राजेश कुमार पासी
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता हो गया है हालांकि अभी उस पर हस्ताक्षर नहीं किये गए हैं। जो लोग आरोप लगा रहे थे कि मोदी के कारण दोनों देशों के बीच समझौता नहीं हो पा रहा है और हमारे देश पर अमेरिका ने 50% टैरिफ लगाया हुआ है, वही लोग अब कह रहे हैं कि मोदी झुक गए हैं और देशहित से समझौता कर लिया है। देश के किसान और छोटे व्यापारी इस समझौते से बर्बाद हो जाएंगे। इस समझौते की अहमियत कम करने के लिए कहा जा रहा है कि अमेरिका ने टैरिफ को 25% से घटाकर 18% कर दिया है जबकि सच्चाई यह है कि भारत पर टैरिफ 50% से घटकर 18% हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया में कहा है कि भारत ने रूस से तेल खरीदने से मना कर दिया है जबकि भारत सरकार ने ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया है। अजीब बात है कि जो विपक्ष पिछले 6 महीनों से लगातार कह रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप से डरकर मोदी सरकार ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, वही विपक्ष अब कह रहा है कि अमेरिका के दबाव में अब भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। सवाल यह है कि अगर 6 महीने पहले ही भारत ने तेल खरीदना बंद कर दिया था तो अब कैसे दोबारा यही काम होगा ।
भारत में विपक्ष और उसका समर्थक वर्ग झूठ बोलने का इतना आदी हो गया है कि उसे पता नहीं चलता कि उसने कल क्या बोला था। अगर अमेरिका से व्यापार समझौता नहीं हो रहा था तो उसके लिए मोदी सरकार जिम्मेदार है और अब हो गया है तो मोदी सरकार को श्रेय देने की जगह कठघरे में खड़ा किया जा रहा है । राहुल गांधी बोल रहे हैं कि मोदी ने भारत को बेच दिया है जबकि सच्चाई यह है कि ये बात वो पिछले 11 साल से लगातार बोल रहे हैं। अगर इस समझौते से भारत को बेचा गया है तो अभी तक भारत नहीं बिका था। एक चीज़ बार-बार तो नहीं बिक सकती। अगर भारत आज बिका है तो पहले नहीं बिका था। राहुल गांधी को जवाब देना चाहिए कि वो 11 साल से किसके बिकने का शोर मचा रहे थे। क्या व्यापार समझौता करके कोई देश बिक सकता है, अजीब बात कही जा रही है। अमेरिका से समझौता नहीं होने से अगर भारत का नुकसान हो रहा था तो समझौता होने से क्यों नुकसान होगा।
विपक्ष को पता ही नहीं है कि वो चाहता क्या है। उसे हर हाल में सरकार का विरोध करना है और हर काम के लिए उसकी आलोचना करनी है। जीत को भी हार बताना है, ताकि सरकार को किसी भी तरह का श्रेय न मिले। विपक्ष का कहना था कि अगर समझौता नहीं हुआ तो भारत में बेरोजगारी पैदा होगी, देश को आर्थिक नुकसान होगा । जब समझौता हो गया है तो फिर कहा जा रहा है कि इससे देश बर्बाद हो जाएगा। विपक्ष तय नहीं कर पा रहा है कि समझौता होने से देश बर्बाद होगा या नहीं होने से होगा। वास्तव में विपक्ष को हर समय देश की बर्बादी दिखाई देती है, उसकी कोई वजह होने की जरूरत नहीं है। उसे लगता है कि मोदी सरकार देश बर्बाद करने ही आई है, इसलिए उसका हर कदम देश को बर्बादी की ओर ले जा रहा है। देश की जनता ने मोदी को तीसरी बार सत्ता में पहुंचाया है, इसका मतलब है कि जनता देश की बर्बादी चाहती है। मुझे लगता है कि विपक्ष को अपनी सोच पर विचार करने की जरूरत है ।
विपक्ष का कहना है कि मोदी सरकार डोनाल्ड ट्रंप के सामने झुक गयी है, इसलिए समझौता हो गया है। इसका मतलब है कि मोदी सरकार अभी तक ट्रंप के सामने नहीं झुकी थी, इसलिए समझौता नहीं हो रहा था। क्या विपक्ष चाहता था कि मोदी सरकार ट्रंप के सामने झुक जाए और व्यापार समझौता कर ले। अगर ऐसा नहीं था तो विपक्ष व्यापार समझौता करने का दबाव क्यों बना रहा था। वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर टैरिफ लगाए जाने के बाद से मोदी सरकार झुकने की जगह उसका विकल्प तलाश रही थी। सरकार को अच्छी तरह पता था कि टैरिफ के कारण देश को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा लेकिन अमेरिका के आगे झुककर समझौता करना ज्यादा घातक साबित होता, इसलिए सरकार दूसरे रास्ते तलाश रही थी। मोदी सरकार अमेरिकी निर्यात में संभावित कमी को पूरा करने के लिए दूसरे देशों में संभावनाएं तलाश रही थी। इसके लिए चीन और रूस के साथ भी वार्ता की गई थी। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, ओमान, यूएई और यूरोपियन यूनियन के साथ एफटीए किया गया।
विशेष रूप से यूरोपियन यूनियन से समझौता होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप भारी दबाव में आ गए हैं, इसलिए उन्हें समझौता करने के लिए विवश होना पड़ा है। उन्हें अहसास हो गया है कि भारत उनके अनुचित दबाव में आकर समझौता करने वाला नहीं है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता प्रधानमंत्री मोदी की इस साल की दूसरी बड़ी उपलब्धि है. उनकी पहली बड़ी उपलब्धि यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौता है। इन दोनों समझौतों के बाद भारत के लिए पूरी दुनिया के रास्ते खुल गए हैं। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता इसलिए भी बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इससे पहले भारत अमेरिका के साथ एक तरह से व्यापार युद्ध में उलझा हुआ था। विश्व की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है। उसकी जनसंख्या बेशक 32 करोड़ है लेकिन उसकी क्रय शक्ति बहुत ज्यादा है, इसलिए उस बाजार से बाहर होना भारत के लिए बहुत नुकसानदेह है। भारत इस नुकसान को जानता है लेकिन अपने हितों से समझौता नहीं कर सकता, इसलिए मामला लटका हुआ था।
विपक्ष को लगता है कि मोदी झुक गए हैं, इसलिए यह समझौता हो गया है। अगर मोदी को झुकना होता तो वो तब ही झुक जाते, जब ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ ठोक दिया था। ट्रंप ने सिर्फ भारत पर टैरिफ नहीं लगाया था. उन्होंने एक सिरे से कई देशों पर टैरिफ ठोक दिया था । टैरिफ से बचने के लिए कई देशों ने अमेरिका की शर्तों पर उसके साथ व्यापार समझौता कर लिया था, लेकिन भारत ने अमेरिकी शर्तों के सामने झुकने से मना कर दिया था। सवाल यह है कि जब भारत अमेरिकी टैरिफ से बचने के सारे उपाय कर चुका है तो अब उसे झुकने की क्या जरूरत थी। वास्तव में हालात बदल गए हैं, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का अमेरिका में ही विरोध हो रहा है। अमेरिकी जनता में ट्रंप के प्रति नाराजगी बढ़ रही है कि उनकी नीतियों के कारण भारत जैसा देश अमेरिका से दूर हो रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप अब ज्यादा देर तक इस समझौते को रोकना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस समझौते की घोषणा कर दी। वास्तव में भारत ने अपनी तरफ से डील फाइनल कर दी थी लेकिन ट्रंप अड़े हुए थे, इसलिए मामला लटका हुआ था। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बयान दिया था कि हमने अपनी तरफ से अमेरिका को अंतिम प्रस्ताव दे दिया है, अब उन्हें फैसला करना है। जैसा पीयूष गोयल ने कहा था कि गेंद पूरी तरह से अमेरिका के पाले में थी, उसने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और समझौते का ऐलान कर दिया। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि समझौते का ऐलान ट्रंप द्वारा क्यों किया गया है, ये ऐलान दोनों देशों की तरफ से होना चाहिए था। सच तो यह है कि अभी समझौता हुआ नहीं है, सिर्फ ऐलान हुआ है। ट्रंप ने भारतीय प्रस्ताव को मान लिया है, इसलिए समझौते का ऐलान कर दिया है। वैसे भी टैरिफ भारत ने नहीं बल्कि अमेरिका ने लगाए थे, इसलिए उनको हटाने का ऐलान अमेरिका को ही करना था।
अभी समझौते की पूरी जानकारी सामने नहीं आयी है, लेकिन विपक्ष ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। रूस से तेल खरीद बंद करने का विरोध किया जा रहा है जबकि भारत रूस के तेल का विकल्प मिले बिना ये खरीद बंद नहीं कर सकता। भारत रूस से तेल मित्रता निभाने के लिए नहीं बल्कि सस्ता होने की वजह से खरीद रहा है। अगर भारत को कहीं और से सस्ता तेल मिलता है तो भारत उसे खरीद लेगा। भारत की तेल के बारे में स्पष्ट नीति है कि जहां से भी सस्ता तेल मिलेगा, हम खरीदेंगे। अगर भारत को वेनेजुएला से सस्ता तेल मिलेगा तो भारत खरीदेगा । वैसे भी भारत अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले वेनेजुएला से तेल खरीद रहा था। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने जा रहा है। सवाल यह है कि जो भारत अभी तक सालाना 45 अरब डॉलर का अमेरिकी आयात कर रहा है, वो अचानक 500 अरब डॉलर का कैसे आयात कर लेगा। वास्तव में ट्रंप चाहते हैं कि 2030 तक भारत और अमेरिका के बीच व्यापार 500 अरब डॉलर का हो जाये। विपक्ष इस समझौते से भारत के कृषि और दुग्ध उद्योग को नुकसान होने की आशंका जता रहा है जबकि अभी तक समझौते की पूरी जानकारी बाहर नहीं आयी है। जब तक समझौते की पूरी जानकारी बाहर नहीं आती है, तब तक विपक्ष को सरकार पर भरोसा करना चाहिए कि उसने किसानों के हितों का ध्यान रखा होगा।
ट्रंप के बड़बोलेपन को हमारा विपक्ष कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लेता है। डोनाल्ड ट्रंप की आदत है कि वो अपनी जनता को अपनी उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ाकर बताते हैं और हमारा विपक्ष उसे और बड़ा कर देता है । अमेरिकी कंपनियां भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था से दूर नहीं होना चाहती, इसलिए उनका भी ट्रंप पर दबाव है। अमेरिका और भारत स्वाभाविक रूप से सहयोगी देश है, इनके बीच समझौता दोनों के लिए लाभदायक है। व्यापार समझौता लेनदेन पर आधारित होता है, अगर भारत को कुछ फायदा लेना है तो उसे अमेरिकी हितों का भी ध्यान रखना होगा। अमेरिका से व्यापारिक समझौता प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की बड़ी जीत है, इसे विपक्ष किसी भी तरह छोटा नहीं कर सकता। इस जीत को हार बताने की कोशिश करने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि देश की जनता बहुत समझदार है ।
राजेश कुमार पासी