राजनीति

मोहन भागवत के बयान पर इतना बवाल क्यों

राजेश कुमार पासी

मोहन भागवत के एक बयान पर बवाल मचा हुआ है जबकि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिसको लेकर इतना बवाल किया जा रहा है । मंगलवार को मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में कई मुद्दों पर अपनी राय रखी थी । उन्होंने कहा कि मुसलमानों की जड़े भी इसी भूमि से जुड़ी हुई हैं । मुस्लिम यहीं के पूर्वजों की संतान हैं, इसलिए समाज को बांटने की जगह जोड़ने की जरूरत है । उन्होंने कहा कि हम मुस्लिम हैं, ईसाई हैं लेकिन अरब या तुर्क नहीं हैं और न ही यूरोपियन हैं । हम भारत के हैं, हमारे पूर्वज भारतीय हैं । उन्होंने कहा कि ये बात जब उनका नेतृत्व करेगा, तब सब ठीक हो जाएगा । हिन्दू समाज आतुरता के साथ इसकी राह देख रहा है । उन्होंने कहा कि यहां सब हिन्दू हैं. हमें उनकी घरवापसी करवानी है ।  उन्होंने घरवापसी का जिक्र करते हुए कहा कि यह कोई तात्कालिक प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक संवाद और समझ के जरिये धीरे-धीरे होने वाला कार्य है ।

जनसंख्या के मुद्दे पर भागवत ने कहा कि हिन्दू समाज में घटती जन्मदर चिंता का विषय है और उनका मानना है कि एक परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए ताकि संतुलन बना रहे । उन्होंने युवाओं से अपील  करते हुए कहा कि उन्हें विवाह के बाद परिवार के विस्तार पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । उन्होंने कहा कि समाज में संवाद और सहयोग दोनों ओर से होना चाहिए । उन्होंने जाति व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा कि समाज को जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर सोचना चाहिए । वर्षों से इसे समाप्त करने के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन यह प्रवृत्ति अभी भी बनी हुई है । उन्होंने कहा कि मुगल और अंग्रेजी शासन की लंबी अवधि के बावजूद भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा मजबूत बनी रही, इसलिए आज भी समाज को आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना चाहिए । उन्होंने किसी किस्म की हिंसा की बात नहीं की और न ही कहा कि देश के सभी मुसलमानों को जबरदस्ती हिन्दू बना दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सब कुछ संवाद से किया जाएगा। घरवापसी की बात करना इतना उत्तेजक कैसे हो गया कि देश का पूरा मुस्लिम समुदाय उबल पड़ा, ये समझना मुश्किल हो रहा है। संघ प्रमुख भागवत के बयान की प्रतिक्रिया में जो बयान आएं हैं, बेहद चिंताजनक हैं।  

                मोहन भागवत के बयान पर पूरे देश में घमासान मच गया है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भागवत के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिन्द शुरू से ही ऐसी साम्प्रदायिक और नफरत फैलाने वाली सोच की विरोधी रही है। जब तक यह जिंदा रहेगी, इसका विरोध करती रहेगी । सवाल यह है कि क्या मदनी यह मानने को तैयार हैं कि हिंदुओं को मुस्लिम बनाना गलत है, ये शबाब का काम नहीं है। मुस्लिम तो मानते हैं कि अगर वो किसी हिन्दू को मुस्लिम बना देते हैं तो अल्लाह उन्हें जन्नत नसीब करता है। जब धर्मपरिवर्तन की मुहिम में जुटे मुस्लिमों से कहा जाता है कि वो ये काम क्यों करते हैं तो उनका यही कहना होता है कि उनका धर्म उन्हें ये काम करने के लिए कहता है। घर वापसी तो धर्मपरिवर्तन करके हिन्दू से मुस्लिम बने लोगों को वापस अपने धर्म में लाने का काम है । अगर ये साम्प्रदायिक और नफरत फैलाने वाला काम है तो ये काम तो मुस्लिम पिछले एक हज़ार सालों से करते आ रहे हैं।

 जब अरबों ने इस देश पर हमला शुरू किया तो इस देश में कोई मुस्लिम नहीं था। अगर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की मुस्लिम आबादी को गिना जाए तो ये संख्या लगभग 80 करोड़ बनती है। क्या मदनी इसे झुठला सकते हैं कि इन सभी लोगों के पूर्वज हिन्दू नहीं थे। भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम कुछ भी कहें, लेकिन सच तो यह है कि अरब इस क्षेत्र के मुस्लिमों को मुस्लिम नहीं मानते हैं। वो इन्हें कनवर्टेड हिन्दू कहते हैं। जहां इस्लाम पैदा हुआ, वो ये सच जानते हैं लेकिन भारतीय मुस्लिम सच को स्वीकार नहीं करना चाहते।  मदनी ने आगे कहा कि जो 70 साल में कहने वाले पैदा नहीं हुए, वो बातें आज कही जा रही हैं कि 20 करोड़ मुस्लिमों और 6 करोड़ ईसाईयों की घरवापसी की जाएगी। ऐसा लगता है कि उन्होंने ही अपनी मां का दूध पिया है, और किसी ने नहीं पिया है। मदनी ने कहा कि सच यह है कि जो आवाज देश को तबाही, बर्बादी और आपस में दुश्मनी की तरफ ले जाये, वह देश के प्रति वफादारी की आवाज नहीं हो सकती। 

             मदनी ने आगे कहा कि देश में नफरत की आग भड़कायी जा रही है, हिंसा का माहौल बना हुआ है और दिनदिहाड़े लिनचिंग की घटनाएं हो रही हैं। गाय के नाम पर बेगुनाह लोगों को मारा जा रहा है। इसके अलावा मुस्लिम समाज के बहुत से लोगों ने मोहन भागवत के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। ओवैसी के नेता ने भागवत को कसाब बता दिया है। मदनी ने कहा है कि भागवत के बयान पर सरकार चुप है, इसका मतलब है कि सरकार उनके साथ है। कितनी अजीब बात है कि मोहन भागवत ने जितने शांत मन से अपनी बात रखी, उनका विरोध करने वाले उतने ही उग्र हो रहे हैं। समस्या यह है कि भागवत ने शांति के साथ जो सच कहा है, उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम इस देश के हैं, वो अरब या तुर्क नहीं हैं। सच यह है कि भारत का मुस्लिम खुद भारतीय से ज्यादा अरब और तुर्क मानता है। पाकिस्तान ने कट्टरता का अंजाम देख लिया है तो वहां ये आवाज उठ रही है कि हम भारतीय हैं, अरब या तुर्क नहीं हैं। भारत में लूटमार और कत्लेआम करने वाले विदेशी आक्रमणकारियों को भारतीय मुस्लिम अपना हीरो मानते हैं। जिन लोगों ने हिन्दू समाज का भयंकर नरसंहार किया, उन्हें मुस्लिम अपना हीरो मानेंगे, तो भाईचारा कैसे पैदा होगा। जहां इस्लाम पैदा हुआ, वहां ईद पर गाय की कुर्बानी नहीं दी जाती है लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की जिद्द होती है कि वो गाय की कुर्बानी देंगे। वास्तव में यह काम धार्मिक उद्देश्य से नहीं किया जाता, बल्कि इसलिए किया जाता है, क्योंकि हिंदू गाय की पूजा करते हैं। इस्लाम के पवित्र त्यौहार को हिंदुओं को अपमानित करने का साधन बनाया जाता है। जिस समुदाय के साथ भाईचारा निभाने की बात कही जा रही है, उसे मौका मिलते ही अपमानित किया जाता है। गाय के नाम पर हत्या की बात कही जा रही है लेकिन गाय हत्या रोकने की कोशिश क्यों नहीं की जाती। मुस्लिम धर्मगुरु क्यों नहीं कहते कि अगर हिन्दू समुदाय गाय की पूजा करता है तो हम उसकी हत्या नहीं करेंगे।

               भारत में इस्लामिक शासन के दौरान समय-समय पर हिन्दू समाज को धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया है। उन्हें धर्मपरिवर्तन और मौत में से एक का चुनाव करने के लिए कहा गया और करोड़ों हिंदुओं को मौत चुननी पड़ी। करोड़ों हिंदुओं ने अपनी जान बचाने के लिए धर्मपरिवर्तन कर लिया।  मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं के सामने तीसरा विकल्प जजिया कर का रखा था, जो मुस्लिम नहीं बनते थे, उन्हें जजिया देना पड़ता था। अजीब बात है कि जिन लोगों ने तलवार के डर से या कर से बचने के लिए धर्मपरिवर्तन कर लिया, वो आज सारे हिंदुओं को मुस्लिम बनाने की मुहिम चला रहे हैं । जो धर्म मूर्तिपूजकों के लिए कहता है कि उन्हें जीने का अधिकार नहीं है, उसे शांति का धर्म कहा जाता है। मोहन भागवत ने तो सिर्फ इतना कहा है कि जो लोग धर्म छोड़ कर चले गए हैं, उनकी घरवापसी करनी होगी और  धर्म में लाने के बाद उनका ध्यान रखना होगा। उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है और न ही हिंसक भाषा का इस्तेमाल किया है।

अगर किसी को हिन्दू से मुस्लिम बनाया जा सकता है तो मुस्लिम से हिन्दू बनाने में क्या परेशानी है। 800 साल  राज करने का दावा करने वाले मुस्लिम आज आरक्षण की लाइन में लगे हुए हैं। जिन दलितों-आदिवासियों और पिछड़ों का कई हज़ार तक शोषण-उत्पीड़न किया गया, उनको आरक्षण देना समझ आता है लेकिन जिन्होंने 800 साल तक हिंदुओं का शोषण किया, उन्हें आरक्षण की जरूरत क्यों है। जो लोग शासन में रहकर भी आगे नहीं बढ़ पाए, वो अपने पिछड़ेपन के लिए दूसरों को दोष देते हैं। भागवत ने तो सिर्फ इतना कहा है कि वो लोग यह स्वीकार कर ले कि उनके पूर्वज हिन्दू थे । इससे सारी समस्या खत्म हो जाएगी। घरवापसी से उनका ये मतलब नहीं है कि सारे मुस्लिम हिन्दू बन जाएं। वो सिर्फ चाहते हैं कि भारतीय मुस्लिम खुद को भारतीय मान लें और ये स्वीकार कर लें कि वो इसी भूमि की संतान हैं। वो नफरत की नहीं, प्रेम की भाषा बोल रहे हैं, लेकिन उनकी भाषा की प्रतिक्रिया में सब तरफ से जहर उगला गया है। उन्होंने जोड़ने की बात की है लेकिन उनके जवाब में तोड़ने की बात की जा रही है। देश को हिंसा की आग में झोंकने की धमकी दी जा रही है। उन्होंने संवाद और सहयोग की बात की है, इसमें क्या परेशानी है, ये बताया जाना चाहिए। क्या मुस्लिम धर्मगुरु दोनों समुदायों में संवाद और सहयोग नहीं चाहते, उनकी प्रतिक्रिया से लगता है कि ये लोग दोनों समुदायों में संघर्ष ही चाहते हैं। दोनों समुदायों में संघर्ष का अंजाम देश एक बार भुगत चुका है, ये मौका दोबारा नहीं आना चाहिए, लेकिन मुस्लिम धर्मगुरु देश को उसी तरफ धकेल रहे हैं। 

राजेश कुमार पासी