-सुनील कुमार महला
मध्य-पूर्व में जारी युद्ध को 40 दिन से अधिक समय हो चुका है तथा लगातार हमलों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दुनिया स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रूस और चीन के वीटो के कारण पारित नहीं हो सका। बहरीन द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपील की गई थी। पाठकों को बताता चलूं कि 15 सदस्यीय परिषद में इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 वोट पड़े, जबकि रूस और चीन ने विरोध में मतदान किया। वहीं पर पाकिस्तान और कोलंबिया इस मतदान से दूर रहे।आवश्यक 09 मत मिलने के बावजूद, वीटो के चलते प्रस्ताव असफल हो गया।
इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को समझौते के लिए दी गई समय-सीमा समाप्त होने से एक दिन पहले, 7 अप्रैल 2026 (मंगलवार) को अमेरिकी सेना ने खर्ग द्वीप पर हमला किया। इसके समानांतर, इजरायल की सेना ने ईरान के भीतर रेल पटरियों और पुलों को निशाना बनाते हुए बमबारी की। जवाब में ईरान ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें और रॉकेट दागे। हालांकि, व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि वह ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों के उपयोग पर विचार नहीं कर रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की, जिसमें अगले 48 घंटे तक अपने स्थान पर ही सुरक्षित रहने की सलाह दी गई। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि ‘आज रात एक पूरी सभ्यता समाप्त हो सकती है, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा।’ दूसरी ओर, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने दावा किया कि 1 करोड़ 40 लाख से अधिक ईरानी देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि मध्य-पूर्व के इस युद्ध के प्रभाव लगातार गंभीर होते जा रहे हैं और इजरायली हमलों में ईरान के आठ पुल नष्ट हो चुके हैं तथा कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। जानकारी अनुसार इजरायल ने तेहरान, करज, काशान और कोम में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि ईरान ने इजरायल पर सात बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इतना ही नहीं, कुवैत से दागे गए एक रॉकेट हमले में इराक में तीन लोगों की मृत्यु हुई। वहीं, ईरान द्वारा कतर पर दागी गई मिसाइलों को कतर ने नाकाम करने का दावा किया है। इस बीच ईरान की विशेष सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने संभावित हमलों के लक्ष्यों की सूची भी जारी की है।सच तो यह है कि इस युद्ध का असर पूरे विश्व समेत भारत पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। दिल्ली-एनसीआर में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड ने पाइप्ड नैचुरल गैस (पीएनजी) के दामों में 1.70 रुपये प्रति एससीएम की वृद्धि की है, जो 1 अप्रैल से लागू हो चुकी है। इसके अलावा, एयर इंडिया ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर ईंधन शुल्क बढ़ा दिया है, जिसके तहत घरेलू उड़ानों में 299 रुपये से 899 रुपये तक की बढ़ोतरी की गई है।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुआ यह युद्ध एक महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीच-बीच में युद्धविराम की चर्चाएं जरूर होती हैं, लेकिन वे जल्द ही तीव्र हमलों के बीच दब जाती हैं। ताजा घटनाक्रम में जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि अमेरिका ने खर्ग द्वीप पर पुनः हमला किया, जबकि ईरान के अल्बोर्ज प्रांत में हुए हवाई हमले में कम से कम 18 लोगों की मौत हुई है। डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान निर्धारित समय तक होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल नहीं करता, तो उसके बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक बमबारी की जाएगी। इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या नागरिक ढांचे पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आते हैं। यहां यह गौरतलब है कि पहले ही एक स्कूल पर हुए हमले में बच्चियों की मौत को लेकर अमेरिका और इजरायल की आलोचना हो चुकी है। वास्तव में अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस युद्ध में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं। जहां अमेरिका और इजरायल ईरान पर लगातार हमले कर रहे हैं, वहीं ईरान भी इजरायल और मध्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है। इसके परिणामस्वरूप पूरे क्षेत्र में कच्चे तेल के उत्पादन और आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव पड़ा है, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और खाद्य संकट गहराता जा रहा है।इधर, युद्धविराम के प्रयास भी ठोस परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। ईरान ने 45 दिनों के युद्धविराम प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया है कि वह केवल स्थायी शांति और भविष्य में हमले न किए जाने की गारंटी चाहता है। यह मांग कूटनीतिक दृष्टि से तार्किक प्रतीत होती है, क्योंकि अस्थायी समाधान मूल समस्याओं का निवारण नहीं कर सकते। कहना ग़लत नहीं होगा कि वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि सभी पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हुए हैं, जिससे समाधान की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न उभरता है कि जब व्यापक विनाश के बाद यह युद्ध समाप्त होगा, तब शांति की कीमत कितनी भारी होगी।
इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल के पहले सप्ताह में ईरान के साथ दो सप्ताह के सीज़फायर की घोषणा की, जिसके तहत तत्काल बमबारी को टाल दिया गया। यह घोषणा संभावित हमले की तय समयसीमा से ठीक पहले की गई, जिससे क्षेत्र में बढ़ते तनाव को अस्थायी रूप से नियंत्रित करने का प्रयास हुआ। हालांकि, यह सीज़फायर कुछ शर्तों पर आधारित है, इसलिए हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और मध्य-पूर्व में तनाव अभी भी बना हुआ है।
अंत में यही कहूंगा कि , इस युद्ध को समाप्त करने के लिए सबसे पहले तत्काल और पूर्ण युद्धविराम आवश्यक है, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सक्रिय भूमिका अनिवार्य होगी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र या ओमान जैसे निष्पक्ष मध्यस्थों के माध्यम से संवाद शुरू कर चरणबद्ध समझौते की दिशा में बढ़ना होगा। होर्मुज जलडमरूमध्य में अंतरराष्ट्रीय निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था से तनाव कम किया जा सकता है। साथ ही, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और सुरक्षा गारंटी जैसे मूल मुद्दों पर पारदर्शी समझौता तथा नागरिक ठिकानों पर हमले रोककर मानवीय कानूनों का पालन ही स्थायी शांति का आधार बन सकता है।
सुनील कुमार महला