वीरेन्द्र सिंह परिहार
ऐसा माना जाता है कि आगामी 10 अप्रैल तक नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देंगे। ऐसी स्थिति में जो चर्चाए हैं – वह यह कि मुख्यमंत्री पद भाजपा के खाते में जायेगा। जदयू की ओर से नीतीश कुमार के बेटे निशांत समेत जदयू की ओर से दो उप मुख्यमंत्री होंगे। गृह विभाग और विधानसभा में स्पीकर पद को लेकर अभी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है पर ऐसा माना जाता है कि इन मामलों में यथास्थिति कायम रहेगी, यानी यह दोनो महत्वपूर्ण पद भाजपा के पास ही रहेंगे। यह सब बाते तो अपनी जगह पर हैं, महत्वपूर्ण यह कि यदि मुख्यमंत्री का पद भाजपा के खाते में जायेगा तो उसकी ओर से मुख्यमंत्री कौन ? चर्चाओं के अनुसार मुख्यमंत्री तो भाजपा का होगा पर नीतीश कुमार की सहमति इस मामले में आवश्यक रूप से होगी।
ऐसा माना जाता है कि इस मामले में बिहार के उप मुख्यमंत्री सग्राट चौधरी नीतीश कुमार के पसंद हैं और अपनी इस पसंद का इजहार नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं। अहम सवाल यह कि क्या बिहार का आगामी मुख्यमंत्री भाजपा का पसंद का नहीं, नीतीश कुमार की पसंद का होगा। यदि सम्राट चौधरी भाजपा की भी पसंद हों, तो बात और है लेकिन यदि ऐसा नहीं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नीतीश कुमार अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनवाकर प्रकारांतर से बिहार की सत्ता पर पूरी तरह पकड़ बनाये रखना चाहते हैं और इस तरह से कहीं-न-कहीं अपने बेटे को सत्ता के केन्द्र में बनाये रखना चाहेंगे।
उपरोक्त संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि आखिर में बिहार में कौन-सा नेता ऐसा है जो मुख्यमंत्री पद के लिये सर्वाधिक उपयुक्त हो। भाजपा के शुभचिंतकों और बहुत से राजनीतिक विशेषज्ञों की राय में भाजपा की दृष्टि से केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय सर्वाधिक उपयुक्त कहे जा सकते हैं। इसमें पहली बड़ी बात यह कि नित्यानंद राय भाजपा के काडर से आये हैं जबकि सम्राट चैधरी दूसरे दलों से होते हुये भाजपा में आये हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि यदि कोई बड़ी वजह न हो, या अपरिहार्य परिस्थिती न हो, तो ऐसे पदों पर काडर से आये नेताओं को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कोई हिमंता विश्वा शर्मा जैसा व्यक्तित्व हो तो बात अलग है पर हिमंता को भी असम में पाँच साल मंत्री बनाने के बाद और पूरी तरह उनकी क्षमता का आकलन करने के पश्चात ही वर्ष 2021 में भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया था।
सम्राट चौधरी को मुख्यंत्री बनाने के पक्ष में जो सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि इससे लव-कुश यानी कुर्मी-कुशवाहा का समीकरण मजबूत रहेगा। उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते यह समीकरण मजबूत था क्योंकि बिहार में पिछड़ी जातियों में यादवों के बाद कुर्मी-कुशवाहा की सर्वाधिक संख्या है। लेकिन बड़ी सच्चाई यह कि यादवों को छोड़कर सिर्फ कुर्मी-कुशवाहा ही नहीं अन्य पिछड़ी जातियाँ भी अधिसंख्य एनडीए के साथ है। ऐसा कहा जा सकता है कि यदि नित्यानंद राय को जो यादव समुदाय से आते हैं, यदि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया तो इससे कुर्मी-कुशवाहा समेत अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन एनडीए के प्रति कम हो सकता है, लेकिन ऐसा सोचना दूर की कौड़ी होगी। वस्तुतः यदि नित्यानंद राय को मुख्यमंत्री बनाया गया तो यादव समुदाय जो अभी मूलतः लालू यादव के साथ हैं, उसमें बड़ा विभाजन होकर एक बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ आ सकता है। ऐसा इसलिये भी कि अब बिहार में लालू और उनके परिवार के लिये सत्ता दूर की कौड़ी है. फिर लोग उगते सूरज को सलाम करते हैं। जहाँ तक प्रश्न इस बात की इससे दूसरी पिछड़ी जातियों के छिटकने का प्रश्न है तो लोगो को यह पता होना चाहिए कि ऐसा राजद के शासनकाल में यादवों के प्रभुत्व और एकाधिकार के चलते हुआ था।
वास्तविकता है कि जब भाजपा का मुख्यमंत्री यादव जाति से होगा तो इस बात की दूर-दूर तक संभावना नहीं कि उसमें राजनीति या प्रशासन में यादवो का एकाधिकार हो जायेगा जिसकी प्रतिक्रिया दूसरी पिछड़ी एवं अन्य जातियों में होगी। इस तरह से व्यापक जनसमर्थन और सैद्धांतिक दृष्टि से नित्यानंद राय बेहतर मुख्यमंत्री साबित हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में नीतीश कुमार को भी टांग नहीं अ़ड़ानी चाहिए और भाजपा को अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने देना चाहिए। आगे भाजपा कोई ऐसा भी फैसला कर सकती है जो राजस्थान की तरह अप्रत्याशित हो।
वीरेन्द्र सिंह परिहार