विश्ववार्ता

ट्रम्प की लाठी, ट्रम्प की भैंस

राजेश कुमार पासी

जिसकी लाठी, उसकी भैंस, ये कहावत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर बिल्कुल फिट बैठ रही है। एक तरह से अब ट्रम्प लाठी लेकर निकल चुके हैं और किसी की परवाह नहीं कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने दिखा दिया है कि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून मायने नहीं रखते और न ही किसी किस्म की नैतिकता की उन्हें परवाह है । वास्तव में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता सिर्फ दिखावे के लिए होती है और अमेरिका अभी तक ऐसे ही दिखावे से दुनिया को हांकता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप ने कोई दिखावा नहीं किया और सीधे वेनेजुएला के पदस्थ राष्ट्रपति को अपने स्पेशल दस्ते से उनके निवास से उठवा लिया । एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को इस तरह से उठा लेना बताता है कि अमेरिका अब दादागिरी पर उतर आया है। प्रसिद्ध हिंदी फिल्म ‘शोले’ के खलनायक का प्रसिद्ध डॉयलॉग है, “गब्बर के ताप से तुम्हें कौन बचा सकता है, खुद गब्बर।” ऐसे ही अहंकार से भरे हुए ट्रंप ने कहा है कि उनकी आक्रामकता को सिर्फ वही रोक सकते हैं। दूसरे शब्दों में वो पूरी दुनिया को धमका रहे हैं कि उन्हें कोई रोकने वाला नहीं है। अगर उनकी बात मानी गई तो वो रुक सकते हैं, क्योंकि उन्हें उनके अलावा कोई और नहीं रोक सकता।

  जो अमेरिका पहले मानवाधिकार, लोकतंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर दूसरे देशों को बर्बाद करता आया है, उसने अपने स्वार्थ के लिए एक देश पर सीधा हमला कर दिया है। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी को इंसानियत का दुश्मन बताकर जो कुछ किया गया, वैसा ही निकोलस मादुरो के साथ करने के लिए कोई बहाना नहीं बनाया गया। देखा जाए तो अमेरिका ने दुनिया को यह बताया है कि वो ऐसा करने की ताकत रखता है, इसलिए उसने यह सब किया है। अमेरिका अपने आपको दुनिया का रक्षक मानता है और एक थानेदार जैसा व्यवहार करता है, लेकिन सच यह है कि अमेरिका जिस देश में भी घुसा है, वो बर्बाद हो गया है। बांग्लादेश तेजी से विकास के रास्ते पर चल रहा था, लेकिन अमेरिका से यह देखा नहीं गया और वहां से शेख हसीना को उखाड़ कर फेंक दिया। अमेरिका ने बांग्लादेश में अपने एजेंट मोहम्मद यूनुस को बिठा दिया है जो बांग्लादेश को बर्बाद करने पर तुला हुआ है। मिडल ईस्ट की बर्बादी के पीछे अमेरिका का स्वार्थ छुपा हुआ है।

                डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में आते ही घोषणा कर दी थी कि उनकी नीति अमेरिका फर्स्ट की है लेकिन सच यह है कि उनकी नीति ट्रम्प फर्स्ट की है। उनकी नीतियां बता रही हैं कि वो आक्रामक तरीके से अपने उद्योगपति मित्रों की मदद कर रहे हैं। वेनेजुएला पर हमला भी अमेरिकी तेल कंपनियों के फायदे के लिए किया गया है। अमेरिका का इतिहास बताता है कि अमेरिका ने कई बार अपने व्यापारिक उद्देश्यों के लिए दूसरे देशों को निशाना बनाया है।  ट्रम्प ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वो सत्ता में आते ही सारे युद्ध रुकवा देंगे और नए युद्ध शुरू नहीं होने देंगे । उन्हें सत्ता में आये हुए एक साल होने वाला है लेकिन वो कोई भी युद्ध बंद नहीं करवा पाए हैं। इसके विपरीत अब डोनाल्ड ट्रंप खुद ही युद्ध की घोषणा करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वो खुद को शांतिदूत घोषित करते हुए नोबेल पुरस्कार देने की मांग कर रहे हैं लेकिन उनकी यह मांग अभी तक मानी नहीं गई है। लगता है कि नोबल पुरस्कार न मिलने से निराश ट्रम्प अब गुंडागर्दी पर उतर आए हैं। भारत-पाकिस्तान का संघर्ष रुकवाने का दावा करने वाले ट्रम्प ने शांति का मसीहा बनने की कोशिश की है लेकिन वेनेजुएला पर हमला करके उन्होंने विश्वशांति को खतरे में डाल दिया है।

ट्रम्प की कार्यवाही का रूस और चीन ने विरोध किया है लेकिन बाकी दुनिया लगभग चुप है। इससे उत्साहित होकर ट्रम्प ने कोलम्बिया, मैक्सिको, क्यूबा और ग्रीनलैंड पर कार्यवाही करने की बात कही है। वो लगातार ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात कह रहे हैं और धमकी दे रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका में शामिल होकर रहेगा, चाहे ये बातचीत से हो या युद्ध से हो। ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सदस्य देश है। यूरोपीय देश भी अमेरिका का विरोध कर रहे हैं लेकिन ट्रम्प के बयानों में नर्मी के संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का बहाना उन्होंने यह बनाया है कि अगर उस पर अमेरिका कब्जा नहीं करेगा तो रूस और चीन उस पर कब्जा कर लेंगे।  अजीब बात यह है कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिये अमेरिकी सेना वहां पहले से ही मौजूद है । जब ग्रीनलैंड की सुरक्षा अमेरिका कर रहा है तो रूस और चीन का डर क्यों दिखाया जा रहा है। 

             इस समय ईरान एक प्रकार के गृहयुद्ध से जूझ रहा है लेकिन डोनाल्ड ट्रंप उस पर हमला करने की धमकी दे रहे हैं। देखा जाए तो वो ईरान के अंदरूनी हालातों का फायदा उठाकर वहां भी दखल देने का बहाना ढूंढ रहे हैं। अगर आम जनता के मरने से अमेरिका परेशान है और लोगों की जान बचाना चाहता है तो सूडान के हालात बहुत ज्यादा खराब हैं । वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप की लालची नजरें पूरी दुनिया को लूट का माल समझ रही हैं। उन्होंने कहा है कि वेनेजुएला अमेरिका को पांच करोड़ बैरल तेल देगा और उसकी बिक्री वो खुद करेंगे। इससे साबित होता है कि वेनेजुएला में अमेरिकी कार्यवाही का मकसद सिर्फ उसके प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना है। ऐसे ही अमेरिका ईरान में अपनी कठपुतली सरकार बिठाकर उसके तेल पर कब्जा करना चाहता है। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का मकसद भी यही है कि उसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन अमेरिकी हितों के लिए किया जा सके । अमेरिका की कार्यवाही का पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है, लेकिन अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति है, इसलिए कोई भी देश एक सीमा तक ही उसका विरोध कर सकते हैं। अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए यूरोपीय देशों के विरोध की भी अनदेखी कर रहा है।  डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया की इस कमजोरी को पहचान लिया है, इसलिए मनमानी पर उतर आए हैं।

 रूस इस समय यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा हुआ है, इसलिए वो भी ज्यादा विरोध नहीं कर पा रहा है। दूसरी बात यह है कि यूक्रेन पर हमला करने के कारण वो खुद दुनिया के निशाने पर है । वेनेजुएला से चीन के आर्थिक हित गहराई से जुड़े हुए हैं लेकिन चीन अभी इतना ताकतवर नहीं हुआ है कि अमेरिका के खिलाफ कोई कार्यवाही कर सके । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस मामले पर आपात बैठक बुलाई थी लेकिन वीटो पावर वाले अमेरिका के खिलाफ वो भी कुछ नहीं कर सकती। डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी हितों के आगे अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संस्थाओं को कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। 

              सवाल यह है कि ट्रम्प सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर मनमानी पर क्यों उतर आए हैं।  वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था बहुत बुरे दौर से गुजर रही है। ट्रम्प से कई देशों पर भारी टैरिफ ठोक दिया है, जिसके कारण अमेरिका में महंगाई बहुत बढ़ गई है और जनता इससे बहुत परेशान है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप बहुत तेजी से अलोकप्रिय हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि वो ऐसी कार्यवाहियों से देश की जनता का ध्यान अंदरूनी समस्याओं से हटाना चाहते हैं। वो जनता को यह दिखा रहे हैं कि वो अमेरिकी हितों के लिए पूरी दुनिया से लड़ रहे हैं। डॉलर का प्रभुत्व लगातार कम हो रहा है, वेनेजुएला पर भी हमले का एक कारण यह भी है कि वो अपना तेल डॉलर के अलावा अन्य मुद्राओं में बेचने का विचार कर रहा था। अमेरिका का विरोध दुनिया में धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जिसके कारण डॉलर का इस्तेमाल कम हो रहा है। डोनाल्ड ट्रंप डॉलर के घटते प्रभुत्व से परेशान हैं, इसलिए दुनिया को धमका रहे हैं। पिछले 25 सालों से अमेरिका-भारत के बढ़ते रिश्तों को भी उन्होंने बर्बाद कर दिया है, क्योंकि भारत उनके अनुसार व्यापारिक समझौता करने को तैयार नहीं है।

देखा जाए तो ट्रम्प दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध से भी पहले वाले युग में ले जा रहे हैं, जब दुनिया किसी नियम-कानून से नहीं चलती थी। उस वक्त जिसके पास ताकत थी, वो दूसरे देशों पर कब्जा कर लेता था। उस समय दुनिया में एक तरह से जंगल का कानून ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ चल रहा था । ट्रम्प भी इसी कानून पर चल रहे हैं और कमजोर देशों के संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल यह है कि अगर अमेरिका ऐसा करेगा तो वो दूसरे देशों को ऐसा ही करने से कैसे रोकेगा। सवाल तो यह भी है कि क्या अमेरिका दूसरे देशों को ऐसा करने से रोकना भी चाहता है। अगर रूस यूक्रेन पर पूरी तरह कब्जा कर लेता है तो अमेरिका और यूरोप उसका कैसे विरोध करेंगे। अगर चीन ताइवान पर कब्जा कर लेता है तो उसका विरोध किस आधार पर किया जाएगा। डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ अमेरिका नहीं बल्कि पूरी दुनिया को बर्बादी की ओर ले जा रहे हैं। जिस युग को हम भुला चुके थे, ट्रम्प उसी अंधकारमय युग में दुनिया को धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। 

राजेश कुमार पासी