विश्ववार्ता

क्या अयातुल्लाह खुमैनी सरकार ईरान में सुलग रही जेन जेड क्रांति से कुछ सबक लेगी या शहादत देगी?

कमलेश पांडेय

शिया मुस्लिम बहुल देश ईरान में ‘तानाशाह तेरी कब्र खुदेगी’ और ‘मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा’ जैसे नारे लगना हैरत की बात है, क्योंकि कोई सच्चा मुसलमान अयातुल्लाह खुमैनी जैसे मुल्ला शासकों और उनके वतन परस्त हमकदम मुल्लाओं का विरोध क्यों करेगा? खासकर उस अयातुल्लाह खुमैनी का जो पूरी दुनिया में इस्लामिक बादशाहत स्थापित करने का स्वप्नद्रष्टा समझे जाते हैं।

बावजूद इसके हाल के ईरान मुल्ला विरोधी आंदोलन में ये नारे आम हो चुके हैं। इसलिए सवाल है कि क्या अयातुल्लाह खुमैनी सरकार ईरान में सुलग रही जेन जेड क्रांति से कुछ सबक लेगी या अपनी शहादत देगी?

बताया जाता है कि यह सरकार विरोधी जन-आंदोलन मुख्य रूप से वहां के आर्थिक संकट से उपजे हैं जहां रियाल की कीमत में भारी गिरावट के बाद लोगों का जीना दुश्वार हो चुका है। वहां से मिली खबरों से पता चलता है कि ईरान में चढ़ी 42% से अधिक की महंगाई ने आम जनता को सड़कों पर उतार दिया है। जानकारों का कहना है कि ये जन-प्रदर्शन तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू होकर मशहद, इस्फहान जैसे शहरों में फैल गए हैं, और लोग ‘मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा’ और ‘तानाशाह तेरी कब्र खुदेगी’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगा रहे हैं। यह वहां की अयातुल्लाह खुमैनी सरकार के लिए चिंता की बात है।

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञ बताते हैं कि ईरान की मौजूदा आर्थिक बदहाली के पीछे उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध मुख्य वजहें हैं, जो उसके मुख्य उत्पाद तेल निर्यात को प्रभावित कर रहे हैं। यही वजह है कि साल 2022-23 के महसा अमीनी आंदोलन के बाद शुरू हुआ हालिया आंदोलन विगत तीन सालों के बाद प्रारम्भ हुआ सबसे बड़े प्रदर्शन हैं जहां भ्रष्टाचार, धार्मिक कट्टरता और सालों की नाकामियों से तंग जनता पुनः सड़क पर चुकी है।

वहीं, वैश्विक कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर पॉलिसी’ ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों को और सख्त किया है जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने इसे शासन की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करने वाला बताया है, हालांकि प्रत्यक्ष विदेशी हस्तक्षेप का कोई स्पष्ट प्रमाण अब तक नहीं मिला है। उधर, इजरायल और अमेरिका के परमाणु ठिकानों पर हमलों ने भी ईरान पर नैतिक दबाव बढ़ाया है। इजरायल जिस तरह से ईरान के सैन्य रणनीतिकारों को ढेर कर देता है, उससे भी सरकार की प्रतिरक्षात्मक कमजोरी जगजाहिर है।

फिर भी ईरान के हालिया मुल्ला विरोधी प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें आर्थिक संकट से निजात और सत्ता परिवर्तन से जुड़ी हैं। आंदोलनकारियों ये मांगें तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए आंदोलन में स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं- पहला, प्रदर्शनकारी “मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा” और “तानाशाह की कब्र खुदेगी” जैसे नारों से सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई और धार्मिक शासन के खिलाफ खुला विद्रोह जता रहे हैं। दूसरा, वे रियाल की गिरावट, 42% महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त होकर आर्थिक सुधार तथा भ्रष्टाचार मुक्त शासन की मांग कर रहे हैं। तीसरा, उनकी अतिरिक्त अपेक्षाएं हैं कि जनता इजरायल-अमेरिका के दबाव के बीच परमाणु नीति पर पुनर्विचार करे और महिलाओं पर हिजाब जैसे धार्मिक प्रतिबंधों को समाप्त करने का कार्य करे। यह उनकी सामूहिक अपील है।

हालांकि, अनुभव बताता है जिस तरह से धर्म के आधार पर राष्ट्रपति खुमैनी लोगों को नियंत्रित करने की भूल कर रहे हैं, उसके मद्देनजर यह होना स्वाभाविक है। ऐसा इसलिए कि कोई भी धर्म पारलौकिक समस्याओं का समाधान तो देता है लेकिन इहलौकिक समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को शिक्षा और विकास जैसे सुशासन की जरूरत होती है। 

समझा जाता है कि जब कोई राजनेता देश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और मानवीय संसाधनों का दुरूपयोग अपने धार्मिक महत्वाकांक्षाओं, उसके भौगोलिक विस्तार और राजनीतिक अवसरवादिता के दृष्टिगत करने लगता है तो वह भीतर ही भीतर खोखला होता जाता है। 

ऐसा इसलिए कि विरोधी बढ़ जाते हैं जिन्हें काबू में करने के लिए युद्ध क्षमता में बढ़ोतरी करनी पड़ती है। इसमें खर्च बढ़ने से जनता की सहूलियत में कटौती करनी पड़ती है। इससे महंगाई बढ़ती है और महंगाई बढ़ने से लोगों को भी त्याग करने में कष्ट पहुंचता है। इससे सत्ता विरोधी आक्रोश पनपता है, जिसे विदेशी शक्तियां तूल देती हैं। फिलहाल ईरान, अमेरिका-इजरायल और इनके समर्थक मुस्लिम देशों के षड्यंत्र का सहज शिकार होने के कगार पर पहुंच चुका है।

दिलचस्प तो यह है कि जेन जेड पीढ़ी के नेतृत्व में शुरू हुए ये जन-प्रदर्शन 2022 के महसा अमीनी आंदोलन की याद दिलाते हैं। इससे स्पष्ट है कि श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल के बाद अब ईरान का नेतृत्व भी तथाकथित जेन जेड क्रांति का सहज शिकार होने वाला है। इससे साफ है कि इक्कीसवीं सदी में वैश्विक पटल पर अमेरिकी वर्चस्व को बनाए रखने के लिए डीप स्टेट प्रोत्साहित जो कथित ‘जेन जेड क्रांति’ हो रही है, वह विभिन्न एशियाई देशों को अमेरिकी रणनीति के समक्ष घुटने टेकने या अंजाम भुगतने की स्पष्ट नसीहत है। 

बता दें कि जेन जेड यानी साल 1997-2012 के बीच जन्मे बच्चे अब सोशल मीडिया के जरिए जलवायु परिवर्तन, तानाशाही और अन्याय के खिलाफ सक्रिय हैं, जैसा कि मिस्र की जैस्मीन क्रांति या ईरान के पुराने हिजाब आंदोलनों में दिखा। अब तक कम से कम 8 देशों में ऐसे युवा आंदोलन दर्ज हैं। खासकर साल 2025 में नेपाल, इंडोनेशिया, पेरू और हाल ही में ईरान में भी जेन जेड के बड़े प्रदर्शन देखे गए हैं। इससे पहले अगस्त 2024 में बंगलादेश में भी इनके सफल प्रदर्शन हो चुके हैं और वहां भी शेख हसीना सरकार की बलि चढ़ाई जा चुकी है।

घटनाक्रम बताते हैं कि साल 2025 में इनका आंदोलन इंडोनेशिया से शुरुआत होकर पेरू की राजधानी लीमा में राष्ट्रपति दीना बोलुआर्ते के खिलाफ 27 सितंबर को प्रदर्शन हुए। ईरान में दिसंबर 2025 तक तेहरान समेत कई शहरों में जेन जेड ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के खिलाफ विद्रोह किया। वहीं, नेपाल में 8 सितंबर 2025 को शुरू हुए प्रदर्शनों ने संसद और सरकारी भवनों पर हमले किए, जिसमें 19 लोगों की मौत हुई। यहां भी युवाओं ने सोशल मीडिया बैन हटवाया और नया संविधान की मांग की।  नेपाल में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ शुरू हुई जेन जेड क्रांति के बाद ही वहां के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।

बहरहाल, ईरान को अब जेन जेड क्रांति की प्रवृत्ति से सतर्क हो जाना चाहिए और उनकी मांगों के माकूल समाधान पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही भारत (इंडिया), चीन और रूस समर्थक एशियाई देशों को भी अब रणनीतिक नजरिये से सचेष्ट होने की जरूरत है क्योंकि उनकी नीतिगत लापरवाही जेन जेड को भड़कने/भड़काने के मौके प्रदान करेगी। अब अगला नम्बर इनमें से ही किसी का आएगा।

कमलेश पांडेय