विश्ववार्ता

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रहते हुए भी युद्ध अपराध को ठेंगा क्यों दिखा देते हैं वीटो धारी देश? समझिए

कमलेश पांडेय

अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के दृष्टिकोण से युद्ध अपराध ऐसे कार्य हैं जो युद्ध के दौरान “अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून” के स्पष्ट नियमों का गंभीर उल्लंघन करते हैं, जैसे निर्दोष नागरिकों, अस्पतालों, स्कूलों या सुरक्षित उद्देश्यों पर जानबूझकर हमला, यातना, संघर्षनिरत व्यक्तियों के साथ अमानवीय व्यवहार, लड़ाई में निषिद्ध हथियारों का उपयोग आदि। लिहाजा, इन अपराधों के लिए राज्य नहीं बल्कि व्यक्ति अर्थात सैनिक, सेनाधिकारी, नेता वगैरह व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होते हैं। फिर भी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के रहते हुए भी वीटो धारी व उनके चहेते मजबूत देश युद्ध अपराध को ठेंगा क्यों दिखा देते हैं? यक्ष प्रश्न बना हुआ है। 

वास्तव में, कभी अमेरिका/यूरोप तो कभी रूस/चीन की ओर से या उनके शह पर युद्ध और युद्ध अपराध होते आये हैं। पुराने युद्धों की बात यदि भूला भी दी जाए तो अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध बिना कहे सबकुछ चुगली कर जाते हैं। जो हो रहा है वह भारत के वैश्विक वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवंतु सुखिनः की अवधारणा के बिल्कुल उलट है। इसलिए हमारी निर्गुट चिंताएं स्वाभाविक हैं और मानवीय पक्षों पर सदैव मुखर रहती आई हैं। इसलिए इस विषय को जानना समझना सभी भारतीयों के लिए जरूरी है।

उल्लेखनीय है कि युद्ध अपराध का अंतरराष्ट्रीय कानूनिक आधार अंतरराष्ट्रीय कानून में युद्ध अपराधों के लिए मुख्य स्रोत ये हैं: पहला, 1949 के जिनेवा समझौते और उनके अतिरिक्त प्रोटोकॉल, जो संघर्ष में नागरिकों, कैदियों, घायल सैनिकों आदि की सुरक्षा के नियम बताते हैं। दूसरा, रोम संविधि, जिससे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) को नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध और आक्रामकता के अपराधों पर व्यक्तिगत जवाबदेही स्थापित करने का अधिकार मिला है। देखा जाए तो शुद्ध “कानूनी ढांचे” की दृष्टि से यह बहुत मजबूत है- क्योंकि ये नियम आपको बताते हैं कि किस प्रकार के हमले अनुमत हैं, किसे निशाना बनाना वर्जित है और किस स्थिति में व्यक्ति फौरन दोषी ठहराया जा सकता है। 

जहां तक प्रभावशीलता और “वीटो देशों” की भूमिका की बात है तो व्यवहार में यह कानून कमजोर लगता है, क्योंकि:

आईसीसी (ICC) के अधिकार क्षेत्र की सीमा यहां अहम है। लिहाजा, यह तभी लागू होता है जब देश स्वयं रोम संविधि का पक्षकार है या सुरक्षा परिषद आईसीसी को संदर्भित करती है। चूंकि अमेरिका, रूस, चीन, भारत जैसे चार बड़े और शक्तिशाली देश खुद ही आईसीसी के सदस्य नहीं हैं, इसलिए इनके खिलाफ आसानी से मुकदमे नहीं चलते। यही वजह है कि इस कानून की जब तक धज्जियाँ उड़ती रहती हैं और देश/दुनिया के शांति लोग/देश असहाय और किंकर्तव्यविमूढ़ बने रहते हैं। 

चूंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति प्राप्त 5 स्थायी देश हैं, जबकि कुछ को 2-2 वर्षों के लिए अस्थायी तौर पर मनोनीत किया जाता है। लिहाजा यहाँ पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, यूके) अपने खिलाफ या अपने मित्र देशों के खिलाफ आईसीसी की जाँच या प्रतिबंध लागू करने वाले प्रस्तावों पर वीटो लगा सकते हैं, जिससे युद्ध अपराधों पर अंतरराष्ट्रीय प्रभावी कार्रवाई रुक जाती है। ऐसा कई बार हुआ बताया भी जाता है। यह मानवीयता की दृष्टि से उचित नहीं है। ऐसे मामलों में वीटो का दुरूपयोग बंद होना चाहिए।

सवाल है कि वीटो वाले देश युद्ध अपराधों की परवाह क्यों कम करते हैं? तो जवाब होगा कि राष्ट्रीय हित और राजनीतिक विशेषाधिकार के चलते ये देश ऐसा करते हैं और अपनी सुरक्षा, ऊर्जा, सैन्य आधिपत्य और क्षेत्रीय प्रभाव को अंतरराष्ट्रीय न्याय की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। जहाँ तक “दोहरा मापदंड” और अपवादवाद की बात है तो अपने या दोस्त देशों के संदभों में युद्ध नियमों का उल्लंघन अक्सर छोटा या गलत–समझ–से–स्पष्टीकृत बताया जाता है, जबकि प्रतिद्वंद्वी देशों पर इसी को युद्ध अपराध कहा जाता है। 

जहां तक संरचनात्मक अयोग्यता की बात है तो सुरक्षा परिषद की वर्तमान व्यवस्था ऐसी है कि शक्ति‑संतुलन और राजनीतिक व्यवहार अक्सर “कानून-प्राधिकरण” से आगे चलते हैं। इसलिए युद्ध अपराधों के लिए कोई भी स्थायी सदस्य आसानी से अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीकरण में सज़ा के जोखिम में नहीं आना चाहता। संक्षिप्त शब्दों में कहा जाए तो युद्ध अपराध का अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा सिद्धांततः मजबूत है पर शक्तिशाली राज्य वीटो और राजनीतिक बल के दम पर अपने खिलाफ उसकी सख़्त कार्यान्वयन को रोक देते हैं, जिससे यह “काग़ज़ पर मजबूत, मैदान में कमजोर” लगता है।

आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने अब तक कुल लगभग 10-15 व्यक्तियों को युद्ध अपराध या मानवता के विरुद्ध अपराधों के आरोप में दोषी ठहराया और सजा सुनाई है, जिसमें विशेष रूप से युद्ध अपराधों के लिए लगभग 9-12 दोषी ठहराए गए व्यक्ति शामिल हैं। सवाल है कि लगभग कितने युद्ध अपराधियों को सजा मिली? तो जवाब होगा कि अधिकांश विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार आईसीसी ने अब तक कुल 16–18 व्यक्तियों को ही किसी न किसी अपराध (नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध) में दोषी माना है, जिनमें से ज़्यादातर मामले युद्ध अपराधों से जुड़े हैं; जैसे बाल सैनिकों का इस्तेमाल, निर्दोष नागरिकों पर हमले, यातना, सांस्कृतिक संपत्ति का विनाश आदि। इनमें डीआर कांगो, उत्तरी युगांडा, लीबिया, आइवरी कोस्ट और यूगोस्लाविया‑संबंधित परियोजनाओं से जुड़े नेता‑सैन्य अधिकारी शामिल हैं। अतः युद्ध अपराधों के लिए आईसीसी ने लगभग 10-12 व्यक्तियों को दोषी ठहराकर सजा- आमतौर पर लंबी जेल की सजा- दी है, जबकि कुल दोषी ठहराए गए लोगों की संख्या लगभग 16-18 है, जिनमें युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध अपराध दोनों शामिल हैं।

आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने अब तक सीधे रूप से युद्ध अपराधों (war crimes) हेतु सजा देने के लिए जिन देशों के खिलाफ मामले चलाए हैं, उनमें मुख्य रूप से ये शामिल हैं:

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DR Congo), 

उत्तरी युगांडा (UPDF/Sudanese–LRA‑संबंधित),

माली, सीरिया‑संबंधित परिसर (जहाँ ICC ने युद्ध अपराधों के लिए जाँच/वारंट जारी किए), लीबिया, इराक/अफ़ग़ानिस्तान‑संबंधित जाँच (अमेरिकी सैनिकों–सहित; हालाँकि अभी तक व्यापक दोषसिद्धि नहीं हो पाई), इज़राइल और फिलिस्तीन‑संबंधित मामला (ग़ाज़ा युद्ध के लिए आईसीसी ने नेतन्याहू‑सहित नेताओं के खिलाफ युद्ध अपराध के वारंट दिए, लेकिन सजा अभी व्यावहारिक रूप से नहीं हुई। रूस (पुतिन और रक्षा मंत्री सहित के खिलाफ युद्ध अपराध के गिरफ्तारी वारंट; अभी तक व्यावहारिक दोषसिद्धि‑सजा नहीं)।

व्यावहारिक रूप से “सजा मिले वाले देश” के बारे में चर्चा की जाए तो सीधे तौर पर आईसीसी ने इन देशों के अधिकारी‑सेनाध्यक्षों/विद्रोही नेताओं को युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराकर सजा (आमतौर पर जीवन‑दंड या लंबी कैद) दी है: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (Congolese नेते, Bosco Ntaganda सहित)– युद्ध अपराधों (बच्चों का सैनिक इस्तेमाल, निर्दोष नागरिकों पर हमले) के लिए सजा सुनाई गई।  उत्तरी युगांडा (LRA नेता Dominic Ongwen) – बच्चों का सैनिक रूप से इस्तेमाल, निर्दोष नागरिकों का नरसंहार, यौन अपराध, युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराकर सजा। लीबिया (Musab al‑Mismari सहित कुछ व्यक्ति) – युद्ध अपराधों और मानवता के विरुद्ध अपराधों से जुड़े लिए दोषी ठहराव और लंबी कैद। माली (Al‑Mahdi मामला) – युद्ध अपराध के रूप में सांस्कृतिक–धार्मिक संपत्ति के विध्वंस के लिए पहली बार ICC ने दोषी ठहराया और सजा दी (हालाँकि यह मुख्य रूप से संस्कृति‑विनाश का मामला था)। 

संक्षेप में व्यावहारिक सजा मिलने वाले देश: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, उत्तरी युगांडा (LRA‑संबंधित माली और दक्षिण‑सूडान‑संबद्ध क्षेत्रों से जुड़ी घटनाएँ), लीबिया,

माली (सांस्कृतिक संपत्ति के विनाश का युद्ध अपराध) जैसे

युद्ध अपराधों के लिए वारंट/जाँच जारी है पर अभी तक व्यावहारिक दोषसिद्धि यानीसजा नहीं मिलने वाले मामलों में इज़राइल/फिलिस्तीन (ग़ाज़ा युद्ध), रूस (यूक्रेन युद्ध; पुतिन‑सहित नेताओं के खिलाफ वारंट), अफ़ग़ानिस्तान/इराक‑संबद्ध अमेरिकी सैनिकों पर जाँच (अभी तक दोषसिद्धि नहीं) यानी ICC ने अब तक अफ़्रीका के DR कांगो, उत्तरी युगांडा‑LRA, लीबिया और माली के अधिकारियों/नेताओं को युद्ध अपराधों के लिए वास्तविक सजा दी है जबकि इज़राइल‑रूस जैसे शक्तिशाली राज्यों के खिलाफ अभी तक “वारंट” तक ही सीमित रहा है, क्योंकि उनकी गिरफ़्तारी राजनीतिक और वीटो‑संरचनाओं के कारण ज़मीन पर मुमकिन नहीं हो पाई है। 

आईसीसी (अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय– ICC) के फैसलों को लागू न करने या इनकार करने वाले देशों में मुख्य रूप से वे शक्तिशाली राज्य शामिल हैं जो खुद ICC के सदस्य नहीं हैं या अपने अधिकारियों को इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने की नीतियाँ अपनाते हैं।  वे देश जिन्होंने आम तौर पर ICC फैसलों को लागू नहीं किया। अमेरिका (USA) – ICC का सदस्य नहीं है, रोम संविधि को अनुमोदित नहीं किया; अपने नागरिकों/सैनिकों को ICC के अधिकार क्षेत्र से अलग रखने पर अड़ा है और ICC के वीजा, प्रतिबंध‑आदेश जैसे उपकरणों को चुनौती देता रहा है। रूस (Russia) – ICC का सदस्य नहीं है; यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में ICC ने पुतिन और रक्षा मंत्री जैसे नेताओं के खिलाफ युद्ध अपराध के गिरफ्तारी वारंट जारी किए, लेकिन रूस ने इन वारंटों को “अवैध” घोषित करके उन पर अमल नहीं किया। चीन (China) – ICC का सदस्य नहीं, रोम संविधि को हस्ताक्षर नहीं किया; अपने अधिकारियों को ICC से अलग रखता है और आधिकारिक तौर पर ICC के कार्यों पर संदेह जताता रहा है। इज़राइल (Israel) – ICC का सदस्य नहीं, रोम संविधि को मान्यता नहीं देता; ग़ाज़ा युद्ध के संदर्भ में ICC ने नेतन्याहू और अन्य नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए, लेकिन इज़राइल ने इन्हें अस्वीकार कर दिया और ICC को “एकतरफा व राजनीतिक” बताया है। भारत (India) – ICC का सदस्य नहीं, रोम संविधि को लागू नहीं किया; अपने सैनिकों और अधिकारियों का ICC अधिकार क्षेत्र से बाहर रखने की नीति रखता है, इसलिए व्यावहारिक रूप से ICC के फैसलों का भारत पर असर नहीं होता। 

लिहाजा,अन्य देशों के रुख में उतार‑चढ़ाव होता रहता है।

कुछ देश रोम संविधि के सदस्य हैं, लेकिन ICC के विशिष्ट फैसलों का मनमाने तरीके से अनुपालन या अनुपालन में ढिलाई दिखाते हैं (जैसे युद्ध अपराधों के लिए जारी वारंटों पर गिरफ़्तारी न करना), पर तकनीकी रूप से इन्हें “सदस्य रहते हुए फैसला लागू न करने वाले” कहा जा सकता है।

संक्षेप में कहा जाए तो व्यापक रूप से ICC फैसलों को लागू न करने वाले देश: अमेरिका, रूस, चीन, इज़राइल, भारत — ये अधिकांशतः रोम संविधि/ICC सदस्यता ही नहीं लेते, इसलिए बाध्य भी नहीं होते। छोटे ICC‑सदस्य देश भी कभी‑कभी वारंट या आदेशों पर अमल टालते हैं पर यह अलग‑अलग राजनीतिक और क्षेत्रीय वजहों से होता है, न कि स्पष्ट “सिद्धांत‑आधारित अस्वीकरण”। 

जानिए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के सदस्य नहीं हैं कौन‑कौन देश

अभी तक दुनिया के लगभग 124 देश ICC की रोम संविधि पर हस्ताक्षर या अनुमोदन कर चुके हैं (अर्थात् ICC के सदस्य देश) जबकि कुल लगभग 193–195 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश हैं; इसलिए कई बड़े और छोटे देश ICC सदस्य नहीं हैं। इनमें प्रमुख देश ये हैं जो अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के सदस्य नहीं हैं:- अमेरिका (USA)– रोम संविधि पर हस्ताक्षर तो किया था, लेकिन अनुमोदन नहीं किया और खुद को ICC के अधिकार क्षेत्र से अलग रखने की नीति चलाता है। चीन (China)– रोम संविधि पर हस्ताक्षर या अनुमोदन नहीं किया है। रूस (Russia)– 2000 में हस्ताक्षर किया था, लेकिन राष्ट्रीय अनुमोदन नहीं किया; बाद में रोम संविधि से भी पीछे हट गया।

भारत (India)- ICC/रोम संविधि का सदस्य नहीं, अपने अधिकारियों को ICC से अलग रखने की नीति रखता है।

इज़राइल (Israel) – रोम संविधि पर हस्ताक्षर नहीं किया और ICC के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं देता।

तुर्की (Turkey), भूटान, नेपाल, अरब इमारात, कतर, अमेरिकी द्वीप, अधिकांश मध्य‑पूर्वी और बहुत‑से दक्षिण‑पूर्व एशियाई छोटे देश भी ICC के सदस्य नहीं हैं (या रोम संविधि से जुड़े हैं नहीं)।

जहां तक बाक़ी देश की बात है तो छोटे देशों को छोड़कर ज़्यादातर यूरोप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के देश आईसीसी के सदस्य हैं; जो नहीं हैं, वे या तो अपनी सुरक्षा‑राष्ट्रीय हित की वजह से अनुमोदन से बचते हैं या रोज़मर्रा की नीतिगत रियायतों के कारण आईसीसी से जुड़ने में देर करते हैं।

कमलेश पांडेय