विश्ववार्ता

ईरान की खाड़ी में फंसी ट्रंप की गाड़ी

ओंकारेश्वर पांडेय

रूस और चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हनहनाती गाड़ी को ईरान की खाड़ी में फंसा दिया है ताकि अमेरिका की दादागिरी खत्म हो और उसकी सेना यूक्रेन और ताइवान से हटे। अमेरिका चाहता तो है कि ईरान कमजोर हो और इजराइल सुरक्षित रहे लेकिन रूस-चीन के साथ ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी बेल्ट’ पहनकर ईरान ने अमेरिका के सामने कड़ी चुनौती पेश कर दी है। इस बीच, तटस्थ रहकर भी भारत समेत दुनिया के अनेक देशों की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और करोड़ों लोगों की जान दांव पर लगी है।

19 फरवरी को दी गयी ट्रंप की 10-15 दिनों की समयसीमा घड़ी की टिक-टिक की तरह है। ईरान समझौते का नया मसौदा तैयार कर रहा है। अमेरिका को मंजूर नहीं हुआ तो होर्मुज की लहरें जल्द ही खून से लाल हो सकती हैं।

महज बारह दिन पहले तक दुबई एयरपोर्ट पर भारत से आने वाली उड़ानों का इंतजार कर रहे यात्री सिर्फ अपनी फ्लाइट की देरी से परेशान थे। आज वही देरी जानलेवा साबित हो सकती है। ईरान द्वारा एयरलाइंस को दी गई चेतावनी—कि वे दक्षिणी क्षेत्र और ओमान की खाड़ी में रॉकेट लॉन्च से बचें—महज एक तकनीकी सूचना नहीं है। यह उस भू-राजनीतिक विस्फोटक का धुआं है, जिसके जल्द भड़कने का डर पूरी दुनिया को सता रहा है।

⚓️ युद्धाभ्यास से युद्ध तक: तीन देशों का गठबंधन

यह पूरा संकट किसी अचानक हादसे का नतीजा नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही रणनीतिक शतरंज की अगली चाल है। 16 फरवरी 2026 को रूसी राष्ट्रपति सलाहकार निकोलाई पेत्रुशेव ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि चीन, रूस और ईरान का संयुक्त नौसैन्य अभ्यास, ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी बेल्ट-2026’, होर्मुज जलडमरूमध्य में शुरू हो गया है । यह कोई पहला आयोजन नहीं है; ये अभ्यास 2019 में ईरान की पहल पर शुरू हुए थे और तब से सात बार हो चुके हैं  लेकिन इस बार का आयोजन सिर्फ सैन्य कौशल दिखाने से कहीं बढ़कर है।

पेत्रुशेव ने साफ कहा कि वे ब्रिक्स को अब एक रणनीतिक समुद्री आयाम देने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 में दक्षिण अटलांटिक में पहला ब्रिक्स नौसैन्य अभ्यास (विल फॉर पीस-2026) हो चुका है जिसमें रूस, चीन, ईरान, यूएई और दक्षिण अफ्रीका ने हिस्सा लिया । यह सीधा संदेश है—अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन के मुकाबले अब पूर्व का एक नया सैन्य त्रिकोण उभर रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, रूस की भागीदारी प्रतीकात्मक है—एक कोरवेट भेजा गया है—लेकिन यह संकेत साफ है कि मास्को तेहरान को पश्चिम के खिलाफ ‘लीवरेज’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ।

  वार शिप्स और वार्निंग्स: कितनी बड़ी है मौजूदगी?

इस संयुक्त अभ्यास के जवाब में, अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी ऐतिहासिक स्तर पर बढ़ा दी है। 22 फरवरी 2026 तक की स्थिति यह है:

· USS अब्राहम लिंकन: जनवरी के अंत में क्षेत्र में भेजा गया यह विमानवाहक पोत अपने तीन गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर के साथ ओमान के पास अरब सागर में तैनात है। इसमें करीब 90 विमान हैं और यह ईरानी तट से मात्र 240 किमी दूर है ।

· USS गेराल्ड आर. फोर्ड: दुनिया के सबसे बड़े विमानवाहक पोत को ट्रंप ने 13 फरवरी को मध्य पूर्व भेजने का आदेश दिया । 21 फरवरी की शाम को यह भूमध्य सागर में दाखिल हो गया ।

ट्रंप ने साफ कहा है, “अगर डील नहीं हुई, तो हमें इसकी जरूरत पड़ेगी” । सीबीसी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, 150 से अधिक अमेरिकी सैन्य कार्गो उड़ानें हथियार और गोला-बारूद लेकर मध्य पूर्व पहुंच चुकी हैं। कतर के अल उदैद एयर बेस और जॉर्डन के मुवफ्फक साल्टी बेस पर दर्जनों लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं ।

इसके जवाब में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई ने 17 फरवरी को तेहरान में एक कार्यक्रम में चेतावनी दी कि अमेरिकी युद्धपोतों को “समुद्र की तलहटी में डुबोया” जा सकता है। उन्होंने कहा, “दुनिया की सबसे ताकतवर सेना को कभी-कभी ऐसा थप्पड़ पड़ता है कि वह उठ नहीं पाती” ।

🚢 होर्मुज का भूगोल और ईरान की मिसाइल ताकत

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है। यहां से रोजाना दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। इसकी सबसे संकरी जगह पर चौड़ाई महज 40 किलोमीटर है।

ईरान के पास एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलों (ASBM) का विशाल भंडार है। 17-18 फरवरी को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) ने होर्मुज में अलग से नौसैनिक अभ्यास किए और मिसाइलों का सफल परीक्षण किया । विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान के पास खलीज फार्स (300 किमी रेंज), होर्मुज-1 और होर्मुज-2 (300 किमी रेंज) और जुल्फिकार बसीर (700 किमी रेंज) जैसी एंटी-शिप मिसाइलें हैं। यमन के हूती विद्रोहियों ने इन्हीं मिसाइलों के क्लोन का इस्तेमाल कर लाल सागर में 100 से अधिक बार जहाजों पर हमला किया है।

✈️ हवाई अड्डे, उड़ानें और करोड़ों यात्री दांव पर

अगर युद्ध हुआ, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा नागरिक उड्डयन को भुगतना होगा। मध्य पूर्व क्षेत्र में 110 हवाई अड्डे हैं। अकेले दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (DXB) ने 2025 में रिकॉर्ड 9.52 करोड़ यात्रियों को सेवा दी, जिसमें 4,54,800 उड़ान मूवमेंट हुए। DXB पर अकेले भारत से 1.19 करोड़ यात्री आए, पाकिस्तान से 43 लाख यात्री और चीन से 25 लाख यात्री आए। यूरोपियन यूनियन एविएशन सेफ्टी एजेंसी (EASA) ने यूरोपीय एयरलाइंस को मार्च 2026 के अंत तक ईरानी हवाई क्षेत्र से दूर रहने को कहा है, जिससे हजारों उड़ानों के रूट बदलने और करोड़ों यात्रियों के फंसने का खतरा है।

⚡ परमाणु प्रश्न: ‘ज़ीरो’ या ‘टोकन’ एनरिचमेंट?

20 फरवरी को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग्ची ने कहा कि तेहरान अगले दो-तीन दिनों में एक संभावित परमाणु समझौते का मसौदा तैयार करेगा। उन्होंने कहा, “एक त्वरित समझौता, दोनों पक्षों के लिए दिलचस्पी का विषय है” ।

लेकिन 22 फरवरी को एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के सामने दो विकल्प हैं: या तो ईरान से “ज़ीरो एनरिचमेंट” की मांग करें, या फिर “टोकन एनरिचमेंट” की अनुमति दें जिससे ईरान के पास परमाणु बम बनाने की “कोई संभावना न रहे” ।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने एक्सियोस को बताया, “राष्ट्रपति ट्रंप एक ठोस डील के लिए तैयार हैं, जिसे वे घरेलू स्तर पर राजनीतिक रूप से बेच सकें। अगर ईरानी हमले से बचना चाहते हैं, तो उन्हें हमें ऐसा ऑफर देना चाहिए, जिसे हम ठुकरा न सकें” ।

🎯 ट्रंप का स्ट्रैटेजिक ट्रैप: क्या खामेनेई को ‘उठाया’ जा सकता है?

परमाणु हमले की स्थिति में, ईरान का आकार—16 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक का पहाड़ी इलाका—एक ही हमले में उसे खत्म करना असंभव बनाता है जबकि अमेरिका के पास पारंपरिक हथियारों से भारी तबाही मचाने की क्षमता है, “ईरान को खत्म करने” की अवधारणा एक स्ट्रैटेजिक मृगतृष्णा है।

कुछ लोगों के मन में सवाल है कि क्या अमेरिका आयतुल्लाह खामेनेई को वेनेजुएला के मादुरो की तरह “उठा” सकता है? एक्सियोस की 22 फरवरी की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप को सैन्य विकल्प पेश किए गए हैं जिसमें एक परिदृश्य ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और उनके बेटे मोजतबा को सीधे निशाना बनाने का भी शामिल है । एक वरिष्ठ ट्रंप सलाहकार ने कहा, “पेंटागन ने हर परिदृश्य के लिए विकल्प तैयार कर रखे हैं। एक परिदृश्य आयतुल्लाह और उनके बेटे और मुल्लाओं को खत्म करने का है” ।

लेकिन यह तुलना बेहद गलत है। मादुरो की गिरफ्तारी जनवरी 2026 में एक सटीक ऑपरेशन था, जो अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल में हुआ। ईरान का नेतृत्व गहरी सुरक्षा परतों में दबा है और वफादारों के राष्ट्रव्यापी नेटवर्क को कमांड करता है। IRGC के पास क्षेत्र में फैले प्रॉक्सी (हिज्बुल्लाह, हौथी, इराकी मिलिशिया) के जरिए अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता है।

यह ट्रंप को एक गहरी दुविधा में डालता है। दो विमानवाहक पोत, एक दर्जन युद्धपोत और सैकड़ों विमान जुटाकर, और 10-15 दिनों की अल्टीमेटम देकर, अगर ट्रंप बिना डील के पीछे हटते हैं, तो यह ऐतिहासिक अपमान होगा। 22 फरवरी को ही अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ ने फॉक्स न्यूज पर कहा कि ट्रंप “उत्सुक” हैं कि आखिर ईरान ने अमेरिकी मांगों के सामने आत्मसमर्पण क्यों नहीं किया  लेकिन बड़ा हमला करने का मतलब विनाशकारी, लंबे युद्ध में फंसना होगा।

यह जोखिम 1 फरवरी 2026 को चीन, रूस और ईरान के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते से और बढ़ गया है।  1 फरवरी 2026 को तेहरान में हस्ताक्षरित “Comprehensive Strategic Pact” अमेरिका को चिंता में डालने वाला सबसे महत्वपूर्ण 42-पृष्ठ का त्रिपक्षीय दस्तावेज़ है, जिसे ईरान, चीन और रूस ने मिलकर साइन किया और जिसे उनकी राज्य मीडिया ने “नए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नींव” बताया है। इसमें आर्थिक, ऊर्जा, तकनीकी और सुरक्षा सहयोग को संस्थागत रूप दिया गया है, ताकि पश्चिमी दबाव और अमेरिकी प्रतिबंधों का सामूहिक जवाब दिया जा सके। यद्यपि इसमें NATO जैसी “सामूहिक रक्षा” की धारा नहीं है लेकिन सबसे बड़ा खतरा अमेरिका के लिए यह है कि युद्ध की स्थिति में चीन और रूस सीधे लड़ाई में शामिल न होकर ईरान को खुफिया जानकारी, आर्थिक सहयोग और संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक कवर देंगे। इसका अर्थ है कि ईरान अब अकेला नहीं है — उसके पीछे दो परमाणु और आर्थिक महाशक्ति खड़ी हैं जिससे अमेरिका की त्वरित जीत की संभावना लगभग असंभव हो जाती है।  

तो भले ही बीजिंग और मॉस्को सिर्फ “पिछवाड़े” से समर्थन दें—खुफिया जानकारी, UN में राजनयिक कवर, या आर्थिक मदद—यह अमेरिका को त्वरित जीत से वंचित कर देगा।

🌍 दुनिया किसके साथ? भारत कहां?

अमेरिका के पक्ष में:

· इजराइल: पूरी तरह से। रिपोर्ट्स के मुताबिक कोई भी हमला इजराइल के साथ मिलकर हो सकता है।

· यूरोपीय संघ और नाटो: सैन्य रूप से अमेरिका के करीब। EASA ने यूरोपीय एयरलाइंस को ईरानी हवाई क्षेत्र से दूर रहने को कहा है।

ईरान के पक्ष में या तटस्थ:

· रूस और चीन: सैन्य अभ्यास में भागीदारी।

· क्षेत्रीय देश: सऊदी अरब, कतर, यूएई, ओमान, मिस्र, तुर्की, इराक—सबने वार्ता का समर्थन किया है।

भारत की स्थिति सबसे नाजुक:

एक तरफ क्वाड के जरिए अमेरिका से रणनीतिक संबंध, दूसरी तरफ चाबहार पोर्ट से ईरान से रिश्ते। 16 फरवरी 2026 को भारत और ईरान ने चाबहार के शाहिद-बेहेश्ती पोर्ट के संचालन के लिए दीर्घकालिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए । यह भारत का पहला विदेशी रणनीतिक निवेश है लेकिन हाल ही के बजट में चाबहार के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया और अमेरिका से अप्रैल 2026 तक का समय मांगा गया है।

ब्रिक्स का एंगल:

1 जनवरी 2026 से भारत के पास BRICS की अध्यक्षता है । 9-10 फरवरी को नई दिल्ली में BRICS शेरपाओं की पहली बैठक हुई । 18वां BRICS सम्मेलन इसी साल भारत में होना है, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी अध्यक्ष होंगे। ईरान अब BRICS का पूर्ण सदस्य है जबकि भारत QUAD का भी सदस्य है।

🔥 निष्कर्ष: आग और पानी के बीच

ट्रंप के सामने तीन विकल्प हैं—समझौता, पीछे हटना, या युद्ध। 22 फरवरी को एक ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि नई वार्ता मार्च की शुरुआत में हो सकती है और अनंतिम समझौता संभव है  लेकिन समयसीमा टिक-टिक कर रही है।

रूस और चीन चाहते हैं कि अमेरिका खाड़ी में फंसा रहे और यूक्रेन या ताइवान से हटे। अमेरिका चाहता है कि ईरान कमजोर हो और इजराइल सुरक्षित रहे। इस बीच, भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और करोड़ों लोगों की जान दांव पर लगी है।

अगर ईरान ने झुकना नहीं सीखा और अमेरिका ने बढ़ना नहीं छोड़ा तो होर्मुज की लहरें जल्द ही खून से लाल हो सकती हैं। तीसरा विश्व युद्ध अब कोई काल्पनिक डर नहीं, बल्कि एक संभावित वास्तविकता है।

ओंकारेश्वर पांडेय