राजेश कुमार पासी
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर होता है। राष्ट्रपति के चुनाव में राजनीति होती है लेकिन जब राष्ट्रपति का चुनाव हो जाता है तो वो पूरे देश का राष्ट्रपति होता है । राजनीतिक दल भी उसे किसी दल विशेष से नहीं जोड़ते हैं। हमारे देश के संविधान ने राष्ट्रपति को सबसे ऊपर रखा है और वो एक तरह से राष्ट्र प्रमुख माना जाता है। देश का पूरा प्रशासन उनके ही नाम पर चलाया जाता है जबकि उनका प्रशासन में कोई दखल नहीं होता। संविधान में वर्णित राष्ट्रपति की शक्तियां, वास्तव में प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की होती हैं। इसके बावजूद राष्ट्रपति के पास कई अधिकार हैं जहां वो अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकते हैं। वो संसद द्वारा पास किये गए विधेयक को दोबारा विचारार्थ हेतु वापस भेज सकते हैं । इसके अलावा जब संसद में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता है तो राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ जाती हैं। वैसे देखा जाए तो ज्यादातर मामलों में राष्ट्रपति कैबिनेट की रबर स्टैंप के रूप में ही काम करते हैं।
दूसरी तरफ सच है कि राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है । प्रोटोकॉल के अनुसार राष्ट्रपति ही देश का शासक होता है. इसी आधार पर राष्ट्रपति को सम्मान दिया जाता है। जब राष्ट्रपति का प्रशासन में सीधा दखल नहीं है तो उन्हें राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। जब से द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति बनी हैं, उनका कई बार अपमान किया जा चुका है। कई बार ऐसा महसूस होता है कि उनका इस पद पर आना कुछ लोगों को हजम नहीं हो रहा है। आदिवासी समाज से आने वाली द्रोपदी मुर्मू देश की पहली राष्ट्रपति हैं। देखा जाए तो मोदी सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति बनाकर देश के आदिवासी समाज को सम्मानित करने का काम किया है। देश का आदिवासी समाज इस बात पर गर्व करता है कि उनके समुदाय की एक महिला इस समय देश के सर्वोच्च पद पर आसीन है। एक तरह से ये भी आदिवासियों के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है।
राष्ट्रपति पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए लेकिन पिछले कुछ समय से उन पर भी राजनीति की जा रही है। अभी तक केवल उनका मजाक बनाया गया है, लेकिन ममता बनर्जी ने तो उनका और उनके पद का जबरदस्त अपमान किया है। जब राष्ट्रपति एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने बंगाल गयी थीं तो ममता बनर्जी एसआईआर के खिलाफ धरना दे रही थी। वो राष्ट्रपति के साथ कार्यक्रम में शामिल नहीं हुई और न ही उनकी अगवानी की। इसके अलावा उन्होंने अपने किसी मंत्री को भी उनकी अगवानी करने के लिए भेजा। देखा जाए तो ये राष्ट्रपति के आगमन पर किये जाने वाले प्रोटोकॉल का बड़ा उल्लंघन है।
ममता बनर्जी अपने अक्खड़पन और जिद्दी स्वभाव के लिए जानी जाती हैं, लेकिन राष्ट्रपति के साथ उनका व्यवहार समझ से परे है। ऐसा लगता है कि एसआईआर का विरोध करते-करते वो इतना बौखला गईं हैं कि उन्हें सही और गलत का पता ही नहीं चल रहा है। उनकी बौखलाहट की वजह यह है कि एसआईआर की प्रक्रिया को रोकने की उनकी सारी कोशिशें बेकार हो गयी हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट न्यायिक अधिकारियों के जरिये इस प्रक्रिया को पूरा करने में लगा हुआ है। ममता बनर्जी अपने आपको असहाय महसूस कर रही हैं, इसलिए धरना देने बैठी और फिर खुद ही उठ गईं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने बंगाल के दार्जलिंग में गयी थी, इसके बाद वो विद्यानगर गईं और उन्होंने वहां सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी को इस कार्यक्रम में मेरे साथ होना चाहिए था। उन्होंने कहा, “मैं बंगाल की बेटी हूँ, फिर भी मुझे यहां आने की अनुमति नहीं है। ममता मेरी बहन जैसी हैं, पता नहीं, शायद वो मुझसे नाराज हैं। शायद इसलिए मुझे वहां जाना पड़ा। कोई बात नहीं, मुझे इस बात का कोई गुस्सा या नाराजगी नहीं है।” महामहिम राष्ट्रपति इस तरह से अपनी नाराजगी जाहिर नहीं करती हैं. वो बेहद शांत स्वभाव की हैं। अगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की है तो इसका मतलब है कि उन्होंने खुद को अपमानित महसूस किया है। उन्होंने अपना कार्यक्रम स्थल बदले जाने पर मूल स्थान का दौरा किया था, इसके बाद उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की। कार्यक्रम का आयोजन विद्यानगर में किया जाना था लेकिन उसका स्थान बदलकर बागडोगरा के गुसाईपुर में कर दिया गया ।
अजीब बात यह है कि राष्ट्रपति के कार्यक्रम को पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी जिसके कारण स्थान बदलना पड़ा। राष्ट्रपति को गुस्सा यह था कि आयोजन स्थल बहुत छोटा और दूर था जहां लोग पहुंच नहीं पाए। राष्ट्रपति के द्वारा नाराजगी जाहिर करने के बाद भाजपा ने टीएमसी पर हल्ला बोल दिया है। भाजपा ने इसे राष्ट्रपति का अपमान बताते हुए कहा है कि एक आदिवासी समाज से आने वाली राष्ट्रपति का अपमान किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट करके इस मुद्दे को उठाया है और टीएमसी को इस अपमान के लिए जिम्मेदार ठहराया है। इस मुद्दे ने भाजपा को बंगाल के हालात पर बोलने का मौका दे दिया है। भाजपा ममता बनर्जी की विरोधी पार्टी है, उसे हटा भी दिया जाए तो मुद्दा छोटा नहीं होता। ममता बनर्जी ने जिस तरह से महामहिम राष्ट्रपति को जवाब दिया है, उससे पता चलता है कि उनका अपमान अंजाने में नहीं हुआ है, बल्कि जानबूझकर किया गया है। उन्होंने एक फ़ोटो दिखाकर कहा है कि राष्ट्रपति को तब अपमान महसूस नहीं हुआ था । वास्तव में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ पुरस्कार देने राष्ट्रपति महोदया उनके घर गईं थीं। जब उन्होंने खड़े होकर आडवाणी जी को पुरस्कार दिया तो वो बैठे हुए थे और वहां मोदी जी भी उनकी बगल में बैठे थे। इसके अलावा भी उस समय वहां कई नेता उपस्थित थे, जो वहां कुर्सियों पर बैठे हुए थे। ममता बनर्जी के कहने का मतलब यह था कि आप राष्ट्रपति होकर वहां खड़ी थी और वहां सब बैठे हुए थे लेकिन तब आपको अपमानित महसूस नहीं हुआ।
वास्तव में ममता बनर्जी जानबूझकर अंजान बन रही हैं। भारत रत्न या अन्य पुरस्कार देते समय राष्ट्रपति खड़े रहते हैं और पुरस्कृत व्यक्ति भी खड़े होकर पुरस्कार ग्रहण करता है। उन दोनों के अलावा सब बैठे रहते हैं, ये भी एक प्रोटोकॉल है। जब पुरस्कृत व्यक्ति खड़े होने में असमर्थ होता है, तब भी राष्ट्रपति खड़े होकर उसे पुरस्कृत करते हैं। राष्ट्रपति भवन में भी कई बार देखा गया है, जब पुरस्कृत व्यक्ति चलकर उनके पास नहीं जा सकते तो राष्ट्रपति खुद चलकर उनकी कुर्सी पर ही पुरस्कार प्रदान करते हैं। ये फोटो दिखाकर ममता बनर्जी ने साबित कर दिया कि उन्होंने जानबूझकर उनका अपमान किया है। वो दिखाना चाहती हैं कि वो उनका सम्मान नहीं करती हैं।
ममता बनर्जी ने कोलकाता में अपने धरना स्थल से बोलते हुए कहा, “मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही है कि राष्ट्रपति को बीजेपी ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए भेजा है। राष्ट्रपति बीजेपी की राजनीति में फंस गई हैं।” उन्होंने कहा कि जब मणिपुर, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आदिवासियों पर अत्याचार हुए, तब राष्ट्रपति ने आवाज क्यों नहीं उठाई। उन्होंने कहा कि मैंने बंगाल में आदिवासियों के लिए बहुत काम किया है, लेकिन राष्ट्रपति को इसकी जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि हम राष्ट्रपति का बहुत सम्मान करते हैं। अगर वो 50 बार आएं तो हर बार कार्यक्रम में हम शामिल नहीं हो सकते। सवाल यह है कि राष्ट्रपति अभी तक कितनी बार बंगाल गईं हैं। शायद राष्ट्रपति का ये तीसरा बंगाल दौरा था. वो इतनी ज्यादा फ्री नहीं हैं कि बंगाल के ही 50 चक्कर लगा दें। अगर साल में एक-दो बार राष्ट्रपति बंगाल का दौरा करती हैं तो ममता बनर्जी इतनी ज्यादा व्यस्त नहीं हैं कि वो उनका साथ नहीं दे सकती। अगर देश में आदिवासियों पर कहीं अत्याचार होता है तो राष्ट्रपति महोदया को सार्वजनिक रूप से विरोध करने की जरूरत नहीं है । वो सरकार को अपना विरोध अपने तरीके से बता सकती हैं। वैसे भी प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के अन्य मंत्री समय-समय पर उनसे मिलते रहते हैं, वो किसी समय भी अपनी बात रख सकती हैं।
राष्ट्रपति सरकार का हिस्सा हैं, वो सरकार को उचित माध्यम से अपनी बात पहुंचा सकती हैं। उन्होंने सिर्फ अपनी नाराजगी जाहिर की थी लेकिन ममता बनर्जी पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया था। बंगाल के हालात पर उन्होंने कुछ नहीं कहा और न ही बंगाल सरकार पर कोई टिप्पणी की। ममता बनर्जी ने तो राष्ट्रपति पर सीधा हमला कर दिया। राष्ट्रपति को जवाब देने की जरूरत नहीं थी और उन्होंने कोई जवाब दिया भी नहीं। सवाल यह है कि राष्ट्रपति का अपमान करके ममता बनर्जी ने क्या हासिल किया है। पहली बार आदिवासी समाज से एक महिला सर्वोच्च पद पर पहुंची है, हमें उनका सम्मान करना चाहिए। जिस संघर्ष और हालातों से निकलकर द्रोपदी मुर्मू जी राष्ट्रपति बनी हैं, इस पर सिर्फ आदिवासी समाज को ही नहीं बल्कि पूरे देश को गर्व है। उनका अपमान करना बेहद शर्मनाक घटना है, इससे राजनीतिक दलों को बचना चाहिए।
राजेश कुमार पासी