सौरभ वार्ष्णेय
बिहार की राजनीति में हाल ही में हुए राज्सभा चुनाव ने कई राजनीतिक संकेत दिए हैं। इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के नेता राजद के लिए परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहे। सीटों के गणित और राजनीतिक समीकरणों के कारण जिस तरह का परिणाम सामने आया, उसने विपक्षी राजनीति में असहजता और भीतर की पीड़ा को उजागर कर दिया जिसे लेकर तेजस्वी यादव का दर्द छलक पड़ा? क्या विधायक इनके विश्वास पर खरे नहीं उतरे या भाजपा की रणनीति समझ नहीं पाये। सवाल उठ रहे है कि विपक्ष अब आत्ममंथन कब करेगा? बिहार जैसे राज्यों में तो स्थिति इतनी उलझी कि विपक्षी खेमे के कुछ विधायक मतदान के समय अनुपस्थित रहे और पूरा समीकरण बदल गया। यह घटना केवल चुनावी हार नहीं है बल्कि विपक्ष के भीतर मौजूद कमजोरियों का संकेत भी है। राज्यसभा जैसे चुनावों में गणित स्पष्ट होता है—यहां जीत का आधार संख्या और अनुशासन होता है। लेकिन जब अपने ही विधायक अनुपस्थित हों या क्रॉस-वोटिंग की आशंका पैदा हो जाए तो यह संगठनात्मक ढीलापन और नेतृत्व की कमजोरी को उजागर करता है। ऐसे में ५ राज्यों के चुनावों मे इसका असर पड़ेगा। इसलिए अगर विपक्ष अब भी एकजुट नहीं हुआ तो एकजुट का मतलब अपने ही विधायकों का विश्वास जीतना।
राज्यसभा चुनाव सामान्यत: विधानसभा की संख्या बल पर निर्भर होते हैं, लेकिन इस बार बिहार में क्रॉस-वोटिंग और राजनीतिक रणनीतियों ने परिणाम को अलग दिशा दे दी। सत्ता पक्ष की ओर से नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत दिखाई, जबकि विपक्षी खेमे में अपेक्षित एकजुटता नजर नहीं आई। यही कारण है कि परिणाम आने के बाद तेजस्वी यादव के समर्थकों में निराशा और असंतोष साफ दिखाई दिया। ज्ञात रहे कि तेजस्वी यादव पिछले कुछ वर्षों से खुद को बिहार में विपक्ष की सबसे मजबूत आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे युवाओं, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं। लेकिन राज्यसभा चुनाव के इस परिणाम ने यह संकेत दिया है कि केवल जनसभाओं और राजनीतिक भाषणों से सत्ता के समीकरण नहीं बदलते; इसके लिए ठोस राजनीतिक प्रबंधन और सहयोगियों की मजबूत प्रतिबद्धता भी जरूरी होती है। इस चुनाव ने एक और सच्चाई उजागर की—बिहार की राजनीति में अभी भी संख्या बल और रणनीति का महत्व सबसे अधिक है। यदि विपक्ष अपने भीतर की कमजोरियों को दूर नहीं करता, तो सत्ताधारी गठबंधन को चुनौती देना आसान नहीं होगा। तेजस्वी यादव के लिए यह हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। यह संदेश है कि विपक्ष को संगठित होने, विधायकों के बीच भरोसा मजबूत करने और राजनीतिक रणनीति को अधिक सटीक बनाने की जरूरत है।
राज्यसभा चुनावों में लगभग 37 सीटों पर मुकाबला हुआ जिनमें कई उम्मीदवार निर्विरोध भी चुने गए, जबकि कुछ राज्यों में सीधी टक्कर देखने को मिली।इन चुनावों ने यह साफ कर दिया कि सत्ता पक्ष जहां रणनीति और एकजुटता के साथ आगे बढ़ रहा है, वहीं विपक्ष कई जगहों पर बिखरा हुआ नजर आता है। लोकतंत्र में हार-जीत का सिलसिला चलता रहता है। लेकिन यह हार विपक्ष के लिए आत्ममंथन का अवसर भी बन सकती है। यदि तेजस्वी यादव इस अनुभव से सीख लेकर अपनी राजनीतिक रणनीति को मजबूत करते हैं, तो आने वाले समय में यह पराजय ही उनकी नई राजनीतिक ताकत का आधार बन सकती है। राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल सीटों की हार-जीत नहीं है; यह विपक्ष के सामने खड़ा आईना भी है। सवाल यही है—क्या विपक्ष इस आईने में खुद को देखने का साहस करेगा? यदि आत्ममंथन समय रहते नहीं हुआ तो आने वाले चुनावों में भी यही कहानी दोहराई जा सकती है।( युवराज फीचर्स )
सौरभ वार्ष्णेय