राजनीति

यूजीसी प्रकरण : उच्च शिक्षण संस्थानों को जातीय हिसाब-किताब बराबर करने का केंद्र नहीं बनने दिया जाए

ज्ञान चंद पाटनी

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के नए नियमों पर रोक लगा दी है। इन नियमों का सवर्ण वर्ग भारी विरोध कर रहा था। कोर्ट ने सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति इन नियमों में खामियों को भरने पर विचार कर सकती है। यूजीसी के 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम’ का प्रभाव शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं रहा। इसे लेकर पूरे देश में बवाल शुरू हो गया। इन नियमों में समान अवसर केंद्र, आरक्षित सदस्यों वाली समितियां बनाने, निगरानी दस्ते गठित करने का प्रावधान है लेकिन झूठी शिकायतों पर मौन साध लिया गया। भले ही इनका लक्ष्य जातीय भेदभाव को समाप्त करना है, लेकिन इससे जातीय राजनीति को हवा मिली और शिक्षण संस्थानों में ही नहीं, पूरे देश में जातीय वैमनस्य बढ़ने की आशंका पैदा हो गई। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि नए नियमों के प्रावधानों में प्रथम दृष्टया अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका है।

सवर्ण संगठनों का उग्र विरोध और सोशल मीडिया पर यूजीसी रोलबैक का तूफान इसका प्रमाण है कि इन नियमों को लेकर एक वर्ग में कितना रोष है। इसी के चलते उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। जाने—माने कवि कुमार विश्वास की सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया भी चर्चा का विषय बनी। कुमार विश्वास ने दिवंगत कवि रमेश रंजन की एक कविता साझा की। लिखा, चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा, राई लो या पहाड़ लो राजा, मैं अभागा सवर्ण हूं, मेरा रोंया—रोंया उखाड़ लो राजा…। उधर कांग्रेस जैसे प्रमुख विपक्षी दल राजनीतिक कारणों से मौन साधे रहे जबकि दलित-ओबीसी संगठनों ने नए नियमों को अपनी विजय माना। राजद प्रवक्ता कंचना यादव का बयान तो बहुत चर्चित हुआ। यूजीसी बिल पर एक टीवी डिबेट में उन्होंने कहा कि आपको यानी सवर्ण समाज को फंसाया जाना चाहिए क्योंकि आपने कभी भी इस देश के 90 प्रतिशत ओबीसी, एससी—एसटी आबादी, माइनॉरिटी को उसका हक नहीं दिया। जिस तरह की बयानबाजी हुई, उससे यह आशंका है कि इन नियमों का सर्वाधिक विनाशकारी प्रभाव समाज के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ेगा। नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक से विवाद खत्म भले ही नहीं हो लेकिन इसकी उग्रता जरूर कम हो जाएगी।

यूजीसी के नए नियमों में प्रावधान किया गया है कि हर उच्च शिक्षण संस्थान में अनिवार्य समान अवसर केंद्र (ईओसी) और दस सदस्यीय समानता समिति का गठन अनिवार्य होगा। समानता समिति में पांच सदस्य आरक्षित वर्गों से होंगे और घूमते-फिरते निगरानी दस्तों की व्यवस्था भी होगी लेकिन, झूठी शिकायतों पर किसी तरह की सजा का प्रावधान न होने के कारण निर्दोषों के उत्पीड़न का मार्ग खुलने की आशंका जताई जा रही है। इन नियमों के चलते उच्च शिक्षा परिसरों में संवाद की जगह संशय का वातावरण बनने की आशंका है। माना जा रहा है कि डर के कारण सवर्ण छात्र आरक्षित वर्गों से दूरी बनाए रखेंगे और एक दूसरे के प्रति अविश्वास का माहौल बन जाएगा। इससे जातीय तनाव बढ़ने का डर भी है। आजादी के बाद जातीय समरसता के जो प्रयास किए जा रहे थे, उन पर इन नियमों पर वज्रपात जैसा असर हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि इनका दुरुपयोग होने की आशंका है। जरूरतमंद को सुरक्षा जरूर मिलनी चाहिए लेकिन लक्ष्य जातिविहीन समाज ही होना चाहिए।

नए नियमों को 2012 के इसी नाम के यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियमों की जगह लेना था। 2012 के नियम ज्यादातर सलाहकारी प्रकृति के थे। उनमें कहा गया था कि "सजा भेदभाव या उत्पीड़न की प्रकृति के अनुरूप होगी"। इनमें ओबीसी वर्ग भी शामिल नहीं था। ऐसे संस्थान के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान नहीं किया था जो नियमों का पालन नहीं करता है। अब उन संस्थानों को कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, जो नियमों का पालन नहीं करेंगे। यूजीसी उन्हें आयोग की योजनाओं में भाग लेने, डिग्री और ऑनलाइन पाठ्यक्रम संचालित करने से रोक सकता है। ऐसे संस्थानों को केंद्रीय अनुदान प्राप्त करने के योग्य संस्थानों की सूची से भी हटाया जा सकता है।

उच्च शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण का आधार स्तंभ माना जाता है। इन नियमों से जुड़ी आशंकाएं सच साबित हुईं तो यह मजबूत स्तंभ हिल सकता है। नियमों से कागजी कार्रवाई बढ़ेगी। शिक्षक खुलकर पढ़ाने से हिचकिचाएंगे, विद्यार्थी चर्चा से कतराएंगे। संस्थानों में नवाचारों पर भी इसका असर हो सकता है। ब्रेन ड्रेन की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। उच्च शिक्षण संस्थान ज्ञानार्जन नहीं बल्कि जातीय हिसाब-किताब बराबर करने के केंद्र बन सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी विश्वविद्यालयों का भारत की तरफ झुकाव बढ़ा है। अब वे अपने कदम पीछे खींच सकते हैं। केंद्रीय अनुदान रद्द करने, डिग्री कार्यक्रमों पर रोक जैसे नए नियमों से संस्थानों दबाव में आ सकते हैं।

भारतीय राजनीति पर इन नियमों का व्यापक प्रभाव पड़ना तय है। राजनीति के चलते जातीय टकराव भड़क सकता है। भारतीय राजनीति में जातीय रंग हमेशा ही रहा है लेकिन अब यह अधिक गहरा हो सकता है। अब यह एससी—एसटी—ओबीसी बनाम सवर्ण का रूप ले सकता है। इसके चलते विकास, रोजगार जैसे मुद्दे दब सकते हैं। आशंका यह है कि कहीं लोकतंत्र जातियों का बंधक बनकर न रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि नए नियमों से समाज बंटेगा।

विपरीत प्रभावों को रोकने के लिए इन नियमों में तत्काल   संशोधन आवश्यक हो गया है। अब सुप्रीम कोर्ट की रोक से संशोधन की राह खुल गई है। बेहतर तो यह है कि झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान जोड़ा जाए। मामला झूठा पाए जाने पर जुर्माना, निष्कासन या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान हो।  नए नियमों में सवर्णों समेत सभी जातियों को शामिल किया जाए। किसी  भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। नए नियम बनाने के पीछे भावना अच्छी है, किंतु नियमों में असंतुलन से विनाश का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। सुधार के नाम पर उच्च शिक्षण संस्थानों को विनाश की राह पर नहीं धकेला जाना चाहिए। ऐसी दवा क्या काम की जो इलाज करने की बजाय मर्ज को ही बढ़ा दे। यह राहत की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगा कर  जातीय विभाजन की खाई को चौड़ा करने के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाई है।

ज्ञान चंद पाटनी