विश्ववार्ता

भारत बांग्लादेश संबंध के नवीकरण का वक्त

लोकतंत्र की जीत के निहितार्थ 

डॉ घनश्याम बादल

बांग्लादेश के चीफ एडवाइजर के रूप में मोहम्मद यूनुस और कुछ खास कर पाए हों या नहीं लेकिन एक काम तो उन्होंने कर ही दिया है कि बांग्लादेश को राजनीतिक उहापोह की स्थिति से निकालकर स्पष्ट जनादेश दिलवा दिया है। 

  12 फरवरी को हुए चुनावों के नतीजे सामने हैं और बांग्लादेश की जनता ने परिपक्व तरीके से न केवल चुनाव में भारी संख्या में मतदान किया अपितु अपने देश को कट्टरपंथी राजनीतिक विचारधारा के हाथों में जाने से भी बचा लिया है।

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने स्वर्गीय खालिदा जिया और जियाउर रहमान के बेटे 60 वर्षीय  तारिक रहमान के नेतृत्व में 299 में से 213 सीट जीतकर वहां लगभग दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर लिया है जबकि उसके प्रतिद्वंद्वी जमात ए  इस्लामी को 74 सीट ही मिलीं हैं। आश्चर्यजनक रूप से छात्र आंदोलन के चेहरे बनाकर शेख हसीना को सत्ता से बाहर करने वाले नाहिद इस्लाम की पार्टी एनसीपी को केवल दो सीट ही मिल पाई हैं और इसकी मुख्य वजह यही दिखती है कि उनका जमात ए इस्लामी के साथ गठबंधन का रणनीतिक निर्णय ग़लत रहा। 

   बांग्लादेश का ताज़ा चुनाव कोई सामान्य सत्ता-परिवर्तन नहीं बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग के अंत और नए शक्ति-संतुलन की शुरुआत समझ जाना चाहिए । यह चुनाव केवल संसद की सीटों का गणित नहीं है बल्कि उस सामाजिक-राजनीतिक बेचैनी की परिणति है जो वर्षों से सड़कों, विश्वविद्यालयों, श्रमिक बस्तियों और सीमावर्ती इलाकों में सुलग रही थी।

   इस  जनादेश ने साफ संकेत दिया है कि देश अब पुराने ढर्रे की राजनीति से आगे निकलना चाहता है लेकिन यह रास्ता लोकतांत्रिक स्थिरता की ओर जाएगा या नए असंतुलन की ओर, यह अभी भी एक अनुत्तरित ज्वलंत सवाल है।

   आंकड़ों की बात करें तो तस्वीर साफ है। संसद में स्पष्ट बहुमत एक ही राजनीतिक धारा के पक्ष में गया है। कुल सीटों का बड़ा हिस्सा एक ही बीएनपी के खाते में गया, जबकि विपक्षी ताकतें सीमित, बिखरी हुई और वैचारिक रूप से खंडित दिखाई देती हैं। मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत ऊँचा रहा, जो यह संकेत देता है कि जनता ने चुनाव को महज़ औपचारिकता नहीं माना बल्कि उसे सत्ता-परिवर्तन का माध्यम समझा। 

  हालांकि यह भी सच है कि  अवामी लीग की अनुपस्थिति से चुनावी मुकाबला असंतुलित रहा लेकिन इसके बावजूद जनमत का संदेश दो-टूक है। पुरानी सत्ता संरचना से मोहभंग और नए विकल्प की तलाश।

   यह जनादेश मूलतः तीन  संदेश देता है। पहला, जनता सत्ता के केंद्रीकरण से ऊब चुकी थी। दूसरा, आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी और संस्थागत भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्सा निर्णायक रूप में वोट में बदला। तीसरा, राजनीति में नैरेटिव बदला है, अब सिर्फ ‘स्थिरता’ नहीं, बल्कि ‘न्याय और समान अवसर’ की भाषा असर कर रही है। यही कारण है कि यह चुनाव भावनात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक बदलाव का संकेत देता है।

   ऐसा नहीं लगता कि  तारिक  रहमान के नेतृत्व में आने वाली सरकार सहजता से शासन कर पाएगी शपथ लेने के साथ ही उनकी असली चुनौती शुरू होती है। नया नेतृत्व जितना शक्तिशाली जनादेश लेकर आया है, उतनी ही बड़ी उसकी ज़िम्मेदारी है। लोकतंत्र में बहुमत ताकत नहीं, उत्तरदायित्व होता है। यदि यह सरकार संस्थाओं को मजबूत करती है, विपक्षी आवाज़ों को सम्मान देती है और चुनावी जीत को ‘सहमति की राजनीति’ में बदलती है, तो बांग्लादेश एक नई लोकतांत्रिक स्थिरता की ओर बढ़ सकता है लेकिन यदि बहुमत ‘वर्चस्व’ में बदल गया, या फिर शेख हसीना की सरकार की तरह शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाने लगा तो वही चक्र दोहराया जाएगा, जिससे बांग्लादेश  बाहर निकला है।

 बांग्लादेश के राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मोर्चे की तस्वीर उतनी चमकदार नहीं है, जितनी राजनीतिक मंच से दिखाई जाती है। विकास दर के दावों के बावजूद ज़मीनी सच्चाई बेरोज़गारी, महँगाई, विदेशी मुद्रा दबाव और असमान विकास की है। शहरी केंद्रों में समृद्धि का भ्रम है, लेकिन ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक हाशियाकरण अब भी गहरा है। नया शासन अगर सिर्फ मैक्रो-इकोनॉमिक आँकड़ों में उलझा रहा और रोजगार-केंद्रित विकास मॉडल नहीं अपनाया, तो सामाजिक असंतोष जल्द ही राजनीतिक संकट में बदल सकता है।

 रही बात भारत-बांग्लादेश संबंधों की तो पिछले दशक में यह रिश्ता ‘रणनीतिक साझेदारी’ से ‘रणनीतिक निर्भरता’ की ओर बढ़ा था। ऊर्जा, ट्रांज़िट, व्यापार, सीमा-सुरक्षा के स्तर पर भारत की भूमिका निर्णायक रही लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही इस रिश्ते की भाषा बदलेगी। हो सकता है कि नया शासन भारत को सहयोगी तो माने, लेकिन एकमात्र रणनीतिक विकल्प नहीं। यह फर्क सूक्ष्म है पर निर्णायक। भारत अब ‘स्वाभाविक साथी’ रहेगा पर ‘विशेषाधिकार प्राप्त साझेदार’ की उसकी भूमिका बदलती दिखाई दे रही है।

  यह बदलाव सीधे दक्षिण एशिया की जियो-पॉलिटिक्स को प्रभावित करेगा। बांग्लादेश का झुकाव बहु-ध्रुवीय विदेश नीति की ओर होगा,जहाँ भारत, चीन, खाड़ी देश, दक्षिण-पूर्व एशिया सभी समानांतर विकल्प होंगे। इसका अर्थ है कि भारत का क्षेत्रीय वर्चस्व नैरेटिव कमजोर हो सकता है और प्रतिस्पर्धात्मक कूटनीति का युग शुरू होने जा रहा है। यह केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि भू-आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी होगी—बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, निवेश और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर।

   दक्षिण एशिया की राजनीति में इस चुनाव परिणाम का व्यापक असर पड़ेगा। नेपाल, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों में पहले से ही संतुलन-नीति चल रही है। अब बांग्लादेश का जुड़ना इस क्षेत्र को एक ऐसे मोड़ पर ले जाएगा, जहाँ भारत को नेतृत्व ‘स्वाभाविक’ नहीं, बल्कि ‘अर्जित’ करना होगा। यानी सहयोग विश्वास से बनेगा, दबाव से नहीं।

और अब सवाल कि ऐसे में भारत क्या करे?

भारत के लिए यह क्षण आत्ममंथन का है। पड़ोस-नीति को सुरक्षा-केंद्रित चश्मे से देखने का समय अब खत्म हो रहा है। भारत को बांग्लादेश को “रणनीतिक फ्रंटलाइन” नहीं, बल्कि “समान साझेदार” के रूप में देखना होगा। भारत को अब शेख हसीना के समय में उपजे व्यक्तिवाद के समर्थन की रणनीति के बजाय कूटनीति का लोकतंत्रीकरण कर, आगे बढ़कर संबंधों का नवीकरण करना होगा । शिक्षा, संस्कृति, युवा, मीडिया और नागरिक संवाद के स्तर पर निवेश बढ़ाना होगा। आर्थिक सहयोग का नया मॉडल,सिर्फ परियोजनाएँ नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार-केंद्रित निवेश बनाना होगा और भाषा में संयम लाना पड़ेगा । भारत एवं बांग्लादेश दोनों देशों की सरकारों को समझना होगा कि हर मुद्दे को सुरक्षा समस्या बनाना रिश्तों को खोखला करता है। बहु-पक्षीय मंचों पर सक्रियता बिम्सटेक, क्षेत्रीय व्यापार मंचों और समुद्री सहयोग ढाँचों में नेतृत्व संभालना है तो व्यावहारिक बना होगा और नई सरकार को समर्थन देते हुए शेख हसीना के मुद्दे को भी सुलझाना होगा।

दो-टूक सच यह है कि भारत यदि बांग्लादेश को “प्रभाव-क्षेत्र” की तरह देखेगा तो वह उसे धीरे-धीरे खो देगा। और यदि उसे “साझा भविष्य” का भागीदार मानेगा, तो यह रिश्ता और गहरा होगा।

बांग्लादेश के चुनाव ने एक नई कहानी की शुरुआत की है। यह कहानी लोकतंत्र की मजबूती की भी हो सकती है और नए असंतुलन की भी। फर्क सिर्फ इस बात से पड़ेगा कि सत्ता अपने बहुमत को कैसे समझती है, शक्ति के रूप में या जिम्मेदारी के रूप में। और भारत इस बदलाव को खतरे की तरह देखता है या अवसर की तरह।

इतिहास गवाह है—जो देश पड़ोस में लोकतंत्र को अवसर मानते हैं, वे स्थिर रहते हैं; जो उसे ख़तरा मानते हैं, वे अस्थिर होते हैं। बांग्लादेश ने अपना रास्ता चुन लिया है। अब भारत की बारी है कि वह अपनी राह चुने और एक-एक कर उसे दूर होते पड़ोसियों को चीन या पाकिस्तान की गोद में बैठने से बचाए।

डॉ घनश्याम बादल