेम-स्नेह, सहयोग एवं भाईचारे की सामूहिक सामाजिक चेतना से ही सम्भव है। इसी भावना से प्रेरित होकर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 दिसंबर, 2020 को एक प्रस्ताव पारित कर 4 फरवरी को सम्पूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय मानव बंधुत्व दिवस के रूप में मनाने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों, नागरिक संगठनों एवं आध्यात्मिक संस्थाओं को आमंत्रित किया, जिसका स्वागत विभिन्न देशों सहित सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक-आध्यात्मिक संस्थाओं द्वारा किया गया और 4 फरवरी, 2021 को पहली बार अंतरराष्ट्रीय मानव बंधुत्व दिवस मना कर मानवता के पक्ष में दुनिया में कहीं भी किसी भी मनुष्य के प्रति रंग, नस्ल, भाषा, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव न करने, मानवोचित गरिमामय व्यवहार करने तथा सहिष्णु समाज बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त किया।
यह संसार अत्यंत विशाल है। यहां विभिन्न संस्कृतियों को मानने-जीने वाला समुदाय युगों-युगों से निवास कर रहा है। इनमें परस्पर खान-पान एवं पहनावा, बोल-चाल एवं व्यवहार तथा आस्था, विश्वास एवं मान्यताओं में अंतर देखने को मिलता है। एक समुदाय के लिए उनके रीति-रिवाज एवं परम्परा अनुसार जो उचित, नैतिक एवं अनुकूल है, सम्भव है वह पद्धति दूसरे समुदाय के विश्वासों की धुरी पर अनैतिक, अनुचित एवं प्रतिकूल हो। ऐसी स्थिति में टकराव स्वाभाविक है, पर बेहतर समझ होने पर टकराव एवं द्वंद्व से बचते हुए और अपनी परम्पराओं का पालन करते हुए साथ-साथ न केवल रहा था सकता है बल्कि विकास के सामूहिक अवसर भी खोजे-बनाये जा सकते हैं। समुदायों की आस्था एवं विश्वास टकराव का हेतु न बनकर सामंजस्य एवं सौहार्द का सेतु बनें, यह बंधुत्व भाव के विकसित होने पर ही सम्भाव्य है। और इसके लिए आवश्यक है विवेकपूर्ण चिंतन-मनन और दूरदृष्टि, जो मानवता के फलक पर समभाव एवं सद्भाव के लिए सुंदर सुनहरे चित्र उकेर सके। सतत विकास और बौद्धिक प्रखरता के लिए मतभेद जरूरी हैं, किंतु हमारी असहमति किसी दूसरे पक्ष के जान-माल की हानि से संतुष्ट हो, यह बिलकुल निरर्थक एवं अव्यावहारिक है। असहमतियों से हमारे वैचारिक पृष्ठों पर उज्ज्वलता का आलोक बिखरना चाहिए, न कि अनिष्ट एवं अनय सोच के कलुष धब्बे। एक व्यक्ति एवं परिवार के रूप में प्रत्येक समुदाय एवं हममें से सभी सुखी, शांतिमय एवं समृद्ध होना चाहते हैं और यह तभी साकार हो सकेगा जब हम एक-दूसरे को सुखी-समुन्नत एवं प्रसन्न देखना चाहें। यह सहयोग, समन्वय, सहकार के सम्बल से किया जा सकता है, यही संस्कृति है। किंतु टकराव के रास्ते चलकर परस्पर लड़ते-झगड़ते और दूसरे को दुखी करके हम कभी अपना हित नहीं साधक सकते, यही विकृति है, अमानवीयता है। निर्णय हमें करना होगा कि हम किस पक्ष में खड़े होना चाहते हैं। निर्विवाद कहा जा सकता है, सभी मानवता के उद्यान में शीतल मलय बयार एवं सुगंधित सुमनों के सुरभित परिवेश में विचरण करना चाहते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानव बंधुत्व दिवस यही भाव विकसित करने के लिए लोक जागरण करते हुए विभिन्न समुदायों एवं जन-जन को शांतिपूर्वक एक साथ रहने, एक-दूसरे के अधिकारों एवं गरिमा की रक्षा करने एवं मानवीय व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
बंधुत्व भावना केवल अन्यान्य समुदायों के साथ ही नहीं अपितु प्रथमत: अपने परिवारी जन, पड़ोसी, सहकर्मियों एवं अपरिचितों के प्रति हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है। यह हमें सर्व समावेशी, सख्य, सहिष्णु एवं लचीला बनाता है, जिससे सांस्कृतिक विविधता की सहज स्वीकृति एवं अभिव्यक्ति का अनुकूल अवसर एवं जगह बनती है। यदि हम वैश्विक परिदृश्य देखें तो सर्वत्र हिंसा, अराजकता, आगजनी, युद्ध दृश्य दिखाई पड़ते हैं जो मानवता के लिए अभिशाप हैं। मुझे यूनेस्को का एक कथन स्मरण हो रहा है, “चूंकि युद्ध मनुष्य के मन में उत्पन्न होते हैं, इसलिए शांति की रक्षा भी मनुष्य के मन में ही निर्मित होनी चाहिए।” निश्चित रूप से युद्ध और शांति मानव मन रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। विश्व के समस्त प्राणियों में मानव ही सर्वाधिक बुद्धिमान है। पर जब वह विवेकहीन हो स्वार्थ केंद्रित हो जाती है तो अनीति की पक्षधर बन मानवता के सुकोमल सुमनों को कुचलने लगती है। और तब यह दम्भ, अहंकार, हिंसा, बलात कब्जा, स्व श्रेष्ठताबोध और संसाधनों पर अपने एकाधिकार करने का प्रदर्शन बन जाती है। अनेकानेक उदाहरण जागतिक फलक पर वर्तमान हैं। इनसे मुक्ति का मार्ग भारतीय दर्शन के सूत्र ‘सम्पूर्ण धरती एक परिवार’ पर आधारित मानवीय बंधुत्व भाव से हि निकलेगा।
अंतरराष्ट्रीय मानव बंधुत्व दिवस के आयोजन थीम आधारित होते हैं ताकि सम्बंधित विषय पर साझी समझ बनाई जा सके। वर्ष 2026 कि थीम ‘विभाजन की जगह संवाद’ वास्तव में मौन से मुखर होने की पैरवी करती है। किंतु यह मुखरता वाचालता एवं धर्मांधता के लिए नहीं है अपितु सामाजिक सहिष्णुता की वृद्धि, सद्भाव के प्रसार एवं सतत संवाद के रास्ते खोलेगी। संवाद से ही अहंकार की परिधि पर खड़ी दीवार दरकती है और विचारों की ताजी हवा के लिए एक खिड़की खुलती है। दीवार पर खुली एक खिड़की आत्मीयता, मधुरता एवं करुणा के कोमल झोंकों के आवागमन का रास्ता देती है और फिर ऐसी ही तमाम खिड़कियां दीवारों पर खुलने लगती हैं। विभाजन की जगह संवाद थीम अंतर्गत वैश्विक आयोजन कर स्वस्थ सुंदर सुभाषित दुनिया रचने-गुनने की ओर हम सभी बढ़ेंगे, ऐसा विश्वास है