डॉ घनश्याम बादल
लोकतंत्र के स्वयं भू ठेकेदार और दुनियाभर में थानेदारी करने वाले अमेरिका ने जिस तरीके से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी सिलविया फ्लोरेस के साथ बेडरूम से घसीट कर, बंधक बनाकर हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां डालकर डिटेंशन सेंटर में रखा है, वह एक तानाशाह, वैध या अवैध राष्ट्रपति का अपहरण मात्र नहीं बल्कि वेनेजुएला के प्रतीक रूप में दुनिया भर के लोकतंत्र की आत्मा का अपहरण एवं प्रताड़न है।
जब किसी संप्रभु देश का राष्ट्रपति खुले तौर पर यह कहता है कि उसने दूसरे संप्रभु देश में सैन्य या अर्धसैन्य अभियान चलाकर वहां के राष्ट्राध्यक्ष को बंधक बनाया, तो यह केवल एक देश की कार्रवाई नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और वैश्विक व्यवस्था की सामूहिक अवहेलना बन जाती है। यह वही अमेरिका है जो दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार और कानून का पाठ पढ़ाता रहा है। वैसे यह पहली बार नहीं हुआ है. अमेरिका का ताकत प्रदर्शन का यह चेहरा पहले भी कई बार सामने आ चुका है। चिली, पनामा,ग्वाटेमाला, अफगानिस्तान, वियतनाम, ईरान व इराक जैसे कितने ही देश में अमेरिका ने मनमाने आरोप लगाकर वहां के शासको को सत्ता से बाहर किया है।
एब्सोल्यूट रेजोल्यूशन नाम के इस अभियान के बाद जिस तरह ट्रंप ने अमेरिका में बैठकर कोलंबिया और मेक्सिको की राष्ट्रपतियों को भी धमकी दी वह और भी ज्यादा चिंताजनक परिस्थितियों की ओर संकेत करता है।
ट्रंप का यह अभियान उसी ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ का शव परीक्षण है, जिसकी दुहाई पश्चिम दशकों से देता आया है।
भले ही डोनाल्ड ट्रंप मादूरो पर ड्रग तस्करी एवं आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन सच कुछ और ही है । यदि ऐसे आरोपी के आधार पर अमेरिका यह कार्रवाई करता है तो फिर उसका पहला टारगेट पाकिस्तान होना चाहिए था लेकिन आतंकिस्तान का नाम पा चुके इस देश को वह गोद में बैठा कर रखता है वहां के सेना अध्यक्ष को लोकतांत्रिक सरकार को एक तरफ करते हुए लंच पर बुलाता है। अमेरिका की कथनी करनी में यह फर्क कोई पहली बार परिलक्षित नहीं हुआ है यह उसकी बहुत पुरानी फितरत रही है।
यदि गहराई में जाया जाए तो इस अभियान का मूल राजनीतिक कारण है अपनी मनमाफिक सत्ता-परिवर्तन की ज़िद। और साथ ही साथ पेट्रोलियम, सोने एवं हीरे जैसे बहुमूल्य खनिजों की संपदा से मालामाल इस देश पर कब्जा करने की उसकी गिद्ध दृष्टि है।
वैसे वेनेजुएला के साथ अमेरिका का संघर्ष कोई एक दिन का नहीं है। ह्यूगो चावेज़ के समय से ही वाशिंगटन की असहजता जगज़ाहिर रही है। निकोलस मादुरो उस असहजता की निरंतरता हैं। अमेरिका को समस्या केवल मादुरो से नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मॉडल से है जो अमेरिकी प्रभाव से बाहर निकलकर संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण और सामाजिक राज्य की बात करता है।
ट्रंप के कृत्य से साफ है कि लोकतंत्र का सवाल केवल एक औज़ार था, असली लक्ष्य सत्ता-परिवर्तन। जब चुनाव, प्रतिबंध और कूटनीति काम नहीं आए, तो सीधा हस्तक्षेप ही अमेरिकी राजनीति का नंगा सच है।
इस घटनाका आर्थिक पक्ष तेल, डॉलर और सत्ता पर नियंत्रण है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडारों में से एक है। यह तथ्य इस पूरे घटनाक्रम की चाबी है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक हैसियत तेल, डॉलर और नियंत्रण के त्रिकोण पर टिकी है। वेनेजुएला का अपने तेल संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण और चीन-रूस जैसे देशों से बढ़ता सहयोग, अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती था।
ट्रंप का अभियान दुनिया भर के देशों को खुला धमकी भरा संदेश है कि ऊर्जा संसाधनों पर स्वतंत्र नीति अपनाने की कीमत चुकानी पड़ती है। यह संदेश केवल वेनेजुएला के लिए नहीं, बल्कि उन तमाम देशों के लिए है जो वैश्विक आर्थिक ढांचे में अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं।
अमेरिकी हस्तक्षेप के पीछे केवल राजनीति और अर्थशास्त्र नहीं, एक गहरी सांस्कृतिक मानसिकता भी है। उसके पीछे की धारणा है कि अमेरिका को जो उचित लगे, वही वैश्विक नैतिकता है। और जो उसे चुनौती दे उसे निष्ठा नाबूत करना उसके लिए अनैतिक नहीं है।
लैटिन अमेरिका का इतिहास इस मानसिकता का शिकार रहा हैचिली, ग्वाटेमाला, पनामा, निकारागुआ और अब वेनेजुएला हो सकता है इसके बाद कोलंबिया और मैक्सिको की भी बारी आए। जिसकी झलक ट्रंप के उसे अभियान भरे बयान के बाद मिल रही है जिसमें उन्होंने मेक्सिको के राष्ट्रपति को अपनी जान की परवाह करने की खुली धमकी दी है। ख़ैर कल जो होगा, सो होगा। अभी तो वेनेजुएला के घटनाक्रम का विश्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा है इसका आकलन ज़रूरी है.
राष्ट्रपति को बंधक बनाना केवल एक व्यक्ति का अपहरण नहीं, पूरे राष्ट्र की संप्रभुता का अपहरण है। इससे वेनेजुएला के भीतर राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी, सामाजिक ध्रुवीकरण गहराएगा और हिंसा की आशंका प्रबल होगी। वहां का आम नागरिकजो पहले ही प्रतिबंधों, महंगाई और अभावों से जूझ रहा है अब और असुरक्षित महसूस करेगा । लोकतंत्र का दावा करने वाली ताक़तों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आम जनता उनके एजेंडे में सबसे आख़िर में आती है। भले ही तात्कालिक रूप से रूस चीन ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के देश ने इस घटनाक्रम की आलोचना की है लेकिन सच यह भी है कि यह आलोचना केवल शाब्दिक निंदा तक ही सीमित रहने वाली है।
इस घटनाक्रम ने भारत के सामने भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। भारत परंपरागत रूप से संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और बहुध्रुवीय विश्व का पक्षधर रहा है। वेनेजुएला के साथ भारत के ऊर्जा संबंध भी रहे हैं। नैतिकता की दृष्टि से भारत के लिए चुप रहना आसान नहीं होगा, लेकिन किसी पक्ष का अंध समर्थन भी भारत की गुटनिरपेक्ष रणनीति के ख़िलाफ़ होगा। लेकिन यह सोचकर कि वेनेजुएला हमसे बहुत दूर का देश है, इस मुद्दे पर चुप्पी खींच लेने से भारत की इमर्जिंग वर्ल्ड पावर की छवि पर भी एक बड़ा निशान खड़ा होगा।
अमेरिका के इस दबंग कृत्य से संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति सब हाशिये पर जाते दिखाई दे रहे हैं। और और साफ संकेत दे रहे हैं कि अब विश्व व्यवस्था नियमों से नहीं, सैन्य क्षमता से संचालित होगी। यह स्थिति न शांति के लिए अच्छी है, न विकास के लिए।
इसमें दो राय नहीं कि वेनेजुएला की घटना केवल एक देश की त्रासदी नहीं, वैश्विक लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी है। जब सेना हथियार और आर्थिक ताक़त को नीति और अपहरण को कूटनीति बना दिया जाए, तो दुनिया अराजकता की ओर बढ़ती है। आज वेनेजुएला है, कल कोई और होगा। सवाल यह नहीं कि अगला कौन, सवाल यह है कि क्या दुनिया इसे रोकने का साहस दिखाएगी?