आर्थिकी

यूजीसी विनियम : संदेह की धुंध में तथ्यों की पड़ताल

अनिल धर्मदेश

उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव निवारण के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। 13 जनवरी को जारी गजेटियर पर सामान्य वर्ग में उपजे प्रारंभिक भ्रम ने मीडिया ट्रायल के परिणामस्वरूप राष्ट्रव्यापी असंतोष और आक्रोश का रूप ले लिया। प्रावधानों को सामान्य वर्ग के लिए अन्यायपूर्ण बताने वाली जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान  न्यायलय ने भी इसके गलत प्रयोग हो सकने की आशंका जताते हुए अगली सुनवाई तक इसपर रोक लगा दी।

महज पंद्रह दिनों में सामान्य वर्ग के मध्य इन विनियमों से ऐसा भय व रोष व्याप्त हुआ जो विगत कई दशकों में नहीं देखा गया। भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता और मानदंडों को विश्वस्तरीय वैश्विक बनाने के लिए उनमें शुचिता और समानता की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि नए नियमों पर आग्रह-पूर्वाग्रह जनित समर्थन और विरोध को दरकिनार कर विनियमों के कानूनी पहलुओं की गंभीरता से समीक्षा की जाए। गजेटियर के समस्त वाक्य-उपवाक्य के साथ ही उसके प्रारूप और व्यवस्थाओं को समझे बिना कोई निर्णय निकालना    जल्दबाजी  होगी।

भारत में कानूनों के लिए पदानुक्रम व्यवस्था है जिसमें सबसे ऊपर भारत का संविधान है। तत्पश्चात संसद द्वारा पारित कानून और उसके बाद मंत्रालयों के नियमन आते हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि कोई भी मंत्रालय या उसके अधीन कार्यरत आयोग संबंधित समूह के लिए जो भी नियमन करेगा, वह भारत की संसद द्वारा पारित कानून और हमारे संविधान के समस्त प्रावधानों के अधीन ही होगा। कोई भी मंत्रालय या आयोग ऐसा कोई प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सकता जो संविधान द्वारा स्थापित और संसद द्वारा पारित किसी कानून की अवहेलना करे। 

उच्च शिक्षण संस्थाओं में रैगिंग निषेध करने के लिए यूजीसी ने जो शपथपत्र जारी कर रखा है, वह संसद द्वारा यूजीसी अधिनियम 1956 की धारा 26(1)(जी) के अंतर्गत ही स्थापित है। इसी प्रकार रैगिंग की परिभाषा(नियम 3) और इसके दंड आदि भी (9) भी मूल यूजीसी अधिनियम में ही संकलित हैं। ठीक उसी प्रकार उच्च शिक्षण संस्थाओं में भेदभाव उन्मूलन के माध्यम से समता की स्थापना के लिए जो नियम लाए गए हैं, वह भी भारत के संविधान और संसद द्वारा पारित कानूनों के अधीन ही कार्य करेंगे। यही कारण है कि यूजीसी ने ‘हितधारक’ और ‘समता’ शब्द को अलग से परिभाषित किया है, जिससे भेदभाव के लिए संसद और संविधान में पहले से उपस्थित प्रावधानों की अनुपालना हो सके अन्यथा भेदभाव की समाप्ति के लिए भारत में नागरिक अधिकार अधिनिय 1956, अनुसूचित जाति एवं जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम 2013 पहले से उपस्थित हैं। इन अलग-अलग कानूनों को समग्र में संकलित करने के लिए ही यूजीसी ने नियम 7(क) के तहत उच्च शिक्षण संस्थान के समस्त हितधारकों(प्रवेश पा चुके एवं प्रवेश फार्म भरने वाले छात्र, कर्मचारी, शिक्षक, प्रबंध कमेटी एवं प्रमुख) से लिखित घोषणापत्र की व्यवस्था की है।

घोषणापत्र कहता है कि उच्च शिक्षा संस्थान यह सुनिश्चित करेंगे कि समता को संवर्धन देंगे और भेदभाव के किसी भी रूप में संलिप्त नहीं होंगे। इसी के प्रभाव संविधान के भाग 3 में वर्णित अनुच्छेद 14 की अनुपालना की जा सकेगी। स्पष्ट हो जाता है कि किसी संस्थान में यूजीसी विनियमों के अधीन गठित समिति के समक्ष सभी हितधारक एक समान होंगे। अतः समिति को घोषणापत्र का उल्लंघन करने पर हितधारक के विरुद्ध ऊपर वर्णित तीन कानूनों के साथ ही शपथपत्र के उल्लंघन की धाराओं में कार्यवाही का भी अधिकार प्राप्त होगा, फिर चाहे वह किसी भी जाति-धर्म, लिंग-नस्ल या सामाजिक-आर्थिक अवस्था का हो। ऐसे में यह कहना कि सामान्य वर्ग का कोई छात्र किसी महिला, विकलांग, अनुसूचित जाति-जनजाति अथवा पिछड़े वर्ग के छात्र के विरुद्ध समिति में शिकायत नहीं कर सकता, यह तथ्यपरक नहीं लगता। 

नए प्रावधानों का जो विरोध हो रहा है उसमें नियम 3-ग प्रमुख है। कहा जा रहा है कि शब्द ‘भेदभाव’ की परिभाषा में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और अवस्था का उल्लेख किए जाने के बाद ‘जातिगत भेदभाव’ में सिर्फ अनुसूचित जाति-जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग को ही क्यों उल्लेखित किया गया? जबकि यह प्रावधान इसलिए है क्योंकि जातिगत भेदभाव के लिए संसद ने पहले से एक अलग कानून(एससी/एसटी एक्ट 1989) की व्यवस्था कर रखी है जिसका अनुपालन आयोग के लिए अनिवार्य है जबकि जातिगत भेदभाव के लिए शेष सभी हितधारक(सामान्य वर्ग भी) संविधान में वर्णित अनुच्छेद 15 और शपथपत्र उल्लंघन के अंतर्गत संरक्षित रहेंगे। 

इस प्रकार नए प्रावधान 2012 के नियमों से कहीं अधिक व्यापक और वर्गीकृत एवं स्पष्ट हैं। 2012 के नियमों में यूजीसी ने 26 प्रकार के ‘भेदभाव’ चिन्हित किए थे परंतु उसमें न तो सभी से घोषणापत्र लेने की व्यवस्था थी और न ही किसी समता समिति की। शिक्षण संस्थान को समतामूलक बनाने के लिए ही यूजीसी ने ‘समता समिति’ के साथ ही ‘समता’ को भी अलग से परिभाषित किया है। परिभाषा स्पष्ट रूप से कहती है कि सभी वैध अधिकारों के प्रयोग के संबंध में, पात्रता एवं अवसर के मामले में सभी हितधारकों के लिए एक समान अवसर का क्षेत्र है। चूंकि यह विनियम भेदभाव के अलग-अलग कानूनों का एकीकृत संकलन है, ऐसे में वर्गीकरण के माध्यम से समानता की स्पष्टता ही इसकी इसकी पारदर्शिता की कुंजी है। यही नहीं, इन नियमों के अधीन कोई कोई भी हितधारक(फिर चाहे वह किसी भी जाति-धर्म, नस्ल-लिंग या अवस्था का हो) घोषणापत्र का उल्लंघन करने पर दंड का भागी होगा। यह व्यवस्था एससी/एससी ऐक्ट 1989 के तहत की गयी किसी झूठी शिकायत के लिए भी नहीं है। 

 यह दुर्भाग्य ही है कि ‘भेदभाव’ पर भ्रम से उपजे शोर में ‘समानता’ के लिए किए गए नए प्रावधान पीछे दब गए जबकि कॉलेजों में समान अवसर केंद्र या इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर स्थापित की स्थापना एक अद्वितीय पहल है। इस केंद्र का काम वंचित समुदायों(आर्थिक रूप से पिछड़े भी) के हितों से जुड़ी योजनाओं पर नज़र रखना, छात्रों और कर्मचारियों को पढ़ाई, सामाजिक मामलों और पैसों से जुड़ी सलाह देना, परिसर में विविधता और सबको साथ लेकर चलने का माहौल बढ़ाना और ज़रूरत पड़ने पर जिला एवं राज्य की कानूनी सेवा संस्थाओं की मदद से कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। वहीं समता समिति भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी।

अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और 19 मार्च को यूजीसी और मंत्रालय इस पर अपना पक्ष रखेंगे। इस प्रकार भ्रम के एक-एक बिंदु पर व्यापक चर्चा के बाद ही नया प्रारूप जारी होगा। अपेक्षा है कि पक्ष-विपक्ष मिलकर एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण सुनिश्चित करेंगे जो सभी हितधारकों के लिए एक समान अवसर और अधिकार के मानदंड स्थापित करने में सक्षम हो। 

अनिल धर्मदेश