राजनीति

महाराष्ट्र चुनाव ने क्या संदेश दिया है

राजेश कुमार पासी

2014 के बाद से मोदी की राजनीति देश के सिर पर चढ़कर बोल रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में जब भाजपा बहुमत से दूर रह गई तो राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि अब मोदी की राजनीति का उतराव शुरू हो गया है । विपक्षी दल भी काफी खुश थे कि अब जनता में मोदी का असर कम होने लगा है । लोकसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में भाजपा की जबरदस्त जीत ने बता दिया है कि मोदी का असर कम होने की जगह बढ़ गया है । इस साल पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी में चुनाव होने वाले हैं, जो यह तय करेंगे कि विपक्ष का भविष्य क्या होगा । महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की थी लेकिन मुंबई महानगरपालिका चुनाव की जीत के अलग मायने हैं । बीएमसी के बजट को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह किसी बड़े राज्य से कम महत्वपूर्ण नहीं है । महाराष्ट्र भाजपा के लिए दूसरा गुजरात बन सकता है । जिस तरह से मोदी ने अपने शासन में धीरे-धीरे विपक्ष को खत्म कर दिया था, वैसे ही महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस भी मोदी के नेतृत्व में विपक्ष के खात्मे की ओर चल पड़े हैं।

 विपक्ष के खात्मे का ये मतलब नहीं है कि वो खत्म हो जाएगा बल्कि उसके खात्मे का मतलब है कि वो सत्ता छीनने के काबिल न बचेगा । इस नीति में विपक्ष जिंदा तो रहेगा लेकिन खड़ा होने के काबिल नहीं होगा। भाजपा की हिन्दुत्व और विकास की राजनीति विपक्ष को बहुत भारी पड़ रही है । अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा बहुत प्रोफेशनल पार्टी है. उसका मुकाबला उसके तरीके से ही किया जा सकता है । कोई भी दल परम्परागत तरीके से लड़कर उससे जीत नहीं सकता । सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव के अलावा कोई और विपक्षी नेता इस बात को समझ नहीं पा रहा है । वास्तव में समझ तो सभी को आ रहा है लेकिन भाजपा जैसी राजनीति करना किसी के बस में नहीं है । भाजपा और संघ इतने बड़े बन चुके हैं कि उनसे मुकाबला करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं रहा है । कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और सही मायनों में भाजपा के अलावा वहीं एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन सच्चाई यह है कि कांग्रेस धीरे-धीरे अपना प्रभाव खोती जा रही है । 

           बीएमसी चुनाव परिणाम का संदेश यह भी है कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा राजनीतिक धोखे का बदला बड़ी बेदर्दी से लेती है । पहले मोदी-शाह की जोड़ी ने एनसीपी और शिवसेना को दो टुकड़ों में तोड़ दिया और अब महाराष्ट्र में यह जोड़ी पूर्ण वर्चस्व पाने की ओर चल पड़ी है । इस लड़ाई को लड़ने के लिए मोदी के पास देवेंद्र फडणवीस के रुप में एक बड़ा योद्धा है । देखा जाए तो इस जीत ने देवेंद्र फडणवीस का कद देश की राजनीति में बहुत बड़ा कर दिया है । एनसीपी के दोनों धड़ो की ऐसी हालत हो गई है कि यहां से ऊपर उठना लगभग असंभव लग रहा है । इसके बावजूद उद्धव ठाकरे अपने पिता की विरासत बचाने की जंग भी जीतते नजर आ रहे हैं । देखने से लगता है कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना की सफलता  उद्धव ठाकरे की शिवसेना से बड़ी है लेकिन  एकनाथ शिंदे भाजपा से अलग होकर उद्धव ठाकरे के खिलाफ लड़ते हैं तो हालात बदल सकते हैं। उद्धव ठाकरे ने 65 सीटें जीतकर दिखा दिया है कि वो अब भी कमजोर नहीं हुए हैं लेकिन सच यह है कि अब वो बीएमसी से बाहर हो गए हैं। बीएमसी से ही उन्हें पार्टी चलाने की ऊर्जा मिल रही थी, अब उन्हें यह ऊर्जा मिलनी बंद हो जाएगी तो धीरे-धीरे उनकी पार्टी की ताकत कम होती जाएगी। अगर एकनाथ शिंदे और भाजपा का गठबंधन ऐसे ही बना रहता है तो महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्षी दलों के लिए मौके कम होते जाएंगे । एनसीपी की आर्थिक ताकत बहुत ज्यादा है, इसलिए वो अपना अस्तित्व बनाये रख सकती है लेकिन उद्धव ठाकरे के लिए आर्थिक कमजोरी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।  देखा जाए तो महाराष्ट्र की राजनीति बड़े जटिल मोड़ पर खड़ी हो गई है, यहां से कौन कहाँ जाएगा, कहना बड़ा मुश्किल है। कांग्रेस ने इन चुनाव में अपनी ताकत दिखा दी है।  कांग्रेस महाराष्ट्र में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन सकती है, क्योंकि उसे मुंबई के अलावा अन्य शहरों में अच्छी सीटें मिली हैं। अगर भाजपा और एकनाथ शिंदे का गठबंधन बना रहता है तो आने वाले समय में कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी पार्टी होगी। 

                    महाराष्ट्र से भाजपा ने अपने सहयोगियों और विरोधियों को बड़ा संदेश दिया है। जहां भाजपा ने अपनी पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना को ठिकाने लगा दिया है, तो वहीं दूसरी तरफ उसने एनसीपी के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। वैसे देखा जाए तो राजनीति में ऐसी उठापटक चलती रहती है लेकिन महाराष्ट्र से भारत की जनता ने विपक्ष को बड़ा संदेश दिया है। जनता ने बताया है कि सत्ता प्राप्त करना मुश्किल नहीं है लेकिन उसे संभालना मुश्किल है। शरद पवार ने उद्धव ठाकरे की सत्तालोलुपता का फायदा उठाकर कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र की सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन उसे संभाल नहीं पाए । उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद को पाना अपनी सफलता माना था लेकिन वो उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हुई है। उन्होंने अपने पिता से मिली राजनीतिक पूंजी अपनी एक गलती से गवां दी है। उनकी पार्टी सिर्फ बीएमसी से बाहर नहीं हुई है, बल्कि अन्य शहरों में भी कोई कमाल नहीं दिखा सकी। इसका मतलब है कि उनके शासन से जनता निराश थी, जिसका खामियाजा उन्हें विधानसभा के बाद निकाय चुनाव में भुगतना पड़ा है।

 वर्तमान विपक्ष की सबसे बड़ी कमी यही है कि वो मोदी की लाइन छोटी करने के चक्कर में अपनी लाइन ही भूल गया है। दूसरी तरफ मोदी के नेतृत्व में भाजपा विपक्ष को अनदेखा करते हुए अपनी बड़ी लाइन खींच रही है। विपक्ष भाजपा को कोसता रहता है लेकिन वो यह नहीं देखता कि जो राज्य उसके पास हैं, वो वहां ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा है, जिससे जनता में उसकी छवि मजबूत हो । भाजपा में कमियां ढूंढने की जगह विपक्ष अपने राज्यों में बेहतर काम करे तो जनता उसके साथ आ सकती है। विपक्ष द्वारा शासित राज्यों में से बंगाल, केरल और तमिलनाडु में इस साल चुनाव होने वाले हैं, लेकिन कहीं भी विपक्ष पूरे दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि वो जीतने वाला है। अजीब बात यह है कि इन तीनों राज्यों में भाजपा ने अभी तक एक बार जीत हासिल नहीं की है। तमिलनाडु और केरल में तो भाजपा विपक्ष में भी नहीं है। 

                   विपक्ष को यह समझना चाहिए कि वो अपने ही किले में घिरा हुआ महसूस क्यों कर रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी  पिछले 15 सालों लगातार सत्ता में हैं, लेकिन वो घबराई हुई हैं । तमिलनाडु में भाजपा मुख्य विपक्षी दल नहीं है लेकिन मुख्यमंत्री स्टालिन को भाजपा का डर सता रहा है। यही हालत केरल में है, जहां एक बार वामपंथी गठबंधन एलडीएफ और कांग्रेसनीत गठबंधन यूडीएफ सत्ता में आते रहे हैं। यह सिलसिला पिछली बार एलडीएफ ने सत्ता में वापिसी करके तोड़ दिया था लेकिन इस बार उसकी हालत खराब है । अजीब बात यह है कि एलडीएफ को सत्ता जाने का डर है लेकिन कांग्रेस को सत्ता मिलने का विश्वास नहीं है। इसकी वजह यह है कि भाजपा केरल में कुछ भी कर सकती है। भारतीय राजनीति में भाजपा ने एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया है। चाहे केंद्र हो या राज्य, भाजपा सत्ता बचाने की लड़ाई जीत जाती है। केंद्र में भाजपा ने तीसरी बार सरकार बनाई है और कई राज्यों में उसकी सरकारें कई कार्यकाल पूरे कर चुकी हैं । जहां विपक्षशासित राज्यों में विपक्ष को सत्ताविरोधी लहर का डर सताता है, वहीं दूसरी तरफ भाजपाशासित राज्यों में उसे सत्तापक्षी लहर का डर सताता है।

अगर जनता बार-बार भाजपा को सत्ता देती है तो इसके पीछे क्या वजह है, यह समझने को विपक्ष तैयार नहीं है। लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने के बावजूद भाजपा बहुमत जैसी मजबूत सरकार चला रही है। इसकी वजह यह है कि उसका गठबंधन आज भी मजबूत है जबकि दूसरी तरफ उसका मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों द्वारा बनाये गए ‘इंडिया’ गठबंधन का कुछ पता नहीं है। जो विपक्ष भाजपा से लड़ने के लिए एक ढंग का गठबंधन भी खड़ा नहीं कर सका, वो वोट चोरी का शोर मचाता है । विपक्ष की समस्या यह नहीं है कि उसे सत्ता नहीं मिलती बल्कि समस्या यह है कि जब उसे सत्ता मिल जाती है तो वो उसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाता है। लोकतंत्र में जनता की खुशी ही सब कुछ है, लेकिन विपक्ष से जनता खुश नहीं है। एक-एक करके भाजपा ने विपक्ष से उसके राज्यों को छीन लिया है लेकिन विपक्षी दलों को यह समझ नहीं आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है। अगर इस पर विपक्ष विचार करे तो उसे आगे का रास्ता मिल सकता है। 

राजेश कुमार पासी