राजेश कुमार पासी
वर्तमान हालात बच्चों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हैं. हमारे लिए इसे समझना बेहद मुश्किल है। आज से 30-40 साल पहले बच्चे का अच्छे नंबर लेकर पास होना उसके उज्ज्वल भविष्य की गारंटी माना जाता था । अब ऐसा नहीं रहा है. जब शत-प्रतिशत अंक आने लगे हैं तो 90 प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र भी फेल मान लिए जाते हैं। देखा जाए तो जरूरी नहीं है कि शत-प्रतिशत अंक लाने वाला छात्र 80-90 प्रतिशत अंक वाले छात्र से बेहतर हो। किसी भी छात्र के अंक उसकी मेहनत या मेधा के प्रतीक नहीं होते, उसके स्वभाव के प्रतीक भी हो सकते हैं। आजकल बच्चों पर मां-बाप का ज्यादा से ज्यादा अंक लाने का दबाव होता है। स्कूली शिक्षा खत्म होने के बाद उन्हें इंजीनियर और डॉक्टर बनाने का दबाव भी मां-बाप का होता है। आजकल मां-बाप बच्चों से पूछने लगे हैं कि वो क्या करना चाहता है. फिर उसके अनुसार ही उसे आगे बढ़ने का मौका देते हैं।
सच यह है कि ज्यादातर अभिभावक बच्चों के भविष्य का फैसला खुद करना चाहते हैं। उनकी शिक्षा, करियर और विवाह तक सारे फैसले खुद लेना चाहते हैं और अपने फैसलों को बच्चों पर थोपना अपना अधिकार समझते हैं। उनका कहना होता है कि हम मां-बाप हैं. बच्चों का बुरा नहीं चाहते हैं. हम चाहते हैं कि बच्चे अच्छा जीवन जियें, इसलिए उनका मार्गदर्शन करते हैं। बच्चों का मार्गदर्शन करना हर माता-पिता का अधिकार और कर्तव्य है लेकिन इसकी एक सीमा है। आजकल बच्चे अच्छी शिक्षा के बावजूद मनपसंद रोजगार हासिल नहीं कर पा रहे हैं। जब उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिलती तो वो विवाह से भागने लगते हैं। बुरी संगत में पड़कर व्यसनों का शिकार बन जाते हैं। ऐसे हालातों में उनके परिजनों के लिए उनको समझना मुश्किल हो जाता है। इन बच्चों का धीरे-धीरे व्यवहार बदलने लगता है। हम बच्चों को यह दोष देने लगते हैं कि ये बदल गया है लेकिन जानने की कोशिश नहीं करते कि क्यों ऐसा हो रहा है। बच्चों के बदलते व्यवहार को समझे बिना, उनके ऊपर तरह-तरह से दबाव बनाया जाने लगता है। इस खींचतानी का कई बार बड़ा बुरा परिणाम निकलता है। कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जिनमें पूरा परिवार बर्बाद हो जाता है।
लखनऊ में रिश्तों को शर्मसार करने की एक सनसनीखेज घटना सामने आई है। एक 21 वर्षीय बेटे ने अपने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। विडम्बना यह है कि ये हत्या उसने अचानक आवेश में आकर नहीं की है बल्कि सोच-समझकर इस घिनौनी घटना को अंजाम दिया है । उसने इसके लिए पूरी योजना बनाई, फिर हत्या की और उसके बाद उसने पिता के शव के टुकड़े-टुकड़े करके जंगल में फेंक दिये। इसके अलावा उसने पिता के शव का एक हिस्सा घर में नीले ड्रम में छुपा दिया। वो ये हत्या करने के बाद सामान्य बना रहा और खुद थाने जाकर पिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस जांच में चौंकाने वाला सच सामने आया है. आरोपी के पिता मानवेन्द्र सिंह एक पैथोलॉजी लैब के मालिक थे. इसके अलावा भी उनके दूसरे व्यवसाय थे। वो अपने बेटे और बेटी के साथ रहते थे, उनकी पत्नी का नौ साल पहले निधन हो चुका था। पिता चाहते थे कि बेटा नीट क्लियर करके डॉक्टर बन जाये लेकिन बेटा डॉक्टर नहीं बनना चाहता था। उसने कई बार पिता को मना किया था, लेकिन पिता उस पर डॉक्टर बनने के लिए लगातार दबाव बना रहे थे। उसने पिता के दबाव से परेशान होकर इस हत्याकांड को अंजाम दिया।
एक दूसरी ऐसी ही शर्मनाक घटना मुज्जफरनगर में सामने आई है। इसमें दो बहनों ने अपने पिता की रोक-टोक से परेशान होकर उसकी नृशंस हत्या कर दी। उन्होंने परिवार के सदस्यों को नींद की गोलियां देकर सुला दिया और इसके बाद पिता को चाकू से गोदकर मार दिया। बड़ी बहन की उम्र 32 साल है और छोटी बहन 16 साल की है, दोनों बहनों ने पूरी योजना बनाकर इस हत्याकांड को अंजाम दिया है। ये हत्या भी अचानक आवेश में आकर की गई हत्या नहीं है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से की गई हत्या है। दोनों बहनों का पहला गुस्सा तो इस बात को लेकर था कि उनके साथ बेटी होने के कारण भेदभाव किया जाता है। बेटियों के साथ भेदभाव हमारे समाज के लिए बहुत ही सामान्य बात है लेकिन दोनों बहनें इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। इसके अलावा पिता बड़ी बेटी के अविवाहित होने पर ताना मारते थे। उनको कुँवारी बेटी का घर बैठना बर्दाश्त नहीं हो रहा था। ये पता नहीं है कि बेटी का विवाह क्यों नहीं हो रहा था लेकिन इसके लिए वो अकेली दोषी नहीं होगी। हो सकता है कि कुछ परिस्थितियों के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा हो। एक तो विवाह नहीं हो रहा था, उस पर पिता के तानों ने उनको गुस्से से भर दिया और उसने अपने पिता का ही कत्ल कर दिया। इसके अलावा कितनी ही घटनाएं सामने आ रही हैं जिसमें बच्चे अपने ही परिजनों की हत्या कर रहे हैं। बच्चे सिर्फ दूसरों की हत्या ही नहीं कर रहे हैं बल्कि आत्महत्या भी कर रहे हैं।
बेटे और बेटियों ने अपने पिता को इतनी क्रूरता से क्यों और कैसे मारा, ये एक अलग मुद्दा है। मेरा मुद्दा यह है कि ऐसे हालात क्यों और कैसे पैदा हो गए कि वो अपने ही पिता के हत्यारे बन गए। अगर ये बच्चे आत्महत्या कर लेते तो क्या घटना इतनी ही गंभीर नहीं होती। बच्चों ने हत्या की या आत्महत्या, दोनों ही घटनाएं चिंता पैदा करने वाली हैं। सवाल यह है कि हम अपने बच्चों के लिए सारे फैसले लेना इतना सामान्य क्यों समझते हैं। उनको समझने की कोशिश क्यों नहीं करते हैं। बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बनेगा, ये हम कैसे तय कर सकते हैं। बच्चे की शादी नहीं हो पा रही है तो क्या हम उसे ताने देना शुरु कर दे। उनके जीवन को पूरी तरह से नियंत्रित करने की कोशिश हम क्यों करते हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हर मां-बाप अपने बच्चे का भला चाहते हैं लेकिन सब कुछ वो तय नहीं कर सकते।
बच्चों की समझ और विचार को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए, चाहे वो कितने भी छोटे या बड़े क्यों न हों। जब मेरा बेटा पांचवी कक्षा में पढ़ता था तो मैंने उसका स्कूल बदलवा दिया। वास्तव में दूसरा स्कूल कई मामलों से पुराने स्कूल से बेहतर था, मेरी नजर में मेरा फैसला बहुत सही था जो उसके बेहतर भविष्य के लिए था। मेरा बेटा एक माह तक नए स्कूल में गया और धीरे-धीरे उसका स्वभाव बिल्कुल बदल गया। उसने खेलना कम कर दिया, कम बोलने लगा और चुप-चुप रहने लगा। मैं जब उसे स्कूल के गेट पर छोड़कर आता तो वो मेरी आँखों से ओझल होने से पहले मुझे मुड़-मुड़ कर देखता था। उसके चेहरे पर एक स्थायी उदासी घर कर गयी थी। मैं और मेरी पत्नी उसके बदलते स्वभाव से परेशान हो गए। एक दिन हमने प्यार से बैठाकर शांति से पूछा कि बेटा नया स्कूल कैसा है। उसने बताया कि उसका स्कूल में दिल नहीं लगता. उसे स्कूल पसंद नहीं है, कोई उससे दोस्ती नहीं कर रहा। हमें अहसास हो गया कि सात साल तक पुराने स्कूल में रहने का आदी हो गया है, इसलिए उसका दिल नहीं लग रहा है। तब हमने उसे वापस पुराने स्कूल भेजने का फैसला किया जबकि इसका मुझे बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ। हो सकता है कि कुछ लोगों ने मजाक भी उड़ाया हो, लेकिन बच्चे की उदासी और बदलते व्यवहार के कारण हमने उसे पुराने स्कूल में भेज दिया । जब मैं उसके पुराने स्कूल में दाखिल करके आया तो उसकी पूरी क्लास में उसके वापस आने की खुशी मनाई गई। कुछ दिन में ही मुझे लगा कि मेरा बेटा कहीं खो गया था, जो अब वापस मिल गया है। आज उसी स्कूल से पढ़कर निकला मेरा बेटा एक सरकारी बीमा कंपनी में क्लास वन अधिकारी के तौर पर कार्यरत है ।
मैं हमेशा इस पक्ष में रहा हूँ कि बच्चों पर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए. इस चक्कर में कई जानकारों से नाराजगी मोल ले चुका हूं। मेरा मानना रहा है कि बच्चों को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उनके साथ संवाद बना रहना चाहिए। बीटेक करने के बाद मेरे बेटे को एक बड़ी कंपनी में एक अच्छा पैकेज मिला लेकिन उसने कहा कि मुझे यह नौकरी नहीं करनी । उसने मुझसे पूछा तो मैंने उसे सिर्फ इतना कहा कि अगर सरकारी नौकरी नहीं मिली तो इतना अच्छा पैकेज दोबारा नहीं मिलेगा. बहुत नीचे से शुरू करना होगा. तुम्हारी मर्जी है कि ये नौकरी करनी है या नहीं। हम वास्तव में सोचते हैं कि हमसे ज्यादा बच्चों के लिए बेहतर कोई नहीं सोच सकता। सच यह है कि बच्चे ज्यादा जानते हैं कि उनके लिए क्या बेहतर है। आप उनका एक हद तक मार्गदर्शन कर सकते हैं । एक हद के बाद उन्हें लगता है कि उनको नियंत्रित किया जा रहा है। हम कई बार बच्चों को अपने सपने पूरा करने का साधन मान लेते हैं, हम जो नहीं कर पाए, चाहते हैं कि वो करे।
हर बच्चे की एक क्षमता और योग्यता है, उसे उसके अनुसार काम करने दे। जबरदस्ती किसी को सफलता नहीं दिलाई जा सकती, जब तक वो खुद न चाहे। बच्चों को उनका काम करने में मदद करें, वो जो भी करना चाहते हैं, उन्हें करने का मौका दे। आज जब गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है, तब हर बच्चे से बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। आपके बस में जितना है, उनका साथ दे, लेकिन जब वो अकेले चलना चाहे तो चलने का मौका दे। समाज की बातों में आकर अपने बच्चों पर दबाव नहीं बनाना चाहिए। कभी शिक्षा के लिए, कभी नौकरी के लिए, कभी विवाह के लिए और कभी बच्चों के लिए पूछकर समाज के लोग परेशान करते हैं, लेकिन आपको अपने हालातों के अनुसार चलना चाहिए। किसी को दिखाने के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। आप कुछ मदद कर सकते हैं तो ठीक है, बेमतलब बच्चों की शिक्षा, नौकरी और विवाह के लिए परेशान नहीं होना चाहिए। ताने देना तो बहुत ही गलत है, इसका अंजाम हमेशा बुरा निकलता है।
राजेश कुमार पासी