राजनीति

राष्ट्रपति, पश्चिम बंगाल सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं कर देती ?


सौरभ वार्ष्णेय


भारत में जब किसी राज्य में कानून-व्यवस्था या राजनीतिक टकराव को लेकर विवाद बढ़ता है तो अक्सर यह सवाल उठता है कि केंद्र सरकार या राष्ट्रपति उस राज्य की सरकार को क्यों नहीं हटा देते? हाल के समय में भी पश्चिम बंगाल की स्थिति को लेकर ऐसी चर्चाएँ सुनाई देती हैं लेकिन भारतीय संविधान में राज्य सरकार को बर्खास्त करना इतना सरल या मनमाना निर्णय नहीं है। इसके लिए स्पष्ट संवैधानिक प्रक्रिया और ठोस कारण आवश्यक होते हैं। अभी हाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 7 मार्च, 2026) को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में अंतर्राष्ट्रीय संथाल परिषद द्वारा आयोजित 9वें अंतर्राष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में भाग लेने गईं थीं जहां कई अव्यवस्थायें देखने को मिलीं जिसे लेकर राष्ट्रपति ने अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इस पर विपक्ष का कहना था कि वहां चुनाव है इसलिए भारतीय जनता पार्टी संवैधानिक पदों का भी राजनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं जबकि राष्ट्रपति का पद राजनीति से बहुत ऊपर है। अब बात निकली है तो बहुत दूर तक जाना तो तय है।


यह मुद्दा इतना गर्म हो गया था कि दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राष्ट्रपति जी के अपमान और संथाल संस्कृति के साथ किए गए लापरवाही भरे व्यवहार की कड़ी निंदा करते हुए इस घटना को शर्मनाक बताते हुए कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।  जो भी लोकतंत्र और आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में विश्वास करता है, वो इस घटना से बहुत निराश है। प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति जी खुद आदिवासी समुदाय से हैं, और उन्होंने जो दर्द और पीड़ा व्यक्त की है उसने भारत के लोगों को बहुत दु:खी किया है। पश्चिम बंगाल में  टीएमसी सरकार ने सारी हदें पार कर दी हैं और राष्ट्रपति के इस अपमान के लिए उनका प्रशासन जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह भी उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि संथाल संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषय के साथ पश्चिम बंगाल सरकार इतना लापरवाही भरा व्यवहार कर रही है। इस कार्यालय की पवित्रता का हमेशा सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि पश्चिम बंगाल सरकार और टीएमसी को सद्बुद्धि आएगी।


अब ऐसे में भारत की राष्ट्रपति, वर्तमान में द्रोपदी मुर्मु, देश के संवैधानिक प्रमुख हैं। हालांकि वे अधिकांश मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही निर्णय लेती हैं। किसी राज्य की सरकार को हटाने का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत आता है, जिसे आम तौर पर ‘राष्ट्रपति शासन’ कहा जाता है। इसका प्रयोग तभी किया जा सकता है जब यह साबित हो जाए कि राज्य में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया है। पश्चिम बंगाल में वर्तमान में सरकार का नेतृत्व मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी कर रही हैं। यदि राज्य में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक विफलता या अन्य गंभीर स्थिति की शिकायतें होती भी हैं, तब भी केवल आरोपों या राजनीतिक मतभेद के आधार पर सरकार को बर्खास्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए राज्यपाल की रिपोर्ट, केंद्र सरकार का आकलन और अंतत: संसद की मंजूरी जैसी प्रक्रियाएँ जरूरी होती हैं।


इतिहास बताता है कि अनुच्छेद 356 का कई बार राजनीतिक कारणों से दुरुपयोग हुआ है। इसी कारण एसआर बोम्माई वर्सिस यूनियन ऑफ इंडिया  के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट इंडिया ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेगा और इसे मनमाने तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद राज्यों की चुनी हुई सरकारों को हटाना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है।


लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई सरकार को हटाने का सबसे बड़ा अधिकार अंतत: जनता के पास ही होता है। यदि किसी राज्य की सरकार से असंतोष है, तो उसका समाधान चुनाव के माध्यम से किया जाता है। इसलिए केवल राजनीतिक विवाद या आरोपों के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा सीधे राज्य सरकार को बर्खास्त करना न तो संवैधानिक रूप से उचित है और न ही लोकतांत्रिक परंपरा के अनुकूल। इस प्रकार, पश्चिम बंगाल सरकार को हटाने का सवाल केवल राजनीतिक इच्छा का नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का विषय है। जब तक यह साबित न हो जाए कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है, तब तक किसी भी सरकार को बर्खास्त करना संभव नहीं होता।


अब सवाल उठता है कि पश्चिम बंगाल सरकार पर नाराज़ होने की चर्चा मुख्यत: राज्य में कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक टकराव और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े मुद्दों के कारण उठती रही है। हाल के समय में कुछ घटनाओं ने इस तनाव को और बढ़ाया है। पश्चिम बंगाल में कई बार राजनीतिक हिंसा, चुनावी टकराव और साम्प्रदायिक तनाव की घटनाएँ सामने आती रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में केंद्र सरकार और संवैधानिक संस्थाएँ राज्य सरकार से सख्त कार्रवाई की अपेक्षा करती हैं। जब स्थिति गंभीर मानी जाती है तो राष्ट्रपति तक इसकी रिपोर्ट पहुँचती है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी और केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं—जैसे केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, राज्यपाल के साथ विवाद, और नीतिगत फैसले। इन राजनीतिक टकरावों से भी स्थिति तनावपूर्ण बनती है।


पश्चिम बंगाल के राज्यपाल समय-समय पर राज्य की स्थिति को लेकर केंद्र को रिपोर्ट भेजते रहे हैं। यदि रिपोर्ट में प्रशासनिक विफलता या गंभीर कानून-व्यवस्था की समस्या बताई जाती है, तो राष्ट्रपति का ध्यान उस ओर जाता है। राष्ट्रपति का काम सीधे गुस्सा दिखाना नहीं होता बल्कि संविधान की रक्षा करना होता है। अगर किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था बिगडऩे की आशंका हो तो राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर कदम उठा सकते हैं (जैसे अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन)।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नाराजग़ी की चर्चा असल में पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक संघर्ष और केंद्र-राज्य संबंधों के तनाव से जुड़ी है हालांकि राष्ट्रपति स्वयं राजनीतिक बयान कम ही देती हैं और अधिकतर कार्रवाई संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ही होती है।

सौरभ वार्ष्णेय